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| 11.26.2007 |
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"सिंदूरी शाम
कवियों के नाम" |
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बहु
-भाषी कवि सम्मेलन ११,
नवंबर
की शाम श्री सत्य नारायण मंदिर,
वुड
साइड,
न्यू
यार्क में विद्याधाम की तरफ से सम्पन्न हुआ।
डॉ.
सरिता मेहता विद्याधाम की निर्देशिका है
जिनकी
बतौर ये बहुभाषी कवि-सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सफल कवि सम्मेलन एक
तरह से कविओं का गुलशन "सिन्दूरी शाम-कविओं के नाम" एक नया पैग़ाम ले
आया क्योंकि इसमें
बहु-भाषी पंजाबी,
बंगाली,
सिन्धी,
अवधी
और अंग्रेज़ी भाषा के कवियों ने भाग लिया
और इस
सामारोह की संचालक रही डॉक्टर सरिता मेहता। दीवाली की शुभकामनाओं के
साथ मौजूद श्रोताओं ने उन्हें इस संगोष्ठी को आयोजित करने के लिए बधाई
और शुभकामनाएँ दी। ज्ञान का दीपक जलाते हुए पंडित त्रिपाठी जी अपने मन
में जड़े हुए काव्य प्रेम,
राष्ट्र प्रेम,
देश
के प्रति भावनाएँ अपने तरीके से छंदों में व्यक्त करते हुए कहा, "अपने
संस्कारों के रूप में वसीयत स्वरूप जो हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार
सरिता जी सत्यनारायण मन्दिर में बखूबी करती रही हैं।"
डॉ.
सरिता मेहता किसी पहचान की मोहताज नहीं है,
शिक्षा के जगत में उनका हिन्दी के क्षेत्र में जो योगदान रहा है वह
काबिले तारीफ है। अज्ञान का अँधेरा दूर करके ज्ञान की दिशा को उजागर
करने का यह प्रयास उनकी नवनीतम पुस्तक "आओ हिन्दी सीखें" के रूप में एक
वरदान बनकर आया है जो हिन्दी को अंग्रेज़ी जुबां के आधार पर बच्चओं एवं
शिक्षकों को बहुत लाभाविंत कर रहा है। बच्चों के शिक्षण के लिए इनकी यह
देन बच्चों के लिए एक अनमोल सौग़ात है।
कला की कई दिशाओं में उनकी अभिरुचि रही है - मूलत: चित्रकार हैं
कई ललित कला प्रदर्शिनियों में भाग लेती रही हैं और अनेक सम्मानों से
निवाजी गई हैं।
वह
ख़ुद इसकी काव्य गोष्टी की सरंक्षक व संचालिका रही।
कवि
गोष्टी में उपस्थित कवि गण थे - राम बाबू गौतम,
आनंद
आहूजा,
अशोक
व्यास,
अनुराधा चंदर,
गुरबंस कौर गिल,
पूर्णिमा देसाई,
बिंदेश्वरी अग्रवाल,
अनंत
कौर,
सुषमा
मल्होत्रा,
वी.के. चौधरी,
मंजू
राय,
अनूप
भार्गव,
सीमा
खुराना,
देवी
नागरानी और नीना वाही।
डॉ॰
सरिता मेहता की इस आयोजित गोष्टी का मक्सद,
जो
अनेकता में एकता के रंग भर रहा है,
उनकी
इस कविता से साफ़ ज़ाहिर हो रहा हैः
फैलाया है मैंने अपना आँचल
इस
धरती से उस अंबर तक
हम सब
मिल एक हो जायें
विश्व
में अमन शाँति का ध्वज फहरायें
ये
ख्वाब है मेरा,
सच हो
जाये
ये
मुशकिल है,
असंभव
तो नहीं।
कविता
