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05.12.2008

अ-आ, इ-ई, उ-ऊ, ए-ऐ, ओ-औ, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , म, , , , , श-ष, , , क्ष, त्र, ज्ञ, , श्र-श्रृ

     
अ-आ  इ-ई उ-ऊ
अम्बर धरती उपर नीचे ...
अच्छे बुरे की पहचान...
‘अनलहक़’ जिसने कहा
अपनी करनी का ज़माना ...
अपनी ज़ुल्फों को
अपने सिरहाने के पत्तों ...
अब ख़ुशी की हदों के पार हूँ मैं
अब तो घबरा के ये कहते हैं
अब दो आलम से
अब नये शहरों के
अब नहीं देखता ख़्वाब ....
अब मकाँ होते हैं कभी घर ..

अरमां है, तुम्हारे दर्दे गम की
असलियत कम गुमान ज्यादा दे
आँख उनसे मिली तो सजल ...
आँखें
आँखें मेरी तलवों से मल ..
आईने ने सुना दी कहानी मिरी
आए मुश्किल
आज का राँझा हीर बेच गया
आप अगर हम को
आप जब टकटकी लगाते हैं
आप तो बस अपना ही...
आपका दिल जब समंदर ..
आपके जैसा प्यारा साथी
आपको अपनी अदा की.....
आपने पूछा मुझे तो ...
आब-ए-हैवाँ दे दे
आस्तीनों मे साँप हैं ...

इतना भी ज़ब्त मत कर
इन्तज़ार रहता है
इन्सान की हर ख्वाहिश..

इरादा वही जो अटल ..
इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे
ईमानदारी से चला ...

उदास गीत कहाँ वादियों ने ..
उनका तो ये मज़ाक रहा ...
ल्फ़त या इबादत
उस शिकारी से ये पूछो
उसी को कुछ कहते ...
   

- ऊपर

ए-ऐ ओ-औ
एहसास
ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे

औरतों के जिस्म पर ...

कभी बादल कभी बिजली...
कभी रंजो अलम के गीत मैं ..
क़तरे को इक दरिया समझा
करवट
कर के बेदर्द ज़माने के...
कल और आज 
कल अचानक ज़िन्दगी मुझ ..
कल गए थे जिसे...
कसमसाता बदन रहा मेरा
कह दिया वो साफ़ जो ....
कहने लगे बच्चे कि ...
कितने पिये है दर्द के..
किरदार
किस तरह ख़ाना ख़राबां ...
किसने सोचा धूपबत्ती राख..
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी...
कुछ सदा में रही कसर शायद
केवल फूल भला लगता है
कैसे कह दूँ, जिसे दिल में ..
कौन करता याद
क्या उम्मीद करें उनसे
क्या जवाब देंगे हम
क्या जवाब दोगे..
क्या पता उस को कि वो ...
क्या मिलना है भगदड़ में
क्यों?
क्यों न हम दो शब्द ...
    - ऊपर
खत जो काजल की लकीरों से..
ख़लिश से गुज़रते रहे जो
ख़ामोशी ख़ुद अपनी सदा हो
ख़ार राहों के फूलों में ..
खुशबू वतन की
खून से मेंहदी रचाते हैं
खेतों कुओं पै वादों के खम्बे..
खेल कुर्सी का है यार यह
खो गए चाँदनी रात में

ग़म नहीं हो तो ज़िंदगी ...

ग़रीबी रोग से हर दिन.....

गीत ऐसा कि जैसे कमल

गुफ़्तगू इससे भी करा कीजे
घर में वो जब भी आया होगा
घर में तलाश कर लिये
    - ऊपर
चढ़ा था जो सूरज
चराग़ों ने अपने ही ...
चाँद तारों का सफ़र कर लें हम
चाँद हर रोज़
चिराग हो के न हो दिल...
चुभन
चुभा काँटा चमन का

चेहरों पर हों कुछ उजाले ...

छायी थी मुझ पे बेख़ुदी ...
छीन ली मौसमों ने है ..

