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05.22.2009

अ-आ, इ-ई, उ-ऊ, ए-ऐ, ओ-औ, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , म, , , , , श-ष, , , क्ष, त्र, ज्ञ, , श्र-श्रृ

पुस्तकें    
चराग़े-दिल जन-गण-मन सुराही
     
अ-आ  इ-ई उ-ऊ
अगर किसी ने यहाँ दिल से
अम्बर धरती उपर नीचे ...
अच्छे बुरे की पहचान...
अजब दस्तूर
अजीब अन्दाज़ की ये ज़िन्दगी

अधूरापन
‘अनलहक़’ जिसने कहा
अपनी करनी का ज़माना ...
अपनी ज़ुल्फों को
अपने आप से लड़ता मैं
अपने बचपन का सफ़र
अपने सिरहाने के पत्तों ...
अपने ही परिवेश से अंजान है
अब ख़ुशी की हदों के पार हूँ मैं
अब तो घबरा के ये कहते हैं
अब दो आलम से
अब नये शहरों के
अब नहीं देखता ख़्वाब ....
अब मकाँ होते हैं कभी घर ..

अब साथ भी उनका रहे ...
अबकी बार दिवाली में
अय्याम ने
अरमां है, तुम्हारे दर्दे गम की
अश्क़ बन कर जो ...
असलियत कम गुमान ज्यादा दे
आँख उनसे मिली तो सजल ...
आँखें
आँखें मेरी तलवों से मल ..
आइने कितने यहाँ टूट चुके
आईने के रूबरू
आईने ने सुना दी कहानी मिरी
आईनों की तरह दिल को भी
आए मुश्किल
आज
आज का राँझा हीर बेच गया
आज जिएं कल मरना है 
आप अगर हम को
आप जब टकटकी लगाते हैं
आप तो बस अपना ही...
आपका दिल जब समंदर ..
आपके जैसा प्यारा साथी
आपके हर ग़म को सीने से
आपको अपनी अदा की.....
आपने पूछा मुझे तो ...
आवारा हैं गलियों में मैं...
आब-ए-हैवाँ दे दे
आशना हो कर कभी नाआशना
आस्तीनों मे साँप हैं ...

इंसानियत के वाक़ये दुशवार...
इन्तज़ार रहता है
इन्सान की हर ख्वाहिश..

इतना भी ज़ब्त मत कर
इरादा वही जो अटल ..
इश्क़
इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे
ईद उल फ़ितर
ईमानदारी से चला ...

उदास गीत कहाँ वादियों ने ..
उनका तो ये मज़ाक रहा ...
उनकी फ़ितरत ही जब ...
उनके लिये तो वो होली ...
उनको समझा न मैं ...
उनसे यूँ जुदा होकर फिर ..
ल्फ़त या इबादत
उस शिकारी से ये पूछो
उसपे मर मिटने का ...
उसी को कुछ कहते ...
   

- ऊपर

ए-ऐ ओ-औ
एक जू-ए-दर्द से जिगर...
एक टूटी छत लिए ...
एक बार रुख़े रोशन से
एक वो तेरी याद का लम्हा
एक सवाल
एहसास
ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
ऐसे तुम मुझको बेरुख़ी से

औरतों के जिस्म पर ...

कब तक
कभी बादल कभी बिजली...
कभी रंजो अलम के गीत मैं ..
कटे थे कल जो यहाँ
क़तरे को इक दरिया समझा
करवट
कर के बेदर्द ज़माने के...
कल और आज
कल अचानक ज़िन्दगी मुझ ..
कल गए थे जिसे...
कसमसाता बदन रहा मेरा
कह दिया वो साफ़ जो ....
कहने को तो उनकी वो
कहने लगे बच्चे कि ...
कागज़ के फूल
काफ़ी है
कितने पिये है दर्द के..
किरदार
किसी कविता को पहले ..
किस तरह ख़ाना ख़राबां ...
किसने सोचा धूपबत्ती राख..
काफ़ी है
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी...
कुछ वो पागल है ...
कुछ सदा में रही कसर शायद
कुर्बत इतनी न हो कि..
केवल फूल भला लगता है
कैसे उसको छोड़ूँ ...
कैसे कह दूँ, जिसे दिल में ..
कौन करता याद
क्या उम्मीद करें उनसे
क्या जवाब देंगे हम
क्या जवाब दोगे..
क्या पता उस को कि वो ...
क्या मिलना है भगदड़ में
क्या होगा अंजाम, न पूछ
क्यूँ ऐसा अक्सर लगता है
क्यों?
क्यों काँटे है चुभाता!
क्यों न हम दो शब्द ...
    - ऊपर
खत जो काजल की लकीरों से..
ख़लिश से गुज़रते रहे जो
ख़ामोशी ख़ुद अपनी सदा हो
ख़ार राहों के फूलों में ..
खु़द अपना बारे-गम ...

