संपादकीय - मेरे बहाने और इक्कसवीं सदी की कहानियाँ विशेषांक
साहित्य कुञ्ज के इस अंक में
कहानियाँ
अपूर्ण विराम
नगर निगम का बुलडोज़र ठीक आठ बजे पहुँचा। भीड़ तमाशा देखने खड़ी थी, पर एक बूढ़ा आदमी अपनी जर्जर किताबों की दुकान के सामने निर्विकार बैठा था। अधिकारी ने कहा, “बाबा, हट जाइए। आधे घंटे में सब मलबा हो आगे पढ़ें
ऊँची छलाँग
जब एक बड़े शहर के जाने-माने अस्पताल में मेरी नियुक्ति हुई तो मैं फूली न समायी। ख्याति-प्राप्त डॉ. मिश्रा हमारे मनोविकृति-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष थे। देश-विदेश की कई महत्त्वपूर्ण चिकित्सा-पत्रिकाओं तथा संस्थाओं से वह सम्बद्ध थे और उनके सम्पर्क आगे पढ़ें
और प्रेम मरता गया
जिस प्रेम के लिए उन्होंने पूरा संसार छोड़ दिया था, उसी प्रेम को बचाने के लिए बाद में उनके पास समय नहीं बचा। कॉलेज के दिनों में अमित और रागिनी की प्रेम कहानी पूरे परिसर में चर्चा का विषय आगे पढ़ें
गुंडे कहीं के
शरदनाथ खरे साहब ने ऑफ़िस के बाहर निकलते ही बाहर भीड़, हल्ला और हुड़दंग देखा। उनका मन यह सब देखकर कड़वाहट से भर गया। सुबह से ही उनका मन ख़राब था। वह घर से तो समय से निकले थे आगे पढ़ें
गेंदा रानी
ड्यूटी रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर के साथ मैंने अपना अराइवल टाइम दर्ज किया: दो बजे। मेरे नाम के आगे मेट्रन ने रिकवरी रूम लिख रखा था। मैं वहीं पहुँच ली। सिस्टर सुशीला की पहरेदारी में बैड नम्बर दो पर आगे पढ़ें
त्याग की अंतिम क़ीमत
मेरे पिताजी छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने उम्र से पहले ज़िम्मेदारियों का भारी बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। हमारे संयुक्त परिवार की आजीविका कपड़े की दुकान पर निर्भर थी, जिससे सभी की पढ़ाई, इलाज और आगे पढ़ें
पत्थर पूजै हरि मिले . . .
आज सुबह पाँच बजे ही पुष्पा की नींद खुल गई। बालकनी में जाकर देखा, बाहर अभी अँधेरा था। अच्छी लोकेशन पर फ़्लैट मिला था। बालकनी से नीचे पार्क दिखता था। कल तो शाम हो गई सामान शिफ़्ट करके रखवाने आगे पढ़ें
पिता का तकिया
मेरी कॉलोनी में रहने वाले एक वृद्ध की दिनचर्या वर्षों से नहीं बदली थी। हर शाम वह चारपाई पर बैठकर दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए रहते। लोग समझते, शायद बेटे का इंतज़ार है। बेटा महीने में केवल एक बार आगे पढ़ें
बीते रिश्तों की ख़ुश्बू
पुराने घर की छत पर रखा वह लकड़ी का संदूक किसी आम संदूक जैसा नहीं था; उसमें कपड़े या गहने नहीं, बल्कि बीते हुए समय की ख़ुश्बू, अधूरी इच्छाओं की आहट और कुछ ऐसे एहसास बंद थे जिन्हें कभी आगे पढ़ें
मुस्कान का उत्तर
सम्मान समारोह में जब मंच से उसका नाम पुकारा गया, तो उसने तालियों की ओर नहीं, आख़िरी पंक्ति में बैठी अपनी माँ की ओर देखा . . . और दोनों हाथों से अँगूठा उठा दिया। माँ की आँखें भर आगे पढ़ें
योनि का चुनाव
एक जीव ईश्वर के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा था।ईश्वर मुस्कुराएँ, “वत्स! पिछले जन्म में तुमने कुछ पुण्य किए हैं। इसलिए इस बार तुम्हें एक विशेष अधिकार देता हूँ। मृत्यु लोक में तो जाना ही होगा, पर किस योनि में आगे पढ़ें
