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| 05.31.2008 |
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ध्वनिग्राहक |
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ध्वनिग्राहक हूँ मैं। समाज में उठने वाली
ध्वनियाँ पकड़ लिया करता हूँ। इस पर कोई
अगर चिढ़े तो उस की बुद्धि कहीं है खोई
कहना यही
पड़ेगा। अगर न हो हरियाली
कहाँ दिखा
सकता हूँ? फिर आँखों पर मेरी
चश्मा हरा नहीं है। यह नवीन ऐयारी
मुझे पसन्द नहीं है। जो इस की तैयारी
करते हों
वे करें। अगर कोठरी अँधेरी
है तो उसे
अँधेरी समझाने – कहने का
मुझ को है अधिकार। सिफारिश से, सेवा से
गला सत्य का कभी न घोटूँगा। मेवा से
बरंब्रूहि
न कहूँगा और न चुप रहने का।
लड़ता हुआ समाज, नई आशा अभिलाषा, नये चित्र के साथ नई देता हूँ भाषा। |
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