इस अंक की कविताएँ
माता-पिता की महिमा (दोहे)
- डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’
अम्ब विमल मति दे,
फागुनी दोहे,
वक़्त ने दिल को दिए हैं ...,
सललि - दोहे - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
निरन्तर,
शब्द,
स्वागत - डॉ. प्रभा मुजुमदार
समय को जानो,
मेरी व्यथा,
सड़क का आदमी,
विकास के नाम पर
- दिनेश ध्यानी
तेरे
अधर! - डॉ. अनिल चड्डा
तीन-त्रिवेणियाँ - सुजाता दुआ
हिरण्याक्ष,
हसरत
-
सूरज तिवारी ’मलय’
ज़ख़्म,
बस यही सुर्ख़ियाँ हैं,
रेखाचित्र इन्सान - तरूण सोनी
"तन्वीर"
क्यूँ सूरत तेरी मन भायी,
कहाँ
- बी मरियम ख़ान
रात,
धुँध के मिटते चेहरे,
कुछ निशान वक़्त के -
मीना
चोपड़ा
भूख - पाराशर गौड़
जी भर
के आज जी लो - सरदार सिंह (प्रेषक :
डॉ. शशि पाधा)
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हाईकू - धर्म प्रकाश जैन
वो (3 कविताएँ) ,
गुनगुनी धूप - सुनील गज्जाणी
आज फिर
- कुसुम सिन्हा
नागफनी,
बैरी हवा - नवल किशोर कुमार
एक ख़्वाब टूटा हुआ - प्रकाश यादव ’निर्भीक’
हम गीतों के गलियारे में,
पूजा की थाली,
धूप को वह पथ दिखाये,
नहीं संभव रहा,
वाणी ने कर दिया समर्पण - राकेश खण्डेलवाल
तुम चाहो तो, दोषी कौन, मधुर एहसास, मायाजाल - सीमा गुप्ता
इस अंक की शायरी
क्यों काँटे है चुभाता! - डॉ. अनिल चड्डा
सपना तब तक ही सुंदर है,
सब कुछ अपने मन का ही हो,
जिससे थोड़ा लगाव होने लगा,
बच्चों पर दिन भारी देखे - रमेश तैलंग
हर बस्ती-बस्ती में जल रहे, कहने को तो उनकी वो, आईनों की तरह दिल को भी - तरूण सोनी "तन्वीर"
ऐसे तुम मुझको बेरुख़ी से, ये किस कुसूर की सज़ा, हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले - कुसुम सिन्हा
ज़रा बता - सुनील गज्जाणी
रिश्तों से अब डर लगता है, सुख-दुःख में जो साथ चले हैं, आज जिएं कल मरना है, जिसने ताउम्र अँधेरा सहा है, उनको समझा न मैं ... - पुरू मालव