लक्ष्मी का विरह
रथ चला . . . शंख बजे, घंटियाँ बजीं, जयघोषों से आकाश भर उठा। जगन्नाथ अपने भाई-बहन के संग नगर की ओर निकल पड़े। भक्तों का सागर उमड़ पड़ा—किसी की आँखों में उत्सव था, किसी के हाथों में प्रार्थना, आगे पढ़ें
हास्य/व्यंग्य
आठवें आयोग की आठ कलाएँ
हिंदी बेल्ट में आठवें नम्बर को जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व दिया जाता है। मसलन कुछ उच्च पदों पर आसीन लोगों का कुछ लोग नवीं फ़ेल कहकर मज़ाक उड़ाते रहते हैं जो कि ठीक बात नहीं है। वह लोग आगे पढ़ें
आरआईपी की रफ़्तार और जीवित मिश्र जी
जैसे ही ख़बर उड़ी कि वरिष्ठ चिंतक, सामाजिक विश्लेषक और सोशल मीडिया के अनन्य भक्त, आदर्श पुरुष श्री “मान्यवर मिश्र” जी नहीं रहे, देशभर की फ़ेसबुक टाइमलाइनों पर संवेदनाएँ बरसात में शहर की नालियों की तरह फट पड़ी। जिसने आगे पढ़ें
एक आवारा कवि
एक कवि की प्रेमिका ने कवि से कहा कि तुम दूसरे की सुंदरता पर ख़ूब तारीफ़ लिखते हो। कभी मेरी सुंदरता पर कोई बखान नहीं करते हो। क्या मैं असुंदरी हूँ? मेरे अन्दर सौंदर्यरस की कमी है। तुम एक आगे पढ़ें
ख़बरदार जो रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक हुई
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सैंकड़ों हमले होने के बाद अब एक नया हमला हुआ है। यह किसका सोचा हुआ खेल है यह तो नहीं मालूम लेकिन सामने संपादकों के माध्यम से आया है। संपादकों ने दो टूक कह दिया है आगे पढ़ें
जल विभाग का राष्ट्रीय शिक्षा अभियान: ‘जल ही जीवन है’
यह वाक्य अब पुराना हो गया है। हमारे नगर के जल विभाग ने इसमें आवश्यक संशोधन कर दिया है। अब इसका सरकारी संस्करण है—“जल ही जीवन है, और यदि जीवन बच गया तो कल फिर जल मिलेगा।” बचपन में आगे पढ़ें
दूल्हा चाहिए . . . पर बेटा नहीं!
समाज प्रगति कर रहा है। इतना प्रगति कर रहा है कि अब विवाह सात फेरों से नहीं, सात शर्तों से होने लगा है। लड़की वालों ने दूल्हे के लिए नया विज्ञापन निकाला है— “एक सुशिक्षित, सुयोग्य, उच्च वेतनभोगी युवक आगे पढ़ें
प्री-वेडिंग का पहरा
आजकल शादी दो लोगों की कम, सुरक्षा व्यवस्था की ज़्यादा लगती है। पहले रिश्ते भगवान के भरोसे बनते थे, अब बाउंसर और डिटेक्टिव एजेंसी के भरोसे। सरिता जी के बेटे नीरव की शादी तय हुई। लड़का देखने में स्मार्ट आगे पढ़ें
मानसून का गधा
मेरा मोहल्ला पढ़ा-लिखा होने के बाद भी पढ़ा-लिखा टोटका-प्रधान मोहल्ला है। पहुँचने वाले चाँद पर पहुँच गए हों तो पहुँच गए हों, इससे हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मेरे मोहल्ले वाले टोटकाजनियों, टोटकागुनियों के पास किसी भी साध्य से आगे पढ़ें
मैं दिमाग़ी पैदल हूँ
हमारे महल्ले में हफ़्तों पानी आए या न आए। हमारे महल्ले में दिनों बिजली गुल रहे तो रहे। हमारे महल्ले में बिजली गुल होने की बीसियों बेकार की शिकायतें करने के बावजूद कोई बिजली विभाग की ओर से बिजली आगे पढ़ें
यत्र तत्र चोर सर्वत्र