पाठ के रसपान की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत कर रही हूँ जो जाने माने कवियों
ने उस शाम को शब्दों के रँग भर र सजाई। वर्जीनिया से आई प्रख्यात
कवित्री गुरबंस कौर गिल ने अपने काव्य तथा साज़ो-आवाज़ से पंजाबी की
रचना सुनाकर महफिल को अपनी गिरफ्त में बाँध रखा।
अशोक
व्यास जी की रचना बड़ी रोचक थी,
समाँ
बाँधने में सफल रही,
जब वे
पढ़ते रहे और श्रोता मुग्ध भाव से आन्नद लेते रहे।
मेरी आँखों में वो सवेरा है
जिसको देखूँ वो शख्स मेरा है।
कभी किरणों के झूले पर इठलाती है
तब पनिहारिन प्यास बुझाती है।
--अशोक
व्यास
अनूप
भार्गव की कविताओं में सत्य का सूरज चमकता हुआ दिखाई दिया मधुर क्षणों
की अनुभूति है ये कविता का उन्वान दिवाली।
"
कब तक लिए बैठी रहोगी मुट्ठी में धूप को
ज़रा हथेली को खोलो तो सवेरा हो।" --अनूप
बिंदेश्वरी अग्रवाल ने अवधि भाषा में एक हास्य रचना के द्वारा उनका
प्रथम बार अमरिका में पाँव धरते ही जो तजुरबा हासिल किया बड़े रोचक ढंग
से पेश किया जिससे वातावरण कुछ ज़्यादा चहकने लगा।
पूर्णिमा देसाई जी शिक्षायतन की निर्देशिका व हर्ता कर्ता है जिनकी
रचनाओं का शुमार एक अनंन्त सागर की तरह लहलहाता है,
जिसकी
एक सुदर झलक सुस्वर में सुनाते हुए वे मानवता को एक स्देश भी दे रही थी
-
"आओ
मानव बनें अब तन मन से"
जो हमेशा एक मार्गदर्शक तुकबंदी है और रहेगी। वाह !!! सरल शुभ संदेश ।
राम
बाबू गौतम ने कई रचनाओं से अपना समाँ बांधा जिसमें खास थी उनकी वे
छेड़खानी करते हुए जवान शोख़ अंदाज की रचना जो सब ने साराही।
आनंद
आहूजा अपने समय के प्रख़्यात कवि है जिनके अपने रचित भंडार से कुछ राह
रौशन करती हुई पंक्तियाँ -
"न
मंज़िल न मंजिल की राह चाहता हूँ
न
दादे सुख़न न वाह वाह चाहता हूँ
तुम्हारी निगाहें अनंद जिसमें सब कुछ है शामिल
मैं
बस तुमसे वो निगाह चाहता हूँ ।"
एक
पथिक का मार्गदर्शन करने के लिये बहुत कुछ गागर में भर दिया सागर को
आगे कहते हैं
अपना
बचपन याद है
माँ
के निवाले याद हैं
सुषमा
मल्होत्रा शिक्षा क्षेत्र से जुडी हुई हैं,
कविता
पाठ के बाद भाषा की प्रगति के बारे में उन्होंने कई दृष्टीकोण उजगार
किये। हैरत हुई सुनकर कि अमरिका में पंजाबी भाषा का चलन अपना पाँव रख
चुका है। हिंदुस्तान की बहुभाषाएँ यहाँ अब आम बोल चाल की भाषाएँ होती
जा रही है और यही हिंदी भाषा का असली प्रचार-प्रसार है।
नीना
वाही एवम् वी.के. चौधरी ने भी रसमय रचना से निवाजा़,
मत
कहो कभी है अंधियारा
मैं
साथ रहूंगी बन साया।
यह थी
मंजू राय जो आशावादी पैगाम ले आई हमारे लिये। चोली दामन का साथ होता है
अंधेरे और उजाले का,
पर
नया भाव,
नया
अंदाज़ मन को बहुत भाया।
सीमा
खुराना जी ने सुंदर प्रस्तुति से आगाज़ किया
तुम्हें न मिलूँगा कभी
ये
फ़ैसला मेरा था।
