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ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.09.2017

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पुस्तकें    
चराग़े-दिल जन-गण-मन सुराही
     
   
अँधेरा इस कदर फैला
अगर किसी ने यहाँ दिल से
अब यहाँ देखिये या वहाँ देखिये
अम्बर धरती उपर नीचे ...
अच्छे बुरे की पहचान...
अजब दस्तूर
अजीब अन्दाज़ की ये ज़िन्दगी

अधूरापन
अनबन हुई
अनलहक़ जिसने कहा
अपनी करनी का ज़माना ...
अपनी ज़ुल्फों को
अपने आँचल में ही छुपा ले माँ
अपने आप से लड़ता मैं
अपने पास न रखो
अपने बचपन का सफ़र
अपने सिरहाने के पत्तों ...
अपने ही परिवेश से अंजान है
अपनों ने
अब ख़ुशी की हदों के पार हूँ मैं
अब तो घबरा के ये कहते हैं
अब दो आलम से

अब नये शहरों के
अब नहीं देखता ख़्वाब ....
अब मकाँ होते हैं कभी घर ..

अब साथ भी उनका रहे ...
अब हमने हैं खोजी नयी ...
अब हर रोज दीये जलाने से
अबकी बार दिवाली में
अमीरज़ादों पे नहीं मिला
अय्याम ने
अरमां है, तुम्हारे दर्दे गम की
अर्क पिया सूरज का यारा
अश्क़ बन कर जो ...
असलियत कम गुमान ज्यादा दे
    - ऊपर
   
आँख उनसे मिली तो सजल ...
आँखें
आँखें मेरी तलवों से मल ..
आँसू लाख पीर पचहत्त
आइने कितने यहाँ टूट चुके
आईने के रूबरू
आईने ने सुना दी कहानी मिरी
आईनों की तरह दिल को भी
आए मुश्किल
आज
आजकल
आज का राँझा हीर बेच गया
आज के विद्वान्
आज जिएं कल मरना है 
आदमी को शहर, आप कहते..
आदमी ख़ुद से मिला हो तो
आप अगर हम को
आप जब टकटकी लगाते हैं
आप तो बस अपना ही...
आपका दिल जब समंदर ..
आपके जैसा प्यारा साथी

आपके दर पर दिवाना आ गया
आपके शहर का काम...
आपके हर ग़म को सीने से
आपको अपनी अदा की.....
आपको मैं मना नहीं सकता
"आपने क्या कभी ख़याल किया"
आपने पूछा मुझे तो ...
आवाज़ कौन
आवारगी फ़िजूल है
आवारा हैं गलियों में मैं...
आब-ए-हैवाँ दे दे
आशना हो कर कभी नाआशना
आसमान की ऊँचाई पाकर,
आसाँ सा काम
आपसे जब दोस्ती होने लगी

आस्तीनों मे साँप हैं ...
    - ऊपर
   
इंसान होना बाक़ी है
इंसानियत की मेरी बीमारी...
इंसानियत के वाक़ये दुशवार...
इन्तज़ार रहता है
इन्सान की हर ख्वाहिश..
इक कहानी तुम्हें मैं..
इक दीप जलाए बैठे हैं
इक न इक दिन
इतना भी ज़ब्त मत कर
इनकी ख़ुशबू से
इरादा वही जो अटल ..

इश्क़
इश्तिहार निकाले नहीं
इस ज़मीं के बागवाँ
इसे रोशनी दे, उसे रोशनी दे
    - ऊपर
   
ईद उल फ़ितर ईमानदारी से चला ...  
    - ऊपर
   
उजालों के ना जब तक आये..
उदास गीत हाँ वादियों ने ..
उन दिनों ये शहर...
उनका तो ये मज़ाक रहा ...
उनकी निगाहों के वार देखिये
उनकी फ़ितरत ही जब ...
उनके लिये तो वो होली ...
उनको समझा न मैं ...
उनसे यूँ जुदा होकर फिर ..
ल्फ़त या इबादत
उमर के साथ साथ किरदार
उस शिकारी से ये पूछो
उसका चहरा नज़र में आता है
उसकी तरफ़ इशारा
उसपे मर मिटने का ...
उसी को कुछ कहते ...
    - ऊपर
   
