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| 11.14.2008 |
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राष्ट्रकवि
दिनकर की जन्म-शती
2008 |
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अक्तू्बर,
2008
कार्यक्रम
का आरम्भ श्री तिवारी जी द्वारा राष्ट्रकवि के परिचायक-प्राक्कथन के पश्चात
श्रीमती आशा वरदान द्वारा महाकवि निराला के सुप्रसिद्ध गीत
“वर
दे वीणा वादिनी,
वर
दे”
के
सस्वर गायन से हुआ। फिर एक-एक करके अनेक कवियों ने तथा साहित्यकारों ने
हिन्दी-प्रेमी आगन्तुकों का अपनी रचनाओं से मनोरंजन किया। भाग लेने वाले
अन्य कवियों-साहित्यकारों के नाम हैं : डॉ. रेखा कल्प,
श्री
राकेश खंडेलवाल,
डॉ. नरेन्द्र टंडन,
डॉ. विशाखा ठक्कर,
डॉ. सतीश व्यास,
डॉ. कुमार आशुतोष,
डॉ. सविता आशुतोष,
डॉ. सुमन वरदान,
श्री घनश्याम गुप्ता,
श्री अनूप भार्गव,
श्रीमती रजनी भार्गव,
डॉ. बालेश्वर प्रसाद,
डॉ. ओम शर्मा और श्री अनुपम चौबे।
लगभग दस
बजे रात को (भारत के सुबह साढ़े आठ बजे) भारत के प्रसिद्ध गीतकार डॉ. कुँअर
बेचैन ने फोन पर आकर कवि-सम्मेलन में जान डाल दी। वे उस समय बिजनौर में
बिजनौर कॉलेज की आचार्या डॉ. श्रीमती मिश्रा के अतिथि थे। डॉ. बेचैन ने
दिनकर जी के प्रति अपने उद्गार प्रकट किये और अपनी एक कविता का सस्वर पाठ
किया,
तथ
समारोह के सफल आयोजन की मंगलकामना की। डॉ. श्रीमती मिश्रा ने भी दिनकर जी
प्रति अपने उद्गार व्यक्त किये।
राकेश
खंडेलवाल तथा घनश्याम गुप्ता द्वारा दिनकर जी की
“उर्वशी”
के
अंशों तथा
“व्याल-विजय”
का
सस्वर पाठ सबों का मन मोह गया। विशेषकर तिवारी जी द्वारा दिनकर के कई
काव्यांशों तथा रश्मिरथी के तृतीय सर्ग के ओजपूर्ण पाठ ने राष्ट्रकवि की
याद और भी ताज़ा कर दी।
सायंकाल
गोधूलि-बेला में बृहत चाय-जलपान के पश्चात हिन्दी एवं उर्दू साहित्य-चर्चा
एवं कविता-पाठ का कार्यक्रम रात के पिछले पहर करीब दो बजे तक चलता रहा।
अन्त तक ऐसा प्रतीत हुआ कि किसी का मन नहीं अघाया,
बावजूद मध्यान्तर तथा समारोहान्त में श्रीमती कामिनी तिवारी द्वारा
प्रस्तुत सुस्वादु तथा नाना सामग्री-युक्त प्रीति-भोज के। इस आयोजन की एक
विशिष्ट बात यह भी रही कि भाग लेने वाले सब के सब प्रोफेसर,
डाक्टर,
ईंजीनियर एवं पी.एच.डी साइंटिस्ट थे। समारोह का अन्त अतिथियों द्वारा
तिवारी परिवार को धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। |
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