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ISSN 2292-9754

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09.14.2016


परसाई का लेखन अपने समय की व्याख्या हैः मदन कश्यप
हरिशंकर परसाई की स्मृति में व्याख्यानमाला का आयोजन
सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय

जबलपुर/ प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की स्मृति में प्रगतिशील लेखक संघ की जबलपुर इकाई द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित की जाने वाली व्याख्यानमाला के क्रम में इस वर्ष उनके जन्मदिवस पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य वक्तव्य वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री मदन कश्यप ने प्रदान किया। वक्तव्य का विषय था- नई सदी की कविता: चुनौतियाँ और संभवनायें। व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता म.प्र. उच्च न्यायालय के वरिष्ठतम अधिवक्ता श्री राजेन्द्र तिवारी ने की। इस अवसर पर प्रख्यात कवि डॉ. मलय एवं डॉ. रामशंकर मिश्र, वरिष्ठ कथाकार डॉ. कुदनसिंह परिहार, देवेन्द्र सुरजन, राजेन्द्र दानी, पंकज स्वामी, अरविन्द श्रीवास्तव, असंग घोष, पीके बोस, रहीम शाह, राजेन्द्र गुप्ता, आशीष पाठक, एस.वी.रानडे, एस.के.मिश्रा सहित नगर के तमाम साहित्यकार, सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता और नागरिक उपस्थित थे। संचालन प्रलेसं जबलपुर इकाई के अध्यक्ष तरुण गुहा नियोगी ने किया।

इकाई के सचिव और कथाकार सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय ने आधार वक्तव्य प्रदान करते हुये अब तक संपादित परसाई व्याख्यानों पर प्रकाश डालते हुये वक्ता श्री मदन कश्यप का परिचय प्रदान किया। उन्होंने वर्तमान सदी में लिखी जा रही कविता के तेवर, संभावनाओं और चुनौतियों की संक्षेप में चर्चा की।

मुख्य वक्तव्य प्रदान करते हुये वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री मदन कश्यप ने वर्तमान सदी में भी कवियों की दो-तीन पीढ़ियाँ रचनाकर्म में संलग्न हुईं हैं। ये कवि अपने से पूर्व कह कविता पीढ़ियों की परंपरा को आगे ले जातीं हुईं भी कई मायनों में नये तरह की कविता लिख रहे हैं। यह भी सच है कि शताब्दी परिवर्तन के पूर्व के कई कवि भी आज तक सक्रिय हो कर अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान हिंदी साहित्य कि लिये कर रहे हैं परंतु कविता की नई सदी आने साथ नई बयार लेकर आई है जिसके पीछे यक़ीनन आज के सामाजिक-राजनैतिक वातावरण की पृष्ठभूमि उपस्थित है। भारतीय समाज में विषमता पहले भी रही है परंतु भूमंडलीकरण के पश्चात तस्वीर अचानक ही बदलने लगी। पहले बेतहाशा अमीरी शान और प्रदर्शन की विषयवस्तु नहीं थी बल्कि एक ख़ास प्रकार का अपराध बोध उसके साथ संलग्न थी। आर्थिक असमानता की खाई भी बहुत गहरी नहीं थी। भूमंडलीकरण ने जहाँ विद्रूपता की हद तक संपन्नता को बढ़ा दिया है वहीं इस धन अर्जन के कारक के तौर पर मौजूद शोषण के कारण समाज में ग़रीबी भी बेतहाशा ढंग से बढ़ी है।

उन्होंने कहा कि विगत दशकों में हुये सामाजिक राजनैतिक कारणों से समाज के वंचित तबक़ों के लोग मुख्यधारा की ओर अग्रसर हुये है और इसी कारण कविता में अस्मिता आधारित प्रतिनिधित्व बढ़ा है। वंचित तबकों के लोग और स्त्रियाँ बराबरी से कविता के क्षेत्र में आये हैं। आदिवासियों के स्वर पहली बार कविता में सुनाई देने आरंभ हुये हैं। इसका परिणाम हुआ कि कविता में स्टारडम कम हुआ और कवि के स्थान पर कविता को अधिक पहचान हासिल हुई। आज बुद्धि द्वारा निर्मित स्मृति के स्थान पर अनुभव आधारित ज्ञान को वरीयता दी जा रही है। आज का कवि लड़ाई में सीधे शामिल है और अपने समय के संकटों से मुक़ाबला कर रहा है। हमारे देश में और वैश्विक संदर्भों में भी सबसे अच्छी कविता संकटग्रस्त इलाक़ों से ही आ रही है।

पहले असमानता का प्रतिकार तो पूरी ईमानदारी से किया जाता रहा है परंतु इसके चलते अनायास ही विविधता का नकार भी हुआ। आज की कविता में विविध प्रकार के स्वर अपने जीवन के अनुभव लेकर आ रहे है परंतु असमानता के ख़िलाफ़ आवाज़ धीमी भी हुई है। सत्ता ज्ञान को समावेशित करने के प्रयासों में लगी है और एक हद तक सफल भी है क्योंकि कविता की नई पीड़ी एक ख़ास तरह की राजनैतिक उदासीनता से ग्रस्त है। एक समय तक चलते रहने के कारण अब यह उदासीनता राजनैतिक नासमझी में बदलने लगी है। इसलिये कई बार बाज़ारवाद के ख़िलाफ़ लिखते हुये बाज़ार के समर्थन में या उसी की भाषा में ही लिखने लगते हैं। आज की कविता में यद्यपि शिल्प पर बहुत ज़ोर है लेकिन भाषा की समृद्धि घट रही है।

उन्होंने अंत में कहा कि परसाई का लेखन न केवल उनके बल्कि हमारे समय की भी व्याख्या करता और आज भी यह ज़िम्मेवारी हमारे साहित्य पर है। यद्यपि नई सदी की कविता में उपरोक्त प्रकार की संभवनायें है पर कई चुनोतियाँ भी नज़र आतीं हैं। यही समकालीन कविता का द्वंद्व है। परंतु सांस्कृतिक मुक्ति के रास्ते मे मौजूद बाधाओं को हटाने में एवं वर्तमान संकटों से हमें कविता ही बाहर निकाल सकती है और इसलिये यह कहा जा सकता है कि हमारे समय की श्रेष्ठतम कविता अभी लिखी जानी बाक़ी है।

आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कहानीकार श्री कुदनसिंह परिहार ने किया।


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