ज़ख़्‍म भी देते हैं मरहम ...
जब कभी मैं अपने अंदर ...
जब तलक़ आसमान बाक़ी है
जब दिलों में प्यार का ...
जब दुख में अबला रोती है
जब पुराने रास्तों पर से
जब मेरी याद सताए तो
जब से आबाद है लहूखाना
जब से गई है माँ ..
जबीं पर जिस के मेरा नाम ..
ज़माना ख़राब है
ज़माने से रिश्ता बनाकर..
ज़रूरी तो नहीं
जहाँ उम्मीद हो ना मरहम..
जाओ शीशे का बदन ले के..
जान उन बातों का मतलब
जाना ही था तो ज़िंदगी में ...
जाने किन बातों की
जाने कैसे  

जाम हम बढ़के उठा लेते
जिसके मुँह में मिठास होती है
जिसे नसीब ने बख्शा उसे ..
ज़िन्दगी का सामना ...

ज़िन्दगी को मज़ाक में लेकर्
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती ...
ज़िन्दगी से दूर
जीते रहने की सज़ा से
जुगाड़
जुदाई
ज़ेह्न में उसके खिड़कियाँ ..
जैसा बोएँ वैसा प्यारे पाएँगे
जो लोग जान बूझ के
जो लोग मरते थे कभी ...

    - ऊपर
झूट जब बोला तो ताली हो गई
झूठ को  सच बनाइए साहब
टूट जाने तलक गिरा मुझको ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा नहीं...
    - ऊपर
डूब चुके कितने अफ़साने ढूँढती हूँ...
पते हैं ना रोते हैं ना ...

तप कर गमों की आग में

तपते सहरा में समुन्दर ..
तर्जुमानी जहान की, की है
ताज़गी कुछ नही हवाओं में
तिनकों में आग लगाकर ..
तिरे ख़्याल के साँचे में ढलने..
तू न अमृत का पियाला दे हमें
तेरी रहमतों में सहर नही
तेरी महक
तेरे होने से
तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
    - ऊपर
 

दावत बुला के धोखे से

दिन को भी इतना अन्धेरा है
दिल का मेरे
दिल के छालों का ज़िक्र ...
दिल तड़पकर रह गया ...
दिल तो दिल है दिल की बाते
दिल न मुझसे कभी...
दीन दुनिया धर्म का ..
दीवारो-दर थे, छत थी
दुआ में तेरी असर हो कैसे
दुख में हो जिनकी आँखें तर
दुःखों की बस्तियों में तो, ...
दुखों के दिन मेरे सुख में

दुनियाँ में ईमान धरम ....
दूध पी के भी नाग डसते हैं
देखना है वो मुझ पर
दोस्तों का है अजब ढब
दौड़ कर बाप से लिपटा...
धुँधली धुँधली किसकी है
धूप क्या है और साया क्या
धूप बनकर फैल जाओ
    - ऊपर
न ग़ुबार में न गुलाब में
न रोक पाई मेरी आस्तीन ..
नहीं  अब ओ हिलते हैं ...
नहीं कि मिलने मिलाने का
ना मिली छाँव कहीं यूँ ....

नाकर्दा गुनाहों की मिली ..
नाम दुनिया में कमाना चाहिये

पंख थे परवाज़ की हिम्मत..

पड़ा था लिखना मुझे ..

परछाइयाँ
परेशान है आदमी
पर्दा हटाया ही कहाँ है?
पहचान

पहली नज़र में हमको ...
प्यार में उनसे करूँ शिकायत.
पिघलकर पर्वतों से हमने
फिर से मौसम बहारों का ...
फ़िसादो दर्द और दहशत में..
फ़ुरसत से घर में आना तुम
फूल उनके हाथ में जँचते नहीं
फूल तो खिलते हैं
फूलों की आरजू में
फूलों की टहनियों पे
फैसले की घड़ी जो आयी हो
बंज़र ज़मीं
बंदा था मैं खुदा का
बजा दे काश! ये किस्मत ...

बड़े हौले से उसने आज ...

बस फकत अटकलें लगाते है
बहता रहा जो दर्द
बहारों का आया है मौसम सुहाना
बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस
बीच में पर्दा दोयी का था ..
बेहतर है
भटके हैं तेरी याद में ...
भरम पाला था मैंने
मंत्री बनाओ तो कोई बात बने
मजबूरी के मौसम में
मनुज आजन्म गंदा न था
मस्त सब को कर गई ..
मान लूँ मैं ये करिश्मा....

