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05.31.2008
 

स्वाभिमानिनी; स्वतन्त्रबुद्धि; करुणामयी!

डॉ. फ़ादर कामिल बुल्के
आभार : - यह लेख  कामिल बुल्के के लेखों के संग्रह "एक ईसाई की आस्था - रामकथा और हिन्दी" (सम्पादक डा. दिनेश्वर प्रसाद) से लिया गया है और यह पुस्तक प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली से प्रकाशित है


 

सन्‌ १९३५ई. में मैं छब्बीस वर्ष की आयु में भारत पहुँचा। इस घटना के कारण मेरा सम्पूर्ण जीवन ही बदल गया; एक प्रकार से उस समय जीते जी मेरा पुनर्जन्म हुआ। मैं अविलम्ब बालकों की भाँति नागरी लिपि का अक्षर-ज्ञान प्राप्त करने लगा; और दस वर्ष तक हिन्दी, संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने के बाद मैं सन्‍ १९४५ई. में हिन्दी में एम.ए. करने के लिए इलाहाबाद गया। डॉ. धीरेंद्र वर्मा की प्रेरणा से मैंने एम.ए. के बाद वहाँ शोध-कार्य भी किया और इस प्रकार मैं चार वर्ष तक इलाहाबाद में रहा। यदि मैं अपने इस प्रयाग-वास को अपने जीवन का ’द्वितीय वसन्त’ कहूँ, तो अतिशयोक्ति न होगी। वहाँ मेरे साथ लोगों ने इतना आत्मीय व्यवहार किया तथा मुझे इतनी सहृदयता से अपनाया कि राँची लौट कर मैं प्रयाग को नहीं भूल सका। भूलना तो दूर, उसकी स्मृति वर्ष-प्रति-वर्ष मधुरतर होती गयी, यहाँ तक कि मैं प्रयाग को अपना ही समझने लगा हूँ और वहाँ के लोग ’मायके वालों’ की भाँति मेरे लिए आत्मीय एवं प्रिय बन गये हैं। उन ’मायके वालों’ में दीदी महादेवी जी का एक विशिष्ट स्थान है।

अपने इलाहाबाद के विद्यार्थी-जीवन में ही श्रीमती महादेवी वर्मा से मेरा प्रथम परिचय हुआ था। जहाँ तक मुझे स्मरण है, डॉ. रघुवंश, जो उस समय अपना शोधप्रबन्ध लिख रहे थे, मुझे पहले-पहल उनके यहाँ ले गये थे। उस समय से अब तक मैं बीच-बीच में बराबर महादेवी जी से मिलता रहा। प्रस्तुत संक्षिप्त संस्मरणात्मक लेख में उनके कृतित्व के विषय में कुछ न कह कर, उनके व्यक्तित्व का मुझ पर क्या प्रभाव पड़ा, उसी को अंकित करना चाहूँगा।

महादेवी जी के विषय में यह सुन कर कि वे कभी अँग्रेज़ी नहीं बोलतीं, मैं मिलने के पहले से ही उनके प्रति आकर्षित हुआ था। बात यह है कि मेरी जन्मभूमि बेलजियम में दो भाषाएँ बोली जाती हैं : उत्तर में फ्लेमिश और दक्षिण में फ्रेंच। प्रथम महायुद्ध के बाद दोनों भाषाओं के समर्थकों में काफी संघर्ष चला था और मैंने अपने जीवन के ’प्रथम वसन्त’ में अपनी फ्लेमिश मातृभाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए उस संघर्ष में भाग लिया था। उस समय फ्रेंच का बोलबाला था और उत्तर बेलजियम के बहुत से शिक्षित लोग फ्रेंच बोलना तथा फ्रेंच सभ्यता में रँग जाना गौरव की बात मानते थे। मेरी माता जी कभी-कभी हाई स्कूल में पढ़ने वाली अपनी सन्तानों से अनुरोध करती थीं कि हम अभ्यास करने की दृष्टि से आपस में फ्रेंच में बोला करें। एक बार मेरी बहन ने माताजी को इस सम्बन्ध में जो उत्तर दिया था, वह मुझे अब तक स्मरण है। उसने दृढ़तापूर्वक कहा, हम खच्चर नहीं हैं। इस घर में फ्रेंच नहीं बोलेंगे। भारत पहुँच कर मुझे यह देख कर दुःख हुआ कि बहुत-से शिक्षित लोग अपनी ही संस्कृति से नितान्त अनभिज्ञ हैं, और अँगरेज़ी बोलता तथा विदेशी सभ्यता में रँग जाना गौरव की बात समझते हैं। महादेवी जी के विषय में यह जानकर कि वे कभी अँगरेज़ी नहीं बोलतीं, मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ और मैंने मन-ही-मन उन्हें अपनी स्वाभिमानिनी बहन के समकक्ष रख दिया इस प्रकार वे मेरे लिए भारतीय स्वाभिमान का प्रतीक बन गयी थीं और बीस वर्ष के बाद जब मैं आज उनके व्यक्तित्व के विषयों में सोचने बैठा, तो उनकी वही विशेषता सबसे पहले मेरे सामने आई। इस लम्बी अवधि में कितने ही विषयों तथा समस्याओं पर उनके साथ बातचीत हुई; उनकी प्रतिक्रिया सुन कर मैंने बारम्बार आनन्द-विभोर हो कर मन-ही-मन कहा है – यहाँ सच्चा भारतीय स्वाभिमान बोल रहा है।