अनन्त
कौर जिनकी उनकी रचनाओं का विस्तार अनंत है,
अपने
शायराने अंदाज़ में हिंदी
और पंजाबी भाषा में सुरमई गज़ल सुनाती रही। मेरी दाद उन्हें कबूल हो।
आगे उनकी एक रचना का मुखड़ा सुनियेः
तेरे
लिए तो इन्तिहान नहीं हूँ मैं
मैं
जानती हूँ अब तेरी जाँ नहीं हूँ मैं।
देवी
नागरानी जो मूलतः सिंधी भाषी है अपनी एक सिंधी रचना का पाठ किया
बेरुखी बेसबब ब थींदी आ
प्यार
में बेकसी ब थींदी आ।
साथ
में हिंदी की एक गज़ल भी पेश की जिसके अल्फ़ाज़ हैं
"बचपन
को छोड़ आए थे लेकिन हमारे पास
ता
उम्र खेलती हुई अम्राइयां रहीं। "
-- देवी नागरानी
अंत
की ओर बढते हुए बीना ओम ने मंत्र मुग्ध करने वाली अंग्रेजी में कविता
सुनाई जिससे लोग चिंतन-मनन के द्वार पर एक अलौकिक आनन्द लेते रहे।
मन्दिर के नये प्रेसिडेंट श्री मुरलीधर ने सच की नई परिभाषा से परिचित
कराते कहा "जब इंसान झूठ बोलना भूल जाता है तो वह अपने आप एक कवि बन
जाता है।" उन्हें उनकी
सेवाओं के लिये सम्मानित किया गया।
सत्यनारायण मंदिर की तरफ से
सम्मान करते हुए
शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी ने डॉ. सरिता मेहता के इस काबिले- तारीफ
कदम को एक आशावादी प्रयास मानते हुए कहा " वे धन्यवाद की पात्र हैं और
मैं उनकी आशावादिता पर मुग्ध हूँ। जिस तरह चकोर पक्षी आसमाँ की तरफ
उडता है चाँद को पाने की आकाँक्षा लिये,
बिना
यह सोचे कि सफर कितना तवील है और पंख भी थके से हैं। बस उसके
सामने सिर्फ लक्ष्य रहता है,
उसी
तरह सरिता जी ने भी नहीं
सोचा कौन आयेगा,
कितने
साथ होंगे बस एक दृढ संकल्प को आंजाम देने की कोशिश की। उनका यही
प्रयास उन्हें मंज़िल की तरफ ले जायेगा,
यही
मेरी शुभकामना है,
यही
मेरा आशीर्वाद है”,
और
इसके साथ उन्होंने सत्य नारायण मंदिर की ओर से उन्हें सर्वोत्कृष्ट
विद्या रतन अलंकार से सम्मानित किया। फिर विद्याधाम की तरफ से शास्त्री
जगदीश त्रिपाठी जी के कमल हस्त से सरिता जी की हाजिरी में जिन कवि गण
को सम्मान पत्र से सुशोभित किया गया वे हैं
-
अंत
के पहले एक अनोखी शुरुआत करते हुए शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी के अनुज
रघुनाथ डुबे ने अब शब्दों की सरिता को सुरों से सजाकर अपनी मधुर आवाज़
की गूँज में सबको समेट लिया। एक पाकीज़गी का वातावरण जो एक यादगार बन
कर दिलों में पनपता रहेगा।
माँ
हंस वादिनी शारदे
माँ
भव सागर से तार दे।
धरती
धवल गगन गूँजता
कण कण
स्वर उच्चार दे।"
सरिता
जी ने मौजूद श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए एकता के सूत्र में जो बाँधने
का प्रयास किया उसके लिये आभार प्रकट किया और इसी के साथ बहु भाषी कवि
सम्मेलन संपन्न हुआ।
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