ऊँचे-ऊँचे महल बने    
    - ऊपर
   
एक जू-ए-दर्द से जिगर...
एक टूटी छत लिए ...
एक दिल सीने में
एक पल को भी नहीं आराम है
एक बार रुख़े रोशन से
एक वो तेरी याद का लम्हा
एक सवाल
एहसास
    - ऊपर
   
ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
ऐ सनम
ऐसे तुम मुझको बेरुख़ी से  
    - ऊपर
   
     
    - ऊपर
   
और क्या था औरतों के जिस्म पर ...  
    - ऊपर
   
कभी ख़ुद को ख़ुद से
कई ख़ुदा मुझको यहाँ तक....
कब तक
कभी तो अपनी हद से निकल
कभी दो चार दिन रोटी बिना
कभी बादल कभी बिजली...
कभी रंजो अलम के गीत मैं ..
कभी रातों को वो जागे...
कटी पतंग के डोर नहीं हम
कटे थे कल जो यहाँ
क़तरे को इक दरिया समझा
करवट
कर के बेदर्द ज़माने के...
कल और आज
कल अचानक ज़िन्दगी मुझ ..
कल गए थे जिसे...
कश्ती बिना पतवार के...
कसमसाता बदन रहा मेरा
कह दिया वो साफ़ जो ....
कहने को तो उनकी वो
कहने लगे बच्चे कि ...
कहते हैं आँसू मोतियों से ....
कहाँ गुज़ारा दिन कहाँ रात
काँटे पयम्बरों की तक़दीर में....
कागज़ के फूल
काफ़ी है
काबा कलीसा न कोई शिवाला है
काम ख़त्म कर लूँ सभी
काश! होता मज़ा कहानी में
कितने पिये है दर्द के..
किरदार
किस क़दर है तुमने ठुकराया मुझे
किसी कविता को पहले ..
किस तरह ख़ाना ख़राबां ...
किसने सोचा धूपबत्ती राख..
काफ़ी है
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी...
कुछ वो पागल है ...
कुछ लोग जी रहे हैं...
कुछ भी हो, अपने मसीहा को
कुछ सदा में रही कसर शायद
कुर्बत इतनी न हो कि..
कुवैत- जश्न ए आज़ादी
केवल फूल भला लगता है
कैसे उसको छोड़ूँ ...
कैसे कह दूँ, जिसे दिल में ..

कैसे बताऊँ कि वो ....
कोई न कोई चाहिए दुःख -सुख..
कौन करता याद

कौन परिन्दें को आ के
कौन मरना चाहता है
क्या उम्मीद करें उनसे
क्या जवाब देंगे हम
क्या जवाब दोगे..
क्या पता उस को कि वो ...
क्या मिलना है भगदड़ में
क्या लिखूँ ......
क्या होगा अंजाम, न पूछ
क्यूँ ऐसा अक्सर लगता है
क्यों?
क्योंकर तुम्हें गुमान है साहिब
क्यों काँटे है चुभाता!
क्यों न हम दो शब्द ...
    - ऊपर
क्ष    
     
    - ऊपर
   
खत जो काजल की लकीरों से..
ख़त लिखना तुम
ख़ला को छू के आना चाहता हूँ
ख़लिश से गुज़रते रहे जो
खाना-पीना
ख़ामोशी ख़ुद अपनी सदा हो
ख़ाक
ख़ार राहों के फूलों में ..
खाली प्याले, निचुड़े नीम्बू
खु़द अपना बारे-गम ...
खुदा अपना भी तो है यारो !
खुला नया बाज़ार यहाँ
खुले पंख
खुशबुओं की तरह महकते गए
खुशबू वतन की
खून से मेंहदी रचाते हैं
खेतों कुओं पै वादों के खम्बे..
खेल कुर्सी का है यार यह
खो गए चाँदनी रात में

ख़्वाब आते रहे!
    - ऊपर
ग़म अगर दिल को मिला ..
ग़म का सितारा
ग़म नहीं हो तो ज़िंदगी ...
ग़मे-हस्ती के सौ बहाने हैं
गर बेटियों का कत्ल यूँ ही
गर है कहीं तो आकर
गर्व की पतंग
ग़रीबी रोग से हर दिन.....
ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश...
गलियों गलियों शोर मचा है
गालियाँ माँ की दी नहीं होती

गीत ऐसा कि जैसे कमल

गुज़र (गुज़ारा)

गुफ़्तगू इससे भी करा कीजे
गुल की फ़ितरत भी ख़ार ...
- ऊपर
   
घर में तलाश कर लिये
घर में वो जब भी आया होगा
घर मेरा है नाम किसी का घरों के द्वार से परदे उड़ा
    - ऊपर
   