सच्चा भारतीय स्वाभिमान रूढ़िवाद का पर्याय नहीं है। महादेवी जी को पुराणपंथियों की श्रेणी में रखना उनके प्रति घोर अन्याय ही नहीं, अपने को हास्यास्पद बनाना भी होगा। राजनीतिक प्रतन्त्रता के अन्त के साथ-साथ भारत में मानसिक दासता का अन्त नहीं हो पाया है। एक ओर तथाकथित शिक्षित वर्ग आधुनिकता के नाम पर विदेशी सभ्यता के प्रति अनुचित रूप से आकर्षित दिखाई पड़ता है; दूसरी ओर पुरातनता के अन्ध भक्तों की भी कमी नहीं है। ऐसे लोग एक प्रकार से रास्ते के किनारे बैठ जाते हैं अथवा सिर पीछे की ओर मोड़ कर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए भी यह नहीं देखते कि हम किधर जा रहे हैं; उनके मन में यही विचार सर्वोपरि है – हम कितना लम्बा सफ़र तय कर चुके हैं। महादेवी जी का मनोविज्ञान पुरातन के इन पुजारियों के मनोभाव से कोसों दूर है। वे वाल्मीकि, कालिदास, रवीन्द्रनाथ आदि  भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रतिनिधियों की श्रेणी में आती हैं, जो निर्जीव रूढ़ियों की बेड़ियाँ दूर फेंक देते हैं और अपने विवेक के बल पर आगे बढ़ने का मार्ग खोज निकालते हैं। वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करते समय मेरे मन में अनायास ही यह विचार बारम्बार उठा है कि आदिकवि ने जिस भारत का चित्रण किया है, वह अपने अतीत गौरव से मुग्ध हो कर निष्क्रिय नहीं बन गया था, अपितु हृदय में जीवन के प्रति उत्साह भर कर आगे बढ़ता जा र था। कालिदास ने ’मालविकाग्निमित्र’ की प्रस्तावना में लिखा है –

पुराणमित्येव न साधु सर्वं ना चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्‌।

सन्तः परिक्ष्य-अन्तरद्‍-भजन्ते मूढ़ः परप्रत्ययनेयबुद्धि॥

- पुराना होने से ही न तो कोई काव्य उतकृष्ट हो जाता है और न नया होने से ही निष्कृष्ट। ज्ञानी लोग दोनों की परख कर उनमें से एक को अपनाते हैं; मूर्ख ही दूसरे के कहने पर चलता है।

काव्य के विषय में कालिदास की यह उक्ति संस्कृति के अन्य अंगों पर भी लागू होती है। कालिदास की तरह स्वतन्त्र विचार रखने वाले मनीषियों के योगदान से भारतीय संस्कृति, रूढ़ियों से मुक्ति पा कर विकास की ओर बढ़ सकी है। महादेवी जी का ’भारतीय स्वाभिमान’ जितना सच्चा और स्वाभाविक है, उतना ही विवेकपूर्ण और प्रगतिशील भी है। ’नवीन’ विचारों को अपनी प्रखर बुद्धि की कसौटी पर कस कर, खरे उतरने पर उन्हें ’प्राचीन भारतीय’ साँचे में ढालना तथा निर्भीकतापूर्वक अपनाना, यह क्षमता मैं महादेवी जी के शक्तिशाली व्यक्तित्व का अनिवार्य गुण मानता हूँ।

जिन्हें महादेवी जी के निकट सम्पर्क में आने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है, उनके मन में सम्भवतः एक गुरु-गम्भीर विदुषी साधिका का चित्र बन गया होगा। ऐसा चित्र नितान्त अपूर्ण ही होगा, क्योंकि महादेवी जी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। उनके कोमल संवेदनशील हृदय में मनुष्य मात्र के प्रति कल्याण की भावना कूट-कूट कर भरी है। ’प्राणों का दीप जला कर करती रहती दीवाली’ के अनुसार वे दूसरों की सेवा में लगी रहती हैं और मिलने वालों से मुस्कुराते हुए बातचीत करती हैं। कोई भी सहृदय व्यक्ति उनके स्नेही करुणामय व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। ईश्वर से मेरी प्रार्थना है की महादेवी जी शतायु बन कर दूसरों के लिए ’दीवाली करती रहें’ : वे बहुतों में भारतीय स्वाभिमान की भावना भर सकें, ’नवीन’ विचारों को भारतीय संस्कृति की कसौटी पर कस कर ही अपनाने की प्रेरणा देती रहें और अपनी करुणामयी ममता से भरे प्यार से मिलनेवालों को स्निग्ध करती जाएँ। मैं भी और बहुत वर्षों तक बीच-बीच में प्रयाग जा सकूँ और उनके भारतीय स्वाभिमान, बौद्धिक निर्भीकता तथा निर्मल स्नेह के संगम में नहा कर नये उत्साह से अपनी द्वितीय मातृभूमि की सेवा कर सकूँ।

 

(फादर कामिल बुल्के के इस संस्मरण लिखने के समय अभी महादेवी वर्मा जी जीवित थीं)



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