दिन में ऑफ़िस जाकर कुर्सी पर सोने वाले को आजकल पता नहीं क्या हो गया है कि ऑफ़िस में तो छोड़ो, रात को नींद की गोलियाँ खाने के बाद भी नींद नहीं आ रही। परेशान भी मैं हूँ नहीं। आगे पढ़ें
यातायात व्यवस्था नहीं, यातना का सरकारी प्रबंधन
टीकमगढ़ की सड़कों पर इन दिनों एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न खड़ा है—क्या यहाँ यातायात व्यवस्था है भी, या जनता को यातना देने का कोई सुव्यवस्थित सरकारी प्रबंधन चल रहा है? शहर की सड़कें देखकर लगता है कि हर वाहन आगे पढ़ें
विक्रम-वेताल: जम्बूद्वीप का राजमहल
“कहाँ लेकर जा रहे हो, विक्रम?” कंधे पर पड़े वेताल ने विक्रम के मज़े लेते हुए पूछा। “राजमहल।” “अच्छा! झोपड़े को राजमहल कहते हुए, राजन, तुम्हें शर्म नहीं आई? मैं तो कहूँगा, तुम राजन कहलाने के क़ाबिल भी नहीं आगे पढ़ें
सड़क गुण गड्ढ गुणी अनन्ता
बंधुओ! आम आदमी के सिर पर कुछ और हो या न, पर शिकायतों की वैसी ही भारी भरकम गठरी होती है जैसी अविवाहित प्रेमियों के दिल पर पास शिकवों की। प्रेमी की आयु सीमा से मैं बहुत पहले गुज़र आगे पढ़ें
आलेख
अपनी कविताओं के बारे में एक स्वीकारोक्ति
मैंने कविता को कभी अपने समय से बाहर खड़े होकर नहीं देखा। जो कुछ मेरे भीतर घटता रहा, उसकी जड़ें मेरे आसपास की दुनिया में थीं—मनुष्य की बेचैनी, असमानता, अन्याय, बदलती हुई सामाजिक चेतना, राजनीतिक छल और उन छोटी-छोटी आगे पढ़ें
कारण मनमुटाव के
जब एक व्यक्ति किसी ‘अपने’ से बोलचाल बन्द कर दे तो उसके पीछे पैसों का लेन-देन, धोखाधड़ी या ईर्ष्या के अतिरिक्त इन निम्नलिखित तीन अन्य कारणों में से भी कोई एक कारण हो सकता है: या तो किसी गम्भीर आगे पढ़ें
पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह का कुमाउनी कविता को योगदान
रमेशचन्द्र शाह का जन्म सन् 1937 में वैशाखी त्रयोदशी को अल्मोड़ा, उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज अल्मोड़ा से इंटरमीडिएट और प्रयाग विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पाई। अंग्रेज़ी साहित्य में एमए, पीएचडी की उपाधि पाने के पश्चात आगे पढ़ें
बिम्बों के बहाने एक कवि की काव्य-दृष्टि का अन्वेषण
रामकिशोर मेहता की आलोचना-पुस्तक ‘शैलेन्द्र चौहान की कविताओं में बिम्ब विधान’ पर आलोचनात्मक टिप्पणी पुस्तक: शैलेन्द्र चौहान की कविताओं में बिम्ब विधान लेखक: रामकिशोर मेहता मूल्य: 350 रुपए प्रकाशक: दृष्टि प्रकाशन, 53/17, प्रतापनगर, जयपुर-302033 हिंदी आलोचना में किसी एक आगे पढ़ें
भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में पूर्वोत्तर क्षेत्र का योगदान: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
डॉ. नेहा गौड़ हिंदी अध्यापिका (टी.जी.टी.) शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार “प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि संस्कृति की पहली पाठशाला है।” सार भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम एवं समृद्ध ज्ञान-धाराओं में से एक है। इसका स्वरूप केवल वेद, उपनिषद, दर्शन आगे पढ़ें
विज्ञान लेखन और शैलेन्द्र चौहान का योगदान
