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ISSN 2292-9754

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05.22.2017


सम्पादकीय
मेरी थकान
मई, 2017

कई बार थक जाता हूँ। यह केवल शारीरिक थकान नहीं है, मानसिक थकान है, कुंठा से उपजी थकान है, निरंतर संघर्ष की थकान है, दूसरों को प्रोत्साहित करते रहने की थकान है, पलट कर अपने बीते हुए पलों व्यर्थ जाते देखने की थकान है।

क्या यह थकान भारत में साहित्य को समर्पित लोगों को भी कभी अनुभव होती है? शायद होती होगी, परन्तु यह थकान निजी थकान है, अपनी विवशता की थकान है, इसलिए किसी से सहानुभूति की अकांक्षा रखना बेमानी है। फिर भी हर बार तौबा करने के बाद फिर से ग़लती दोहराता हूँ और वही करने में रम जाता हूँ जिससे यह थकान उपजती है। शायद यही मेरा प्रारब्ध है। क्योंकि जब मैं इस थकान के गहरे अंधकार में निष्क्रिय निर्जीव हो जाना चाहता हूँ तो कुछ ऐसा घटता है कि पुनः ऊर्जा की एक किरण फिर से मुझे सजीव कर जाती है।

पिछले दिनों ऐसा ही हुआ। अप्रैल २०१६ में हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने सावित्री थियेटर ग्रुप के साथ मिल कर मोहन राकेश के नाटक आधे अधूरे का मंचन किया था जो कि अत्यन्त सफल रहा था। तीन दिन तक लगातार मंचित होने वाले नाटक के तीनों दिन "हाउस फुल" रहे। हालाँकि आर्थिक रूप से नाटक ने लगभग अपने खर्चे ही पूरे किए थे, परन्तु गिल्ड की इच्छा थी कि जिन लोगों ने इस नाटक को मंचित करने के लिए लगभग छह महीने परिश्रम किया है उनका आभार सार्वजनिक मंच पर किया जाए। नाटक मंचन के एक वर्ष बाद आभार प्रकट करने का अवसर स्वतः प्राप्त हो गया। टोरोंटो के ला विक्टोरिया बैंक्युएट एंड कंवेन्शन सेंटर के मालिक गुप्ता दंपति ने हिन्दी राइटर्स गिल्ड को अपनी हाल की सेवाएँ निशुल्क देने की बात की। इस अवसर का लाभ उठाते हुए हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने न केवल उनका बल्कि अभी तक गिल्ड को सहायता देने वालों का आभार प्रकट करने के लिए एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया। क्योंकि कार्यक्रम शुक्रवार के शाम के साढ़े छह से आरम्भ होना था, इसलिए कम लोगों के आने की उम्मीद थी। लगभग दो सौ लोगों ने उपस्थित होकर आयोजन को अत्यंत सफल बना दिया (रिपोर्ट समाचार स्तंभ में पढें)। साहित्य के प्रति लोगों के प्रेम को देख कर मन गद्गद हो गया। कार्यक्रम आयोजन की सारी थकान मिट गयी। इतना ही नहीं कार्यक्रम के बाद गिल्ड के सदस्य विद्या भूषण धर के पिता पास आए और पीठ पर थपकी देने के बाद हाथ मिलाते हुए उन्होंने झुक कर मेरा हाथ चूम लिया। मैं निःशब्द उनकी ओर देखता रह गया…

दर –
सुमन कुमार घई


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