खुदा अपना भी तो है यारो !

खुशबुओं की तरह महकते गए
खुशबू वतन की
खून से मेंहदी रचाते हैं
खेतों कुओं पै वादों के खम्बे..
खेल कुर्सी का है यार यह
खो गए चाँदनी रात में

ग़म अगर दिल को मिला ..
ग़म का सितारा
ग़म नहीं हो तो ज़िंदगी ...
ग़मे-हस्ती के सौ बहाने हैं

गर बेटियों का कत्ल यूँ ही
ग़रीबी रोग से हर दिन.....

गीत ऐसा कि जैसे कमल

गुफ़्तगू इससे भी करा कीजे
घर में वो जब भी आया होगा
घर में तलाश कर लिये
घरों के द्वार से परदे उड़ा
    - ऊपर
चढ़ते दरिया को अभी पार
चढ़ा था जो सूरज
चराग़ों ने अपने ही ...
चाँद तारों का सफ़र कर लें हम
चाँद हर रोज़
चिराग हो के न हो दिल...
चुभन
चुभा काँटा चमन का

चेहरों पर हों कुछ उजाले ...

छायी थी मुझ पे बेख़ुदी ...
छीन ली मौसमों ने है ..
छोटी सी बिगड़ी बात को...
छोड़े हुए गो उसको हुए है..

ज़ख़्‍म भी देते हैं मरहम ...
जब कभी मैं अपने अंदर ...
जब तलक़ आसमान बाक़ी है
जब दिलों में प्यार का ...
जब दुख में अबला रोती है
जब नहीं तुझको यक़ीं अपना
जब पुराने रास्तों पर से
जब मेरी याद सताए तो
जब से आबाद है लहूखाना
जब से गई है माँ ..
जबीं पर जिस के मेरा नाम ..
ज़माना ख़राब है
ज़माने से रिश्ता बनाकर..
ज़रा बता
ज़रूरी तो नहीं
जहाँ उम्मीद हो ना मरहम..
जाओ शीशे का बदन ले के..
जान उन बातों का मतलब
जाना ही था तो ज़िंदगी में ...
जाने कहाँ चले गये
जाने कितने ही उजालों का
जाने किन बातों की
जाने कैसे  

जाम हम बढ़के उठा लेते
जिसकी आँख से आँसू ...
जिसके मुँह में मिठास होती है
जिसने ताउम्र अँधेरा सहा है
जिससे थोड़ा लगाव होने लगा
जिसे नसीब ने बख्शा उसे ..
ज़िन्दगी का सामना ...

ज़िन्दगी को मज़ाक में लेकर्
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती ...
ज़िंदगी भर यही सोचता..
ज़िन्दगी से दूर
जीते रहने की सज़ा से
जुगाड़
जुदाई
ज़ेह्न में और कोई डर नहीं
ज़ेह्न में उसके खिड़कियाँ ..
जैसा बोएँ वैसा प्यारे पाएँगे
जैसा सोचा था जीवन ...
जो ग़म है सीने में ...
जो पल कर आस्तीनों में
जो लोग जान बूझ के
जो लोग मरते थे कभी ...

    - ऊपर
झलक
झूट जब बोला तो ताली हो गई
झूठ को  सच बनाइए साहब

झूमकर नाचकर गीत गाओ
टूट जाने तलक गिरा मुझको ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा नहीं...
    - ऊपर
डूब चुके कितने अफ़साने
डूबना था हमको देखो, ...
ढूँढती हूँ...
पते हैं ना रोते हैं ना ...

तप कर गमों की आग में

तपते सहरा में समुन्दर ..
तर्जुमानी जहान की, की है
ताज़गी कुछ नही हवाओं में
तिनकों में आग लगाकर ..
तिरे ख़्याल के साँचे में ढलने..
तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
तुमसे मिलना बातें करना
तुम्हें पा रहा हूँ
तू न अमृत का पियाला दे हमें
तू मेरी सोच पे हावी है
तेरी रहमतों में सहर नही
तेरी महक
तेरे होने से
तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
    - ऊपर
 

दर्द के क़िस्सों की ख़ातिर

दायरे से वो निकलता ...
दावत बुला के धोखे से
दिन का आगाज़

दिन को भी इतना अन्धेरा है
दिल का मेरे
दिल के छालों का ज़िक्र ...
दिल तड़पकर रह गया ...
दिल तो दिल है दिल की बाते
दिल दीवाना एक तरफ़
दिल न मुझसे कभी...
दीन दुनिया धर्म का ..
दीवारो-दर थे, छत थी
दुआ में तेरी असर हो कैसे
दुख में हो जिनकी आँखें तर
दुःखों की बस्तियों में तो, ...
दुखों के दिन मेरे सुख में

