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| 08.11.2007 |
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नार्वे में प्रेमचन्द जयन्ती सुरेशचन्द्रशुक्ल “शरद आलोक” |
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३१ जुलाई २००७ को वाइतवेत ओस्लो में भारतीय नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक
फोरम की ओर से प्रेमचन्द जयन्ती मनायी गयी। कार्यक्रम में सुरेशचन्द्रशुक्ल
“शरद
आलोक”
ने प्रेमचन्द के जीवन पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर शाहेदा बेगम और शरद आलोक
ने अपनी कहानियों का पाठ किया तथा इंगेर मारिये लिल्लेएंगेन और लीव एवेनसेन
ने अपनी नार्वेजीय कवितायें पढी। कार्यक्रम मे प्रवासी रचनाकारों अरुणा
शुक्ला,
माया भारती,
अलका भरत आदि ने अपने विचार रखे। भारतीय राजदूत ने अपना बधाई संदेश दिया।
हिन्दी के लोकप्रिय लेखक,
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द भारत में तो सर्वमान्य हैं ही,
वरन विदेशों में प्रवासी भारतीयों के मध्य उनका साहित्य कहानियों के माध्यम
से आज भी लोकप्रिय बना हुआ है। मुंशी प्रमचन्द का जन्म ३१ जुलाई १८८० को
वाराणसी के समीप लमही गाँव में हुआ था और मृत्यु ८ अक्टूबर १९३६ में हुई
थी। इनका असली नाम धनपत राय था। इनके पिता डाकघर में क्लर्क थे। इनके माता
और पिता का देहान्त कम आयु में ही हो गया था। जब प्रेमचन्द सात वर्ष के थे
तो इनकी माँ और जब वह चौदह वर्ष के थे तो इनके पिता का देहान्त हो गया था।
१९१० में इनके पहले कहानी संग्रह
‘सोज
ए वतन’
आया जो चर्चा का विषय बना जो जब्त कर लिया गया। इसके बाद वह प्रेमचन्द नाम
से लिखने लगे थे। १९२१ में महात्मा गाँधी के आवाहन पर आपने सरकारी नौकरी
छोड़ दी थी। आपने जागरण और हंस पत्रिकाओं का सम्पादन किया। उन्होंने
प्रगतिशील आन्दोलन को पूरी आस्था के साथ अपने साथ जोडा और हंस का प्रकाशन
आरम्भ किया। आजकल हंस का
दोबारा प्रकाशन और सम्पादन बडी सूझबूझ से प्रतिष्ठित साहित्यकार राजेन्द्र
यादव जी कर रहे हैं।
लखनऊ में १९३६ में प्रेमचन्दजी ने प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में कहा था
कि सत्य और अनुभवों से रचा गया साहित्य ही साहित्य है।
नार्वे में बहुत समय पहले भारतीयों का आना आरम्भ हुआ था। प्रो बराल पश्चिम
बंगाल से लगभग सत्तर वर्ष पहले आये थे जिन्होंने नार्वेजीय महिला से विवाह
किया था जिनके नाम से थ्रून फ्येल
(थ्रून पर्वत) पर यहाँ की स्थानीय प्रशासन के सहयोग और उनकी बेटी के
नेतृत्व में एक म्यूजियम बनाने का प्रावधान २० वर्ष पहले किया गया था।
भारतीय घुमक्कड़ स्वभाव के होते हैं। नार्वे में हमारे जाने-माने नेता और
साहित्यकार आते रहे हैं। जिनमें विश्वशान्तिदूत महात्मा गाँधी,
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु,
इन्दिरा गाँधी,
साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर,
अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्मत्य सेन,
प्रसिद्ध लेखकों में रामलाल,
कुरातुल ऐन हैदर,
गोपीचन्द नारंग,
इन्द्रनाथ चौधरी,
कमलेश्वर,
श्याम सिंह शशि,
गिरिजाशंकर त्रिवेदी,
एफ एस एजाज,
अमृता प्रीतम,
राजेन्द्र अवस्थी आदि बहुत से नाम हैं जो नार्वे आ चुके हैं और यहाँ की
सभाओं और बैठकों को सम्बोधित कर चुके हैं।
