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| 06.21.2007 |
| 'चराग़े-दिल' का लोकार्पण कार्यक्रम चराग़े-दिल के रोशन से दिये अब जगमगाये हैं सुरों के ताल पर गाकर ग़ज़ल लब गुनगुनाये हैं --देवी |
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अध्यक्षः श्री आर. पी. शर्मा २२ अप्रेल को बांद्रा हिंदू असोशियेशन हाल में श्रीमती देवी नागरानी जी का पहला ग़ज़ल-संग्रह 'चराग़े-दिल' का लोकार्पण श्री आर.पी. शर्मा 'महरिष्' ने अपने कमल हस्त से किया। वे इस मंच के अध्यक्ष भी रहे।
कार्यकर्म का आगाज़ ज्योत जलाकर किया गया, जिसमें शामिल थे मंच के छंद शास्त्र के पिंगलाचार्य श्री आर.पी. शर्मा 'महरिष्' , श्री मा.ना.नरहरि, श्रीमती देवी नागरानी, श्री गणेश बिहारी 'तर्ज़' लखनवी, श्री राम जवाहरानी, श्री श्याम जुमानी, श्रीमती लता जुमानी और श्री मुरलीधर पांडेय. पंडित जसराज जी के वरिष्ट शिष्य, श्री नीरज कुमार ने सरस्वती वंदना गाकर लोगों को मुग्ध किया। देवी जी ने मंच पर बैठे सभी महमानों का फूलों और शाल के साथ सम्मान किया और धन्यवाद अता किया।
कार्यक्रम अपनी चरम सीमाओं को तब पहुँचा जब श्री श्याम जुमानी ने इस किताब के बारे में बातचीत की शुरूआत की। उनके शब्दों में " शब्दों का सहारा लेकर एक कवि अपने भाव कुछ इस तरह से पेश करता है जो प्रेणात्मक होकर समाज तक अपना पैग़ाम पहुँचाने में कामयाब हो पाता है। इसी प्रयास की ओर देवीजी का यह ग़ज़ल सँग्रह एक मुबारक कदम है। श्री राम जवाहरानी ने इस गज़ल संग्रह के बारे में कई बारीकियों पर रौशनी डाली और अपनी दिली मुबारकबाद देते हुए उस संग्रह को खूब सराहा। श्री गणेश बिहारी 'तर्ज़' ने भी उनको मुबारकबाद देते हुए उनकी शान में एक नज़्म तरन्नुम में पढ़ी जो उन्होंने खा़स इस मौके के लिये लिखी थी। लफ्ज़ों की ये रानाई मुबारक तुम्हें देवी श्री आर.पी. शर्मा जिन्होंने इक संग्रह का विमोचन किया और स्वयं एक निराली सी स्वयं रचित ग़ज़ल का पाठ किया जो उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप देवीजी के लिये लिखी थी। किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा श्री मा.ना. नरहरि जी ने भी अपनी समीक्षा बड़े आबोताब के साथ प्रस्तुत की । मौसीकी का माहौल बनाते हुए साज़ का आनंद अपने मख़मली स्वर से सभी श्रोताओं को कराया कवि श्री शिवदत्त 'अक्स' जी ने जिन्होंने देवीजी की एक ग़ज़ल गाई जिसके अल्फाज़ हैः बाकी न तेरी याद की परछाइयाँ रहीं अंत में देवी जी ने "कविता क्या है?" इस बारे में अपने भाव पेश किये जिनसे कवि और शब्द का रिश्ता स्पष्ट होता था, और अपनी एक ग़ज़ल गाई बेरुख़ी बेसबब भी होती है और श्रोताओं के कहने पर अपनी दूसरी ग़ज़ल "मेरे वतन की खुशबू" भी तरन्नुम में गाई जिसे उन्होंने डॉ. अंजना सँधीर के "प्रवासिनी के बोल" को समर्पित की है, इसी भावना के साथ कि प्रवासिनी होते हुए भी वह खुद मैं वतन से दूर तो है पर वतन उससे दूर नहीं। बस यही उनके अहसास है, यही उनकी ग़ज़ल भी, ऐसा उनका कहना है। सभी महमानों तथा अन्य