| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.31.2008 |
|
सूरज से मैं ने कहा |
|
हमसफर,
सूरज से
मैं ने कहा
पृथ्वी ने
ज्यों ही दिखाया मुझे
और भी
हैं,
हमसफर
तुम्हारे
इस ग्रह पर
और आकाश
की
तुम्हारी
परिक्रमा में
और कई
ग्रह हैं
और
सहयात्रियों की
विस्तृत
आकाश में
कुछ गणना
हुई है
कुछ होती
जा रही है
जैसे जैसे
बुद्धि
और आँख
काम करती है;
मैं तो
यहाँ
जीवन
अजीवन के बीच हूँ
जीवन में
गति है
अजीवन में
भी है वही
यही गति,
आज
एक नया
दिन लाई है
ऐसा दिन
जैसा कोई
और दिन
नहीं होता
वर्ष का
पहला दिन
अब
उत्तरायण है
फिरती है
शीत लहरी
काँपते
हैं पेड़ पौधे
प्राणी
अपनी यति में
नये नये
अंकुर सुगबुगाते हैं
पत्ते
पुराने पियरा चले
वैसी ही
कथा है
जैसी कुछ
पहले थी
केवल
संवेग अलग अलग
अपना अपना
है।
मेरी तरह
सभी कहाँ
तुमको बुलाते हैं
सब अपने
अपने में मगनहैं
मेरी सुनो
और भी
तुम्हारे हमसफ़र
देश देश
में तलाश कर रहे हैं
अपने आपे
की
तुम सबका
साथ दो।
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|