चढ़ते दरिया को अभी पार
चढ़ा था जो सूरज
चढ़ा हूँ मैं गुमनाम...
चमन की सैर पर सरकार...
चराग़ों ने अपने ही ...
चल पड़े हम उसी सफ़र के लिये
चाँद सूरज देख के ललचाते हैं
चाँद तारों का सफ़र कर लें हम
चाँद हर रोज़

चाहता हूँ
चाहे जिससे भी वास्ता रखना
चिराग हो के न हो दिल...
चुभन
चुभा काँटा चमन का

चेहरों पर हों कुछ उजाले ...
चोट गहरी है जो दिखती नहीं है
- ऊपर
   
छायी थी मुझ पे बेख़ुदी ...
छीन ली मौसमों ने है ..
छोटी सी बिगड़ी बात को...
छोड़े हुए गो उसको हुए है..
 
    - ऊपर
   
जंग छोड़कर जो भागे थे...
ज़ख़्‍म भी देते हैं मरहम ...
जगमगाती शाम लेकर ...
जज़्बात दिल में अगर
जब कभी मैं अपने अंदर ...
जब हमें ख़ुद नहीं है ख़ुद ही....
जब जब
जब तक निजी है पूँजी..
जब तलक़ आसमान बाक़ी है
जब दिलों में प्यार का ...
जब दुख में अबला रोती है
जब नहीं तुझको यक़ीं अपना
जब पुराने रास्तों पर से
जब मेरी याद सताए तो
जब से आबाद है लहूखाना
जब से गई है माँ ..
जबीं पर जिस के मेरा नाम ..
ज़माना ख़राब है
ज़माना मुझको आँखों पर
ज़माने से रिश्ता बनाकर..
ज़मीं उनकी है ...
ज़रा बता
ज़रूरी तो नहीं
जले जंगल में
जहाँ उम्मीद हो ना मरहम..
जां से बढ़कर है आन भारत की
जाओ शीशे का बदन ले के..
जान उन बातों का मतलब
जान से ज़्यादा प्यारी यादें
जाना ही था तो ज़िंदगी में ...
जाने कहाँ चले गये
जाने कितने ही उजालों का
जाने किन बातों की
जाने कैसे  

जाम हम बढ़के उठा लेते
ज़िन्दगी इक सराब हो जैसे
ज़िन्दगी उम्मीद पर
ज़िन्दगी का सामना ...
ज़िन्दगी को मज़ाक में लेकर्
ज़िंदगी चलती रहेगी
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती ...
ज़िंदगी भर यही सोचता..
ज़िन्दगी से दूर
ज़िन्दगी है गिरती दीवार.
जिस रोज़ हर पेट को
जिसकी आँख से आँसू ...
जिसकी सुखी है हर समय..
जिसकी है नमकीन ज़िन्दगी
जिसके मुँह में मिठास होती है
जिसने ताउम्र अँधेरा सहा है
जिससे थोड़ा लगाव होने लगा
जिसे नसीब ने बख्शा उसे ..

जीते रहने की सज़ा से
जीने नहीं दिया
जुगाड़
जुदाई
जुर्म की यूँ दास्तां लिखना
ज़ेह्न में और कोई डर नहीं
ज़ेह्न में उसके खिड़कियाँ ..
जैसा बोएँ वैसा प्यारे पाएँगे
जैसा सोचा था जीवन ...
जैसे भी हो, थोड़े-बहुत उजाले
जो ख़ुद टूटते हैं
जो ग़म मिला वफ़ा का
जो ग़म है सीने में ...
जो पल कर आस्तीनों में
जो लोग जान बूझ के
जो लोग मरते थे कभी ...