दुनियाँ में ईमान धरम ....
दूध पी के भी नाग डसते हैं
दूर बस्ती से जितना घर होगा
दूर से आए थे साक़ी
देख, ऐसे सवाल रहने दे
देखना है वो मुझ पर
दोस्तों का है अजब ढब
दौड़ कर बाप से लिपटा...
धर्म के हथियार
धुँधली धुँधली किसकी है
धूप क्या है और साया क्या
धूप बनकर फैल जाओ
    - ऊपर
न ग़ुबार में न गुलाब में
न तो इंसां न अप्सरा कोई
नज़्रे-शिव
न रोक पाई मेरी आस्तीन ..
न वापसी है जहाँ से
नयी
नये साल में
नहीं  अब ओ हिलते हैं ...
नहीं कि मिलने मिलाने का
ना मिली छाँव कहीं यूँ ....

नाकर्दा गुनाहों की मिली ..
नाम दुनिया में कमाना चाहिये

पंख थे परवाज़ की हिम्मत..

पड़ा था लिखना मुझे ..

परछाइयाँ
परेशान है आदमी
पर्दा हटाया ही कहाँ है?
पहचान

पहली नज़र में हमको ...
प्यार का वादा करके मुकरना
प्यार की तान जब लगाई है
प्यार में उनसे करूँ शिकायत.
पिघलकर पर्वतों से हमने
पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन
फिर से मौसम बहारों का ...
फ़िसादो दर्द और दहशत में..
फ़ुरसत से घर में आना तुम
फूल उनके हाथ में जँचते नहीं
फूल तो खिलते हैं
फूलों की आरजू में
फूलों की टहनियों पे
फैसले की घड़ी जो आयी हो
बंज़र ज़मीं
बंदा था मैं खुदा का
बच्चों पर दिन भारी देखे
बजा दे काश! ये किस्मत ...

बड़े हौले से उसने आज ...
बदलना चाहो भी तो

बरसती बारिशों की धुन पे
बस फकत अटकलें लगाते है
बहता रहा जो दर्द
बहारों का आया है मौसम सुहाना
बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस
बाग जैसे गूँजता है पंछियों से
बातें
बारिशों में भीग जाना सीखिये
बिन बरसा इक बादल-सा
बीच में पर्दा दोयी का था ..
बे रहम सच ने ...
बेशक बचा हुआ कोई भी
बे सबब जो सफ़ाई देता है
बेहतर है
भटके हैं तेरी याद में ...
भरम पाला था मैंने
मंत्री बनाओ तो कोई बात बने
मजबूरी के मौसम में
मछेरा ले के जाल आया है
मनुज आजन्म गंदा न था
मस्त सब को कर गई ..
मान लूँ मैं ये करिश्मा....

माना इसकी निढाल चाल नहीं

माथे पे बिंदिया चमक रही
मालूम नहीं उनको ये ..
मिज़ाज पूछने आए.....
मिलके चलना बहुत ज़रूरी है
मिले किसी से नज़र तो

माना कड़ी धूप है

मायूस न हो ऐ दिल
मुन्सिफ़ों सलीबों पर फ़ैसले ..
मुख़्तसर, मुख़्तसर, मुख़्तसर
मुझको अपना एक पल ...
मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
मुलाक़ात
मुल्क तूफ़ाने-बला की ज़द में है
मुहब्बत का जुनूँ ...

मुसलमान कहता मैं उसका हूँ
मुहब्बत का ही इक मोहरा ...

मेरा रोशनी से कोई नाता नहीं
मेरा शुमार कर लिया
मेरा सफ़र
मेरा साया मुझे हर वक़्त
मेरी आँखों में किरदार ....
मेरी उम्मीदों को नाकाम ...
मेरी चाहतें

मेरी मज़ार पे एक चिराग़ ...

मेरी दुनियाँ
मेरी नज़रों का धोखा हो
मेरी मंज़िल का पता दे
मेरे गीतों मेरी ग़ज़लों को
मेरे दिल से मिलाए तो कोई !!
मेरे बाद किधर जाएगी तन्हाई
मेरे भीतर महक रहा है
मेरे हिस्से में ये टूटा हुआ ..
मैं
मैं काला तो हूँ, आप जितना..
मैं ख़ुशी से रही बेख़बर
मैं जानता था उसने ही ....
मैं तन्हा हूँ ये दरिया में
मैं तो गूँगी थी तुम भी....
मैं तो साहिल पे आकर रहा...

