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12.05.2007
 

श्वेत पक्ष हैं आत्मकथाएँ, श्याम पक्ष है ’’मधुशालाएँ’’- बच्चन की १००वीं जयन्ती पर बीकानेर में हुई विचार गोष्ठी -
प्रस्तुति : संजय पुरोहित, बीकानेर


 

अध्यक्षीय उद्‌बोधन देते हुए डॉ. मदन केवलिया

बीकानेर - हालवाद के शीर्ष कवि हरिवंश राय बच्चन की सौवीं जयन्ती पर उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर विस्तृत चर्चा का आयोजन मंगलवार दिनांक २७ नवम्बर, ०७ को हिन्दी विश्व भारती अनुसंधान परिषद् बीकानेर द्वारा किया गया। नागरी भण्डार मन्दिर में आयोजित इस विचार गोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रख्यात आलोचक डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मदन केवलिया ने की। विशिष्ट आतिथि शिक्षाविद् श्री बी.डी.जोशी थे। इस अवसर पर विषय प्रवर्तन वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् श्री रामनरेश सोनी ने किया। उन्होंने बच्चन के जीवनवृत्त पर प्रकाश डालते हुए सही मायनों में जनकवि बताया। उनके अनुसार बच्चन जी ने ही सरल, सहज, सरस भाषा के माध्यम से हिन्दी कविता को क्लिष्टता के रूखे खोल से निकाल कर पाठकों, श्रोताओं तक पहुँचाने वाला सेतु बनाया।

पत्र-वाचन करते हुए कवयित्री श्रीमती उषा किरण

पत्र वाचन करते हुए कवयित्री श्रीमती उषा किरण ने बच्चन जी की आत्म कथा के चार कालखण्डों का विषद् वर्णन करते हुए कहा कि उनकी कविताएँ उनके व्यक्तिगत जीवन का प्रतिबिम्ब हैं। बच्चन जी के जीवन में जो कुछ घटा उसकी परिणति उनके शब्दों के माध्यम से कवितामयी होकर हुई। बच्चन जी की आत्मकथाएँ अत्यन्त प्रभावशाली हैं और यह उनके गद्य पर महारथ हासिल होने का संकेत करते हैं। उन्होंने बच्चनजी को सफल गीतकार, गद्यकार व संवेदनशील कवि बताया।  इस अवसर पर बोलते हुए विशिष्ट अतिथि श्री बी.डी. जोशी ने बच्चन को लगनशील व्यक्तित्व का धनी, सरल हृदयी और स्पष्टतावादी कवि बताया। उन्होंने डॉ. हरिवंश राय बच्चन की सन् १९६५-६६ की बीकानेर यात्रा के संस्मरण भी सुनाए। इस मौके पर युवा साहित्यकार संजय पुरोहित ने बच्चनजी के जीवन से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए मधुशाला की कुछ रूबाईयों का सस्वर पाठ कर श्रोताओं को आनन्दित कर दिया।

मुख्य अतिथि प्रख्यात आलोचक - डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात आलोचक डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा ने अपने वक्तव्य में बच्चन जी को मधुशाला, मधुबाला जैसी रचनाओं के लिए कटघरे में खड़ा कर दिया। डॉ. आसोपा ने कहा कि जब राष्ट्र परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए जूझ रहा था तो बच्चन जी ने मद्यपान जैसी सामाजिक बुराई को अपनी रचनाओं का आधार बना कर उस दौर की समस्त पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने का कृत्य किया जो कि नितांत आलोचनीय है। उन्होंने कहा कि मधुशाला की रुबाईयों में भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों की जमकर खिल्ली उड़ाई गई है।  डॉ. आसोपा ने कहा कि इन कृतियों के कारण ही हालावाद प्रकाश में आया और आज हालावादी कवि शून्य हैं। दूसरी ओर डॉ. आसोपा ने मधुशाला के इतर सभी रचनाओं को श्रेष्ठ शब्द शिल्प बताया। उन्होंने कहा कि उनकी आत्म कथा के चारों खण्ड अत्यन्त उनकी अत्यन्त विलक्षण गद्य शैली को प्रदर्शित करते हैं और वे उनके प्रशंसक हैं। ’’निशा निमंत्रण’’ को उनकी श्रेष्ठ रचनाओं की श्रेणी में रखते हुए डॉ. आसोपा ने उनके जीवन में घटी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में उनके कृतित्व पर प्रकाश डाला।

मधुशाला की रुबाइयों का सस्वर पाठन करते हुए संजय पुरोहित

विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मदन केवलिया ने भी बच्चन की कविताई में शराबखोरी को प्रोत्साहित करने के लिए उनकी आलोचना की । डॉ. केवलिया ने कहा कि मधुशाला, मधुबाला और मधुकलश के अलावा भी बच्चन का विराट रचना संसार है जिनमें शेक्सपीयर की आत्मा वाले अनुवाद जैसे हेमलेट, मैकबथ, उनकी अन्य काव्य कृतियाँ, उनके गद्य शामिल हैं। उनका शोध अंग्रेजी साहित्य की विशिष्ट थाती है तो उनकी आत्मकथा हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर है। उन्होंने गद्य लिखने वाले प्रत्येक आकांक्षी को एक बार बच्चन की जीवनकथ्य को पढ़ने का आह्वान भी किया।

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार श्री गौरीशंकर मधुकर, डॉ. ब्रह्माराम चौधरी, युवा कवि जुगल किशोर पुरोहित, स्वतंत्र विचारक सोहन सिंह भदोरिया ने भी अपने विचार रखे।

विचार गोष्ठी के संयोजक श्री देवशर्मा ने आभार व्यक्त करते हुए बताया कि बच्चन जी की जन्म शताब्दी वर्ष में पूरे वर्ष हिन्दी विश्व भारती अनुसंधान परिषद् विभिन्न विचार गोष्ठियों का आयोजन करेंगी।


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