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| 01.13.2008 |
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नार्वे में तीसरा विश्व हिन्दी दिवस मनाया गया
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१०
जनवरी २००८ को भारतीय नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के तत्वाधान
में आयोजित लेखक गोष्ठी में स्थान वाइतवेत,
ओस्लो
में तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन मनाया गया। ध्यान रहे तीन वर्ष पहले
प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने १० जनवरी को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी
दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। नार्वे में पहला विश्व हिन्दी
दिवस भारतीय दूतावास ने तथा दूसरा और तीसरा विश्व हिन्दी दिवस भारतीय
नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के तत्वाधान में लेखक सुरेशचन्द्र
शुक्ल की अध्यक्षता में बहुत धूमधाम से मनाया गया।
तीसरे
विश्व हिन्दी दिवस पर लेखक गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसमें काव्यपाठ
करने वालों में माया भारती,
शाहेदा बेगम,
राय
भट्टी,
इंगेर
मारिये लिल्लेएंगेन,
इन्दरजीत पाल और सुरेशचन्द्र शुक्ल
‘शरद
आलोक’
प्रमुख थे और बच्चों के हिन्दी पठन-पाठन पर प्रकाश डाला संगीता एस
सीमोनसेन ने जो हिन्दी स्कूल में बच्चों को हिन्दी पढ़ाती हैं। ओस्लो
स्थित गुरूद्वारे के कार्यकारिणी के सदस्य बलबीर सिंह ने कहा कि हिन्दी
हमारी राष्ट्रभाषा है और पंजाबी मेरी मातृ भाषा है। शरद आलोक ने कहा कि
हिन्दी विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी बड़ी भाषा है।
उन्होंने आवाहन किया कि हिन्दी के लिए आप अपना हर संभव सहयोग दें और
आशा व्यक्त की कि हिन्दी एक दिन संयुक्त राष्ट्र संघ में स्वीकृत भाषा
के रूप में स्थान प्राप्त करेगी। उन्होंने कहा कि वे गत १९ वर्षों से
हिन्दी पत्रिका स्पाइल-दर्पण का सम्पादन कर रहे हैं और सन २००७ में
नार्वे से प्रकाशित मात्र दो पत्रिकाओं
‘स्पाइल-दर्पण’
और
वैश्विका के सम्पादक हैं परन्तु जब प्रोत्साहन की बात आती है तब
सिफारशी लोग नम्बर मार ले जाते हैं। शरद आलोक ने कहा कि यह अच्छा है कि
भारत में आम परिवारों के बहुसंख्यक बच्चे और विदेशों में प्रवासी बच्चे
हिन्दी बहुत चाव से सीख रहे हैं जो हिन्दी के भविष्य की उज्जवल कामना
है। हिन्दी आम आदमी की भाषा है यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है
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