विज्ञान लेखन को प्रायः केवल कल्पना, फंतासी या ‘साइंस फ़िक्शन’ तक सीमित समझ लिया जाता है, जबकि वस्तुतः उसका दायरा कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी है। विज्ञान लेखन में कथा, निबंध, व्यंग्य, शोधपरक आलेख, लोकप्रिय विज्ञान, परिचयात्मक लेखन, यहाँ आगे पढ़ें
समीक्षा
उपन्यास ‘अलकनन्दा सुत’ पर एक समीक्षात्मक दृष्टि
पुस्तक: अलकनन्दा सुत लेखिका: अर्चना पैन्यूली विधा: उपन्यास प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली प्रकाशन वर्ष: 2023 पृष्ठ संख्या: 280 मूल्य: ₹495 यह मत सर्वमान्य होना चाहिए कि कथा-कहानी रचते समय कथाकार अधिकतर अपने जीए हुए समय को उसके सभी प्रतिमानों, आगे पढ़ें
मराठी पुस्तक परिचय
(गजाआडच्या कविता) (जेल के क़ैदियों की कविताएँ) भूमिका में संपादक उत्तम कांबळे ने बताया है कि ‘गजाआडच्या कविता’ संग्रह महाराष्ट्र के जेलों में बंद क़ैदियों द्वारा लिखी गई कविताओं का संकलन है। इस प्रयास की प्रेरणा प्रसिद्ध कवि आगे पढ़ें
मायाजाल: एक विशिष्ट चिन्तन की कृति
समीक्षित पुस्तक: मायाजाल (कहानी संग्रह) लेखक: दिव्या माथुर समीक्षक: विजय रंजन प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, भारत मूल्य: ₹300 पृष्ठ संख्या: 152 ISBN: 9789355621795 वर्तमान में लंदन प्रवासी बहुचर्चित हिन्दीसेवी कवयित्री, कहानीकार और उससे बढ़ कर प्रांजल साहित्यिक मेधा की धनी, आगे पढ़ें
सूक्ष्म अनुभूतियों की रश्मियों से निस्सृत वृहद विचार—कब टूटेंगी चुप्पियाँ
पुस्तक: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा- संग्रह) लेखक: डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा पृष्ठ संख्या: 103 मूल्य: ₹299 दोहा शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में डॉ. शैलेष ने अपने संग्रह में विस्तार से वर्णन किया है। हिंदी काव्य आगे पढ़ें
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साहित्य साधना का पर्याय: आदरणीय सुमन घई और 'साहित्य कुंज' की त्रिशतकीय यात्रा
चर्चित सम्पादकीय: अंकों के तीन शतक पूर्ण करने पर साहित्य कुञ्ज के प्रेमियों को हार्दिक बधाई! साहित्य की दुनिया में कुछ लोग केवल रचनाएँ नहीं लिखते, वे साहित्यिक संस्कारों का निर्माण करते हैं। वे स्वयं दीपक बनकर दूसरों को आगे पढ़ें
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“मातृभाषा हमारे जीवन का आधार है, हिंदी के विकास में योगदान देनेवाले ग़ैर हिंदी भाषिक विद्वानों ने अपनी मातृभाषा का…
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भोपाल। भोजपाल साहित्य संस्थान के अंतर्गत संचालित ‘व्यंग्य भोजपाल’ की मासिक व्यंग्य गोष्ठी का आयोजन 10 मई को भोपाल…
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दिनांक 30 अप्रैल 2026 को साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सभागार में विख्यात कवि लक्ष्मी शंकर वाजपेयी के कविता…
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शाहगंज (आगरा)। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ ने श्री चित्रगुप्त भगवान संस्था सभागार में अपना 56वाॅं प्रांतीय अधिवेशन व शैक्षिक…
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