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ISSN 2292-9754

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09.15.2017


ज़माने में यही होता रहा है
(मिसरा-ए-तरह)
फ़िराक़ गोरखपुरी

शायरी स्तम्भ संपादक : अखिल भंडारी

फ़िराक़ गोरखपुरी की पूरी ग़ज़ल आप निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं|
https://rekhta.org/ghazals/samajhtaa-huun-ki-tuu-mujh-se-judaa-hai-firaq-gorakhpuri-ghazals?lang=hi

नियम :

१. मिसरा–ए-तरह का प्रयोग अनिवार्य है लेकिन इसे मतले में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मतला ग़ज़ल का पहला शे’अर होता है।
२. ग़ज़ल में कम से कम पाँच अश’आर आवश्यक हैं। अधिक से अधिक ग्यारह हो सकते हैं।

निर्धारित बहर :

मफाईलुन मफाईलुन फऊलुन
१ २ २ २ १ २ २ २ १ २ २

मिसरा–ए-तरह :

ज़माने में यही होता रहा है

रदीफ़ = है

काफिया = आ यानि रहा, गया, लगा, मिला, जुदा, क्या, हुआ इत्यादि

यह मिसरा फ़िराक़ गोरखपुरी की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल से है। यह बहर काफ़ी प्रचलित है। छोटी बहर में वज़न सँभालना आसान होता है लेकिन अभिव्यक्ति की चुनौती रहती है क्यूँकि कम शब्दों में बात कहनी पड़ती है। बड़ी बहर में मामला इस से उलटा है। यह बहर मझली है। चुना हुआ मिसरा निर्धारित बहर पर बिना अपवाद के फिट हो रहा है। रदीफ़ छोटा है और काफिया आसान है। नये लिखने वालों को शब्द चुनने में आसानी रहेगी।

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