जो वफ़ा की बात करते हैं
जो व्यवस्था भ्रष्ट हो
    - ऊपर
ज्ञ    
     
    - ऊपर
   
झलक
झिलमिल-झिलमिल जादू-टोना
झील समंदर दरिया हैं
झूट जब बोला तो ताली हो गई
झूठ को  सच बनाइए साहब

झूठे अभिनय में बेहुनर हूँ मैं
झूमकर नाचकर गीत गाओ
- ऊपर

   
टूट जाने तलक गिरा मुझको    
    - ऊपर
   
ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा नहीं...    
    - ऊपर
   
डरता है वो कैसे घर से...
डूब चुके कितने अफ़साने
डूबना था हमको देखो, ...  
    - ऊपर
   
ढूँढती हूँ...    
    - ऊपर
   
पते हैं ना रोते हैं ना ...
तन्हा हुआ सुशील

तप कर गमों की आग में

तपते सहरा में समुन्दर ..
तरुणाई को चुप कराना
...
तर्क ए वफ़ा
तर्जुमानी जहान की, की है
तलवारें दोधारी क्या
तसल्लियाँ ही झूठी दे के
ताक में शैतान बैठा
ताज़गी कुछ नही हवाओं में
तिनकों में आग लगाकर ..
तिरे ख़्याल के साँचे में ढलने..
तीरगी से रोशनी का हो गया
तीरो-तलवार से नहीं होता
तुझ से मुकम्मल थी ज़िन्दगी
तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
तुम इस शहर में सुकूँ ढूँढते हो
तुम क्या आना जाना भूले
तुम नज़र भर ये
तुमने पुरखों की हवेली बेच दी
तुमसे मिलना बातें करना
तुम्हारी बात
तुम्हें पा रहा हूँ

तूफ़ानों में उनके छोड़ जाने...
तू न अमृत का पियाला दे हमें
तू मेरी सोच पे हावी है
तेरी दुनिया नई नई है क्या
तेरी महक
तेरी रहमतों में सहर नही
तेरी हर बात पर हम ...
तेरे आगोश में
तेरे इंतज़ार में
तेरे होने से
तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
- ऊपर
त्र    
     
    - ऊपर
   
थककर चूर    
    - ऊपर
   
दर्द के क़िस्सों की ख़ातिर
दहेज
दर्द देगी यहाँ साफ़गोई सदा
दायरे से वो निकलता ...
दावत बुला के धोखे से
दिन का आगाज़
दिन को भी इतना अन्धेरा है
दिल का मेरे
दिल के छालों का ज़िक्र ...
दिल के सोये हुए जज़्बात...
दिल तड़पकर रह गया ...
दिल तो दिल है दिल की बाते
दिल दीवाना एक तरफ़
दिल न मुझसे कभी...
दिल बेक़रार क्यों है?
दिल मिरा जब किसी से ...
दिल मिरा ये सोचकर हैरान है
दिल से उसके
दिल से न लगाने का
दीन दुनिया धर्म का ..

दीवार
दीवारो-दर थे, छत थी
दुआ में तेरी असर हो कैसे
दुख में हो जिनकी आँखें तर

दुःखों की बस्तियों में तो, ...
दुखों के दिन मेरे सुख में
दुनियाँ में ईमान धरम ....
दूध पी के भी नाग डसते हैं
दूर बस्ती से जितना घर होगा
दूर से आए थे साक़ी
देख, ऐसे सवाल रहने दे
देखता ही रह गया
देखना है वो मुझ पर
देखो मेरा वक़्त ये
देर तक
दोस्तों का है अजब ढब
दौड़ कर बाप से लिपटा...
    - ऊपर
   
धर्म के हथियार
धुँधली धुँधली किसकी है
धूप क्या है और साया क्या
धूप ने जाल यूँ बिछाया है
धूप बनकर फैल जाओ
    - ऊपर
   
न ग़ुबार में न गुलाब में
न चाहा बेवफ़ा की याद में...
न तो इंसां न अप्सरा कोई
नज़्रे-शिव
न रोक पाई मेरी आस्तीन ..
न वापसी है जहाँ से

नदी बहती रहे जब तक
नयी
नए मकां है....
नज़र को चीरता जाता है मंज़र
नज़र में रौशनी है
नफ़रत की बातें वो घर-घर करेगा
नये साल में
नहीं  अब ओ हिलते हैं ...
नहीं कि मिलने मिलाने का

नहीं सीने में दिल मेरा
ना मिली छाँव कहीं यूँ ....
नाकर्दा गुनाहों की मिली ..
नाम अपना किसान है साहब
नाम दुनिया में कमाना चाहिये
नेता में खोट है
    - ऊपर
   
पंख खोले उड़ान तो
पंख थे परवाज़ की हिम्मत..
पंछियों के उग गए पर आजकल
पतझड़ में सावन देखा है
पड़ा था लिखना मुझे ..
परछाइयाँ
परिंदा
परेशान है आदमी
पर्दा हटाया ही कहाँ है?
पहचान
पहली नज़र में हमको ...

