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| 05.31.2008 |
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उस
जनपद का कवि
हूँ |
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उस जनपद
का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,
नंगा है,
अनजान है, कला — नहीं जानता
कैसी होती
है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ
भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन
का सोता, इतिहास ही बता
सकता है।
वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज
से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं
मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया
कहाँ से कहाँ पहुँची; अब समाज में
वे विचार
रह गए नहीं हैं जिनको ढोता
चला जा
रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल
मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धर्म
कमाता है वह तुलसीकृत रामायण सुन पढ़ कर, जपता है नारायण नारायण।
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