मैं दर्द पिया करता हूँ !
मैं ढूँढती हूँ जिसे वो
मैं मुम्बई हूँ
मोहब्बत के जज़्बे ...
मोहब्बत में अश्क़ की कीमत
मौसम को इशारों से
मौसम बदला सा
- ऊपर
यह उजाला तो नहीं
या बहारों का ही ये मौसम...
याद आये तो
याद की बरसातों में
याद भी आते क्यूँ हो
यादों के नग़मे
यार को मैंने मुझे यार ...
यूँ उसकी बेवफाई का....
यूँ तो बड़ा अलाल तू
यूँ पवन, रुत को रंगीं बनाये
यूँ ही रोज हमसे, मिला कीजिए
ये आग
ये आरजू थी तुझे गुल के ...

ये किस कुसूर की सज़ा
ये किसका खून बह रहा है...
ये कौन छोड़ गया इस पे
ये कौन दे रहा है यूँ दस्तक़
ये तो तय है मुश्किल से
ये धूपछाँव क्या है ये ...
ये न कह पाऊँगा कि ....

रमज़ान बीता तो रवायत ..

राज़ अपने तुमको बताती..
रिश्तों से अब डर लगता है
रुलाया था बहुत तुमने, ...
रूबाईयाँ डॉ. सुरेन्द्र भुटानी 
रूह को मौत नहीं आती
रेत का घर जो अब बनाया..

रोटियाँ

रोशनी देने इस ज़माने को
लबों पे
लम्हा इक छोटा सा ....
लहू का रंग एक है
लाया था जो हमारे लिये ...
लोग हसरत से हाथ मलते हैं
    - ऊपर
श-ष
वक्त उड़ता सा  चला जाता है
वक़्त की गहराइयों से
वक्‍़त भी कैसी पहेली दे गया
व्यथा
वो तनहाई वो गलबंहियाँ
वो ना महलों की ऊँची शान..
वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
वो महफ़िलें, वो शाम सुहानी ..
वो लम्हे !
वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई
शक यकीनों में जब बदलतें
शबनमी धूप के आँगन में..
शहर में जो भी मिला
शाम हो जाम हो सुबू भी हो
शायद अभी है राख में
शीशे के मेरे घर के हैं ...
शून्य से शिखर हो गए
शैदाई समझ कर जिसे ...

संभल न पाना आँचल का
सज़ा-ए-मौत दो
सड़कें ख़ून से लाल हुईं
सपना तब तक ही सुंदर है
सब कुछ अपने मन का ही हो

सब खामोश हैं यहाँ कोई...
सबका मन अपना दुश्मन है

सबकी सुनना, अपनी करना
सबसे दिल का हाल न कहना

सबू को दौर में लाओ
समेटे सब को अपने में ...
साँप की मानिंद वोह....
साग़र से लब लगा के
साथ मेरे रही उम्र भर ज़िंदगी
साथ रहते है
सामने काली अँधेरी रात
साया बनकर साथ चलेंगे...
सारी दुनिया के सवालों से

सिफर का सफ़र

सिर्फ ख़यालों में न रहा कर
सीधी बातें सच्ची बातें
सुख-दुःख में जो साथ चले हैं
सुन तो सही जहां में है तेरा ..
सुबह होती है तो दफ़्तर ..
सुराग भी न मिले अजनबी ..
सुर्ख़ होठों पे उँगलियों ...
सूरज की हर किरन
सैंकड़ों ग़म दिल पे अपने...
सो नहीं मैं पाता हूँ
सोच की चट्टान पर बैठी रही
सोच को मेरी नई वो
सोचते रहने से फ़तह कहाँ...
सोचते ही ये अहले-सुख़न...
    - ऊपर
क्ष त्र
हँसकर दिल पे ज़ख़्म ...
हँसी-घरों में वो शीशे दिखाई ..
हँस के बोला करो
हज़ार क़िस्से सुना रहे हो
हद्दे-नज़र तक अपने सिवा ..
हम उठे तो जग उठा
हम ज़िन्दगी के साथ चलते चले

हम ले के अपना माल जो..

हमेशा है वस्ल-ए-जुदाई
हर कोई कह रहा है ...
हर चेहरे पर डर दिखता है
हर दम मेरे पास रहा है
हर बस्ती-बस्ती में जल रहे
हर सम्त एक भीड़ - से ..
हवा-ए-शहर यहाँ किस तरह...
हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले
हसरत
हसरतों की इमलियाँ
हाथ पकड़कर अनुज को अपने
हिचकियाँ
हिज्र में उसके जल रहे जैसे
हुज़ूर, आप तो जा पहुँचे
हुनर सीख लिया
है भँवरे को जितना कमल..

होके अपना कोई क्यूँ छूट..

   
    - ऊपर
ज्ञ  
    १९८४ का पंजाब
    - ऊपर