पा रहा दिल यहाँ साथ भरपूर है
पीड़ा से इक आँसू फूटा
प्यार का दर्द भी काम आएगा
प्यार का वादा करके मुकरना
प्यार की तान जब लगाई है
प्यार में उनसे करूँ शिकायत.
प्यार मेरे द्वार आया
पिघलकर पर्वतों से हमने
पृष्ठ तो इतिहास के जन-जन
    - ऊपर
   
फ़न क्या है फ़नकारी क्या
फ़रेब नज़र का
फ़साद से
फ़िक्र
फिर से मौसम बहारों का ...
फ़िसादो दर्द और दहशत में..
फ़ुरसत से घर में आना तुम
फूल उनके हाथ में जँचते नहीं
फूल तो खिलते हैं
फूल पत्थर में खिला देता है
फूलों की आरजू में
फूलों की टहनियों पे
फैसले की घड़ी जो आयी हो
    - ऊपर
   
बंज़र ज़मीं
बंद जबसे कारखाने हो गए
बंदा था मैं खुदा का
बचे हुए कुछ लोग ....
बच्चों पर दिन भारी देखे
बजा दे काश! ये किस्मत ...
बड़ी तकलीफ़ देते हैं ये रिश्ते

बड़े हौले से उसने आज ...

बदल गई है लय जीवन की...
बदलना चाहो भी तो

बदली निगाहें वक़्त की...

बदस्तूर

बरसती बारिशों की धुन पे
बर्बाद ज़माने को गोया

बस ख़्याले बुनता रहूँ
बस फकत अटकलें लगाते है
बहता रहा जो दर्द
बहारों का आया है मौसम सुहाना
बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस

बहुत हो चुका अब...
बाग जैसे गूँजता है पंछियों से
बाग़ी हो गए
बाज़ार मैं बैठे मगर
बात की बात
बातें
बारिशों में भीग जाना सीखिये

बिखर रहा हूँ मेरे दोस्त
बिछड़ डाली से केवल
बिन बरसा इक बादल-सा
बिना कुछ कहे सब अता हो गया
बिना तेल के दीप जलता नहीं है
बीच में पर्दा दोयी का था ..
बीती बातें याद न कर
बुरा है क्या और क्या अच्छा
बुरे दिन हों तो
बुलंदी की चढ़ाई यार मेरे..
बूँद थी मैं...
बे रहम सच ने ...
बेबसी
बेबसी की तरह बेकली....
बेशक बचा हुआ कोई भी
बे सबब जो सफ़ाई देता है
बेहतर है
बोसा या पान
- ऊपर
   
भटके हैं तेरी याद में ... भरम पाला था मैंने
भरोसा न कीजे
भूखे पेट भजन होता है
    - ऊपर
   
मग़रूर तेरी राहें
मज़हबी
मत बनो ज्वालामुखी
मंत्री बनाओ तो कोई बात बने
मछली सी मेरी प्यास है
मजबूरी के मौसम में
मछेरा ले के जाल आया है
मनुज आजन्म गंदा न था
मस्त सब को कर गई ..
मान लूँ मैं ये करिश्मा....
माना इसकी निढाल चाल नहीं
माना कि उसमें जज़्बा ख़ूब
माथे पे बिंदिया चमक रही
मालूम नहीं उनको ये ..
मायूस न हो ऐ दिल
मिज़ाज पूछने आए.....
मिलके चलना बहुत ज़रूरी है
मिले किसी से नज़र तोमाना कड़ी धूप है
मिलने जुलने का इक बहाना हो
मुंबई हमला - 2008
मुन्सिफ़ों सलीबों पर फ़ैसले ..
मुख़्तसर, मुख़्तसर, मुख़्तसर
मुझको अपना एक पल ...
बचपन के ज़माने
मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
मुलाक़ात
मुल्क तूफ़ाने-बला की ज़द में है
मुहब्बत का जुनूँ ...
मुसलमान कहता मैं उसका हूँ
मुसलसल ज़िन्दा रहने का
मुहब्बत का ही इक मोहरा ...
मेरा मकान है

मेरा रोशनी से कोई नाता नहीं
मेरा शुमार कर लिया
मेरा सफ़र

मेरा साया मुझे हर वक़्त
मेरी आँखों में किरदार ....
मेरी उम्मीदों को नाकाम ...
मेरी ग़ज़लों की भी...
मेरी चाहतें

मेरी मज़ार पे एक चिराग़ ...