आए कविजन का तहे दिल से देवीजी ने शुक्रिया अदा किया जिनमें से वहाँ मौजूद थेः जनाब अहमद वसी, जाफ़र रज़ा साहिब, श्रीमान खन्ना मुज़फ्फ़रपुरी, आर. पी. हंस और उनकी पत्नि कल्पना जी, शर्मा जी के सुपुत्र स्री रमाकांत शर्मा, श्री शीतलाप्रसाद 'निराला', गीतकार कवि शेलेंद्र जी, मौसिकी के फनकार जनाब मक्कबूल हुसैन, प्रमिला भारती, श्रीमान अय्यर साहिब, कवि भैरवानी, उदासीन साहिब, कवि सुदर्शन, श्री बसंत तलरेजा व उनकी पत्नी शकू तलरेजा, नज़मा जी, रौशनी जी, थापर साहिब, श्री देवीदास लता साजनानी, और अनेक साहित्य प्रेमी। फौज़ान के संपादक जनाब सलमान माहिमी भी इस अवसर पर मौजूद थे। सभी की सुभकामनाओं के साथ संपन्न हुआ यह विमोचन कार्य जिसकी सफलता का श्रेय जाता है संचालक श्री मा.ना. नरहरि और संयोग साहित्य के संपादक श्री मुरलीधर पाँडे जी को जिन्होंने सभी महमानों का धन्यवाद करते हुए अपने संचालन को बखूबी सहज रूप से समाप्त किया।
श्री आर. पी. शर्मा 'महरिष्' जी ने 'चराग़े-दिल' के समारोह पूर्ण विमोचन के लिये श्रीमती देवी नागरानी जी को बहुत बहुत बधाई एवं आशीर्वाद देते हुए इस मौके के लिये लिखी अपनी ग़ज़ल पढ़ी, जो अंत में पेश है: "न बुझा सकेंगी ये आंधियाँ इस ग़ज़ल-संग्रह का शीर्षक 'चराग़े-दिल' नागरानी जी के इसी शेर से प्रेरित है। जितना खूबसूरत शेर, उतना ही खूबसूरत शीर्षक। पुस्तक का आवरण भी खूबसूरत और उस पर अंकित खुशनुमा चित्र और वह भी आशचर्य जनक रूप से स्वयं नागरानी जी का कंप्यूटर द्वारा बनाया हुआ। पुस्तक के समारोहपूर्ण विमोचन से निश्चय ही उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व प्रकाश में आया और हम सभी को उनसे परीचित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आप पहले से ही सिंधी में गज़लें कहती रहीं हैं और उनका सिंधी में एक ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है, इसलिये ग़ज़ल की आपको अच्छी समझ है और हिंदी ग़ज़ल-लेखन में आप इससे लाभाविंत भी हो रही हैं। सबसे बड़ी बात यह कि आपमें सीखने कि ज़बरदस्त ललक है। मेहनत करने से भी आप नहीं घबराती। आपका स्वभाव काव्यात्मक है और आपकी मौलिक प्रवृति काव्य की लयात्मकता से मेल खाती है। इसे उर्दू में तबीयत का मौजूँ होना कहते हैं। हज़रत निश्तर ख़ानकाही के अनुसार यह ग़ज़ल जैसी गेय कविता के लिये ज़रूरी भी है। आपके ही शब्दों में: दो अक्षरों का पाया, जो ग्यान तुमने देवी आप कविता लिखने को एक स्वभाविक क्रिया मानती हैं, क्योंकि आपकी नज़र में हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, चित्रकार और शिल्पकार छिपा हुआ होता है। इस पुस्तक में कुछ विद्ववानों द्वारा नागरानी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर व्यक्त किये गए विचारों के अंश मैं यहाँ देना चाहूँगा, जो बहुत महत्वपूर्ण एवं सकारात्मक हैं श्री कमल किशोर गोयनका, भूतपूर्व प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के निकट यह सुखद आश्चर्य का विषय है कि नागरानी जी अमरीका में रहते हुए हिंदी