माना इसकी निढाल चाल नहीं

माथे पे बिंदिया चमक रही
मिज़ाज पूछने आए.....
मिले किसी से नज़र तो
मायूस न हो ऐ दिल
मुन्सिफ़ों सलीबों पर फ़ैसले ..
मुख़्तसर, मुख़्तसर, मुख़्तसर
मुझको अपना एक पल ...
मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
मुल्क तूफ़ाने-बला की ज़द में है
मुहब्बत का जुनूँ ...

मुसलमान कहता मैं उसका हूँ
मुहब्बत का ही इक मोहरा ...

मेरा शुमार कर लिया
मेरी आँखों में किरदार ....

मेरी मज़ार पे एक चिराग़ ...

मेरी दुनियाँ
मेरे गीतों मेरी ग़ज़लों को
मेरे दिल से मिलाए तो कोई !!
मेरे बाद किधर जाएगी तन्हाई
मैं काला तो हूँ, आप जितना..
मैं ख़ुशी से रही बेख़बर
मैं जानता था उसने ही ....
मैं तन्हा हूँ ये दरिया में
मैं तो गूँगी थी तुम भी....
मैं तो साहिल पे आकर रहा...

मोहब्बत के जज़्बे ...
मोहब्बत में अश्क़ की कीमत
मौसम को इशारों से
- ऊपर
या बहारों का ही ये मौसम...
याद आये तो
याद की बरसातों में
याद भी आते क्यूँ हो
यादों के नग़मे
यार को मैंने मुझे यार ...
यूँ उसकी बेवफाई का....
यूँ तो बड़ा अलाल तू
यूँ पवन, रुत को रंगीं बनाये
यूँ ही रोज हमसे, मिला कीजिए
ये आरजू थी तुझे गुल के ...

ये धूपछाँव क्या है ये ...
ये किसका खून बह रहा है...

रमज़ान बीता तो रवायत ..

राज़ अपने तुमको बताती..
रुलाया था बहुत तुमने, ...
रूह को मौत नहीं आती
रेत का घर जो अब बनाया..
रोशनी देने इस ज़माने को
लम्हा इक छोटा सा ....
लाया था जो हमारे लिये ...
लोग हसरत से हाथ मलते हैं
    - ऊपर
श-ष
वक्त उड़ता सा  चला जाता है
वक़्त की गहराइयों से
वक्‍़त भी कैसी पहेली दे गया
वो तनहाई वो गलबंहियाँ
वो ना महलों की ऊँची शान..
वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
वो लम्हे !
वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई
शक यकीनों में जब बदलतें
शबनमी धूप के आँगन में..
शहर में जो भी मिला
शाम हो जाम हो सुबू भी हो
शायद अभी है राख में
शीशे के मेरे घर के हैं ...

सज़ा-ए-मौत दो
सड़कें ख़ून से लाल हुईं

सब खामोश हैं यहाँ कोई...
सबका मन अपना दुश्मन है

सबकी सुनना, अपनी करना
सबसे दिल का हाल न कहना

सबू को दौर में लाओ
समेटे सब को अपने में ...
साँप की मानिंद वोह....
साग़र से लब लगा के
साथ मेरे रही उम्र भर ज़िंदगी
साथ रहते है
साया बनकर साथ चलेंगे...
सिफर का सफ़र

सिर्फ ख़यालों में न रहा कर
सुन तो सही जहां में है तेरा ..
सुबह होती है तो दफ़्तर ..
सुराग भी न मिले अजनबी ..
सूरज की हर किरन
सो नहीं मैं पाता हूँ
सोच की चट्टान पर बैठी रही
सोच को मेरी नई वो
सोचते ही ये अहले-सुख़न...
    - ऊपर
क्ष त्र
हँसकर दिल पे ज़ख़्म ...
हँसी-घरों में वो शीशे दिखाई ..
हँस के बोला करो
हज़ार क़िस्से सुना रहे हो
हद्दे-नज़र तक अपने सिवा ..
हम उठे तो जग उठा
हम ज़िन्दगी के साथ चलते चले

हम ले के अपना माल जो..

हमेशा है वस्ल-ए-जुदाई
हर कोई कह रहा है ...
हर दम मेरे पास रहा है
हवा-ए-शहर यहाँ किस तरह...
हसरतों की इमलियाँ
हाथ पकड़कर अनुज को अपने
हिचकियाँ
हिज्र में उसके जल रहे जैसे
हुनर सीख लिया
है भँवरे को जितना कमल..
   
    - ऊपर
ज्ञ श्र-श्रृ
     
    - ऊपर