मेरी दुनियाँ
मेरी नज़रों का धोखा हो
मेरी पलकों की नमी
मेरी मंज़िल का पता दे
मेरे उसके दरमियां दूरियाँ ....
मेरे गीतों मेरी ग़ज़लों को
मेरे दिल से मिलाए तो कोई !!
मेरे बाद किधर जाएगी तन्हाई
मेरे भीतर महक रहा है
मेरे हाथोँ मे इक गुलाब देकर
मेरे हालात न जाने कब
मेरे हिस्से में ये टूटा हुआ ..
मैं
मैं आज़ादी ठुकराता हूँ
मैं काला तो हूँ, आप जितना..
मैं ख़ुशी से रही बेख़बर
मैं जानता था उसने ही ....

मैं तन्हा हूँ ये दरिया में
मैं तो केवल इस फ़िज़ां में
मैं तो गूँगी थी तुम भी....
मैं तो साहिल पे आकर रहा...

मैं दर्द पिया करता हूँ !
मैं ढूँढती हूँ जिसे वो
मैं नहीं कोई सुखनवर
मैं भी गुम माज़ी में था
मैं मुम्बई हूँ
मैं सपनों का ताना बाना
मोहब्बत के जज़्बे ...
मोहब्बत के सफ़र पर
मोहब्बत में अश्क़ की कीमत
मौत पास है खड़ी
मौन रहकर भी
मौसम को इशारों से
मौसम बदलने लगा
मौसम बदला सा
    - ऊपर
   
यतीम
यह उजाला तो नहीं
या बहारों का ही ये मौसम...
या रब तू मुझको ऐसा जीने....

याद आये तो
याद की बरसातों में
याद भी आते क्यूँ हो
यादों के नग़मे
यार को मैंने मुझे यार ...
यूँ आप नेक-नीयत
यूँ उसकी बेवफाई का....
यूँ जब-जब शबनम रोती है
यूँ जहाँ तक बने
यूँ तो घुट जाएगा दम
यूँ तो बड़ा अलाल तू
यूँ तो शहर से शहर सट गये
यूँ पवन, रुत को रंगीं बनाये
यूँ ही रोज हमसे, मिला कीजिए
ये आग
ये आरजू थी तुझे गुल के ...
ये किस कुसूर की सज़ा
ये किसका खून बह रहा है...
ये कौन छोड़ गया इस पे
ये कौन दे रहा है यूँ दस्तक़
ये ज़ख़्म मेरा
ये तो तय है मुश्किल से
ये धूपछाँव क्या है ये ...
ये न कह पाऊँगा कि ....

ये है निज़ाम तेरा
    - ऊपर
   
रखते थे इत्‍तेफ़ाक जब
रमज़ान बीता तो रवायत ..
राज़ अपने तुमको बताती..
रात को फिर कोई
रास्ता किस जगह नहीं होता
राह ख़ुदा की पाई है
रिश्तों से अब डर लगता है
रीति रिवाज़ पुराने अब भी
रुलाया था बहुत तुमने, ...
रूबाईयाँ डॉ. सुरेन्द्र भुटानी 
रुबाइयाँ - देवेश देव
रूठे से ख़ुदाओं को
रूह को मौत नहीं आती
रेत का घर जो अब बनाया..
रेशा-रेशा, पत्ता-बूटा
रोटियाँ
रो-धो के सब कुछ...
रोने की हर बात पे
रोशनी देने इस ज़माने को
    - ऊपर
   
लबों पे
लम्हा इक छोटा सा ....
लहू का रंग एक है
लाया था जो हमारे लिये ...

लुटती है रोज़ प्यार की...
लोकतंत्र की बातें करना
लोग हसरत से हाथ मलते हैं

लौट कर फिर से जवानी आएगी
    - ऊपर
   
वक्त उड़ता सा  चला जाता है
वक़्त की गहराइयों से
वक़्त के साँचे में ढल कर...
वक्‍़त भी कैसी पहेली दे गया
वफ़ायें तो हुई है अब..
व्यथा
वही अपनापन ...
वो इश्क के क़िस्से
वो उलझा हुआ सवाल थी
वो तनहाई वो गलबंहियाँ