में गज़लें कह रही हैं और हिंदी के प्रवासी साहित्य में अपनी विशेष पहचान बनाने के लिये इस ग़ज़ल संग्रह के माध्यम से अपना पहला कदम मज़बूती से रख रही हैं। श्री महमुदुल हसन माहिर, घाटकोपर, मुंबई, का कहना है कि नागरानी जी जो देखती और महसूस करती हैं, उसे ख़ास अंदाज़ से शेर के साँचे में ढाल लेती हैं, उनकी कल्पना की उड़ान बहुत बुलंद है। लिहाज़ा शाइरी में गहराई और गीराई पाई जाती है। न्यूयार्क की डा॰ अंजना सँधीर के शब्दों में देवी नागरानी अमरीकी हिंदी साहित्य की एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। अमरिका की मशीनी जिंदगी में अपनी संवेदनाओं को बचाए रखना और अंग्रेज़ी वातावरण में हिंदी की ग़ज़लें कहना मायने रखता है। श्री दीक्षित दनकौरी ने खुशी ज़ाहिर करते हुए लिखा है कि देवी नागरानी जी की अधिकांश ग़ज़लें पूरी आबोताभ के साथ रौशन है। प्रस्तुत ग़ज़ल-संग्रह 'चराग़े-दिल' से एक ओर जहाँ साहित्य-जगत जगमग होगा, वहीं दूसरी ओर आम पाठकों के ज़हन भी रौशन होंगे। दुआ करते हुए कहा है कि यह 'चराग़े-दिल' हमेशा ही जगमग रहे, टिमटिमाता रहे और इसकी लौ कभी मद्धिम न हो। श्रीमती मरियम गज़ाला ने खास बात कही है, वह यह कि अमरीका जैसे देश में रहकर भी वो अपने संस्कार नहीं भूली। भारतीय महिला की गरिमा और महिमा का वे जीवंत उदाहरण हैं। "ग़ज़ल" उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है। ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है। इस विधा में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को 'मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें।" यहाँ मैं ग़ज़ल के मिज़ाज के बारे में भी कुछ कहना चाहूँगा। ग़ज़ल कोमल भी है और कठोर भी। उसका लहज़ा कभी नर्म तो कभी तीखे तेवर लिये होता है, तो कभी दोनों का मणि कांचन संयोग कुछ और ही लुत्फ़ पैदा कर देता है, चटपटी है बात लक्ष्मण - सी मगर हरियाना के प्रख़्यात उस्ताद शाइर सत्यप्रकाश शर्मा 'तफ़्ता ज़ारी' (कुरुक्षेत्र) ने तो ग़ज़ल से संबोधित एक अनूठी बात कही है, वे फर्माते है: सुलूक करती है माँ जैसा मुब्तदी से ग़ज़ल कहने का मतलब यह कि नवोदितों के लिये तो ग़ज़ल माँ जैसा व्यहवार करती है परन्तु इस विधा में पारंगत व्यक्तियों को भी कभी अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है। "बात बनाये भी नहीं बनती" जैसी कठिन परिस्थिती इनके सामने उत्पन्न हो जाती है। इस शेर पर मेरी तज़्मीम भी है, - निसार करती है उस पर ये ममता के कंवल प्रख़्यात शाइर श्री कृष्ण बिहारी 'नूर' के एक मशहूर शेर : चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो इस शेर पर मैंने अपनी ओर से तीन मिसरे लगाये हैं: "तुम जो चाहो तो ये भी कर देखो यह तज़्मीन श्री तर्ज़ साहिब को सादर समर्पित है। अब मैं आपको एक पद्यात्मक रचना सुनाना चाहूँगा, मौके की चीज़ है, समाअत फ़रमाएँ: किस कदर रौशन है महफ़िल आज की अच्छा लगा श्री आर. पी. शर्मा 'महरिष्' |
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