गत पाँच वर्षों से नार्वे में की भारतीय सांस्कृतिक संस्था
‘भारतीय-नार्वेजीय
सूचना और सांस्कृतिक फोरम’
द्वारा प्रेमचन्द जयंती मनायी जा रही है जिसमें प्रवासी लेखकों के अतिरिक्त
नार्वेजीय लेखकों और नेताओं ने हिस्सा लिया है।
नार्वे में यहाँ की भाषा नार्वेजीय में प्रेमचन्द साहित्य का अभाव है। इस
लेख के लेखक को नार्वे में हिन्दी का विेशेषज्ञ का दर्जा हासिल है। जब
ओस्लो में स्व. क्नुत क्रिस्तियानसेन ओस्लो विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाते
थे तब वह लेखक को प्रायः अध्यापन के लिए आमन्त्रित करते थे। क्नुत
क्रिस्तियानसेन को हिन्दी का अच्छा ज्ञान था परन्तु हिन्दी बोलने में वह
कमजोर थे। यही कारण था कि वह अनुवाद में हिन्दी साहित्य को गम्भीरता से
नहीं व्यक्त कर सके। नार्वेजीय भाषा में जो भी हिन्दी और भारत के बारे में
लिखा वह अंग्रेजी साहित्य के माध्यम से जानकारी प्राप्त करके लिखा था। मेरे
साथ हुई बहुत सी बैठकों में वह अंग्रेजी में छपी हिन्दी साहित्य की
पुस्तकों की चर्चा करते और अवलोकनार्थ देते थे। क्नुत क्रिस्तियानसेन ने
मुझे बताया था कि उन्होंने प्रेमचन्द की कुछ कहानियों का अनुवाद नार्वेजीय
भाषा में किया था। परन्तु वे अनूदित कहानियाँ उनके जीते हुए किसी पुस्तक के
रुप में नहीं छप सकी थीं। अब पता नहीं वे अनूदित कहानियाँ कहाँ और किस रुप
में हैं। डेनमार्क के हिन्दी अध्यापक जो ओस्लो विश्वविद्यालय में फारसी
पढ़ाते हैं और हिन्दी अच्छी बोलते हैं जो हिन्दी का भी अध्यापन करते हैं,
ने बातचीत के दौरान स्वीकार किया था कि क्नुत क्रिस्तियानसेन का अनुवाद
स्तरीय नहीं था। यही कारण है कि उनकी प्रेमचन्द की अनूदित कहानियाँ पुस्तक
रुप में नही छप सकीं।
फिन थीसेन नार्वे में अध्यापान के पूर्व कोपेनहेगन विश्व विद्यालय में
हिन्दी पढाते थे जहाँ उनके छात्रों के लिए मुझे रामधारी सिंह दिनकर जी की
कुरुक्षेत्र का सस्वर पाठ टेप करने का अवसर मिला था। उनके आमन्त्रण पर वहाँ
कक्षायें भी ली थीं। उन्होंने १९८२ में डेनमार्क के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक
हान्स क्रिस्तियान अन्दर्सन की कथाओं की एक पुस्तक भेंट की थी जिनके नाम पर
प्रति वर्ष बाल साहित्य पर अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
नार्वे में नार्वेजीय-हिन्दी शब्दकोश है नहीं है। ३१ जुलाई २००६ को मेरे
निवास पर जब प्रेमचन्द जयंती मनायी गयी थी तब नार्वे में प्रेमचन्द के
साहित्य को प्रसारित करने और उनके साहित्य
को नार्वेजीय भाषा में प्रकाशित करने के लिए प्रयास की बात पर जोर
दिया गया था।
जब मैं अपने अग्रज मित्र डा श्याम सिंह
‘शशि’
और न्यूयार्क में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के अध्यक्ष शेर बहादुर सिंह
के साथ वहाँ स्थित पुस्तक विक्रेता और प्रकाशक बटाला एन्ड कम्पनी के मालिक
से मिला तब उन्होंने बताया था कि अमरीका में भी हिन्दी में प्रेमचन्द के
समुचित पाठक नहीं हैं। यही कारण है कि उन्हें प्रेमचन्द की बहुत सी
पुस्तकें फेंकनी पड़ी थीं।
अमरीका और कनाडा में हिन्दी का लेखन यूरोप की तुलना में अधिक है परन्तु
उसका प्रचार प्रसार कम हुआ है। विश्व हिन्दी सम्मेलन और अन्य हिन्दी के
कार्यक्रम निश्चित ही इस दिशा में लाभकर सिद्ध होंगे।
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