वो ना महलों की ऊँची शान..
वो परिंदे कहाँ गए
वो पहली मुलाक़ात थी ...
वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
वो महफ़िलें, वो शाम सुहानी ..
वो लम्हे !
वो सब फ़साने चले गए
वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई
वो ही चला मिटाने ....
    - ऊपर
श-ष    
शक यकीनों में जब बदलतें
शबनमी धूप के आँगन में..
शहर में कुछ गाँव होते
शहर में जो भी मिला
शहर में ये कैसा धुँआ हो गया
शहर है भीड़ है बस
शाम हो जाम हो सुबू भी हो
शायद अभी है राख में
शायरी के इस सरो - ...
शिद्दत सह नहीं सकते
शीशे के मेरे घर के हैं ...
शुक्रिया जता कर एहसान..
शून्य से शिखर हो गए
शैदाई समझ कर जिसे ...
शोरिशे-हस्ती मिटाना चाहती हूँ
    - ऊपर
श्र-शृ    
     
    - ऊपर
   
सब खामोश हैं यहाँ कोई...
सबका मन अपना दुश्मन है
सबकी सुनना, अपनी करना
सबसे दिल का हाल न कहना
सबू को दौर में लाओ
समझौते की कुछ सूरत देखो
समेटे सब को अपने में ...
सहूलियत की ख़बर
साँप की मानिंद वोह....
साँस जाने बोझ कैसे...
साग़र से लब लगा के
सात जन्मों के रिश्ते निभाते रहे
साथ मेरे रही उम्र भर ज़िंदगी
साथ मेरे हमसफ़र
साथ रहते है
साधना कर यूँ सुरों की
सामने काली अँधेरी रात
साया बनकर साथ चलेंगे...
सारी दुनिया के सवालों से
सिखाना छोड़, होंठों पर....
सिफर का सफ़र
सिर्फ ख़यालों में न रहा कर
सिला

सीख ले धूप की तल्खियाँ झेलना
सीधी बातें सच्ची बातें
सुख-दुःख में जो साथ चले हैं.
सुन तो सही जहां में है तेरा .
सुबह होती है तो दफ़्तर ..
सुराग भी न मिले अजनबी ..

सुर्ख़ होठों पे उँगलियों ...
सूखा आया तो कुछ...
सूरज की हर किरन
सूरत बदल गई कभी
सैंकड़ों ग़म दिल पे अपने...
सो नहीं मैं पाता हूँ
सोच का इक दायरा है
सोच की चट्टान पर बैठी रही
सोच को मेरी नई वो
सोचते रहने से फ़तह कहाँ...
सोचते ही ये अहले-सुख़न...
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हँसकर दिल पे ज़ख़्म ...
हँसती गाती तबीयत रखिये
हँसने-रोने के मुझे कितने...
हँसी-घरों में वो शीशे दिखाई ..
हँसी-ठिठोली
हँस के बोला करो
हज़ार क़िस्से सुना रहे हो
हथेली में सरसों कभी मत...
हद्दे-नज़र तक अपने सिवा ..
हम उठे तो जग उठा
हम क्या बताएँ कैसे
हम ज़िन्दगी के साथ चलते चले
हम जिए जाएँ लम्हें हर..
हम ले के अपना माल जो..
हमारी लाश का यूँ जश्न
हमने उनके वास्ते ...
हमने दुनियादारी देखी
हमेशा है वस्ल-ए-जुदाई
हर कोई अपना था

हर कोई कह रहा है ...
हर तरफ गहरी नदी है
हर तरफ़ है छिड़ी समय को..
हर तरफ़, हर जगह बिखरे
हर चेहरे पर डर दिखता है
हर दम मेरे पास रहा है
हर पल की तुम बात न पूछो
हर बस्ती-बस्ती में जल रहे
हर मरहले का सामने नक़्शा...
हर सफ़र में सफ़र की बातें हैं
हर सम्त एक भीड़ - से ..

हर सू हर शै में...
हवा-ए-शहर यहाँ किस तरह...
हवा में, धूप में, मिट्टी में और पानी में
हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले
हसरत
हसरतों की इमलियाँ
हाथ पकड़कर अनुज को अपने
हार किसी को भी स्वीकार.....
हाल
हालात
हिन्द नाम काफ़ी है
हिचकियाँ
हिज्र में उसके जल रहे जैसे
हुज़ूर, आप तो जा पहुँचे
हुनर सीख लिया
है भँवरे को जितना कमल..

होके अपना कोई क्यूँ छूट..
होली

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    १९८४ का पंजाब