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ISSN 2292-9754

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01.03.2016


दुःख, सन्तोष श्रीवास्तव की कहानियों का स्थायी भाव है
सुमिता केशवा

"दुःख सन्तोष श्रीवास्तव की कहानियों का स्थायी भाव है। उन्होंने दुःख को जिया है और ज़िन्दगी के कई रंग इनकी कहानियों में शिद्दत के साथ महसूस किये जा सकते हैं" ये बातें सूरज प्रकाश ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में संतोष श्रीवास्तव के कहानी संग्रह "आसमानी आँखों का मौसम" के लोकार्पण के अवसर पर कहीं। यह कार्यक्रम मणि बेन नानावटी महिला महाविद्यालय में आयोजित किया गया।

लोकार्पण समारोह में दिल्ली से पधारे "पाखी" के सम्पादक प्रेम भारद्वाज ने सन्तोष की कहानियों में भाषा के सहज प्रवाह को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी रचना को पढ़ते हुए यदि किसी बड़ी घटना का स्मरण हो आये तो वह सफल रचना मानी जाती है। संग्रह की कहानियों में सब तरफ आग है लगी हुई, अंकुश की बेटियाँ, नेफ्र्टीटी की वापिसी ऐसी ही कहानियाँ है। कहानियों के संग-संग पत्रकार की समग्र दृष्टि भी उनके लेखन की ख़ासियत है। विशेष अतिथि के रूप में "दमखम" के सम्पादक वरिष्ठ कथाकार मनहर चौहान ने लेखिका को उनके निखरते लेखन के लिए बधाई दी। मॉरीशस के प्रख्यात साहित्यकार राज हीरामन ने अपना बधाई सन्देश भेजा जिसका वाचन किया गया।

सुमिता केशवा ने सरस्वती वन्दना के साथ-साथ सन्तोष श्रीवास्तव के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। जहाँ एक ओर रायपुर से आई मधु सक्सेना ने कहा कि सन्तोष की कहानियाँ साक्षी भाव से नहीं पढ़ी जा सकती उनमें डूबना ही होता है, वहीं लेखिका ने यह स्वीकार किया कि वे कथ्य को पूरी सामर्थ्य, सहजता और संवेदनशीलता से कहानियों में ढालने की कोशिश में बार-बार अपने लिखे में डूबती उतराती हैं।

डॉ. रवीन्द्र कात्यायन द्वारा संचालित इस कार्यक्रम में महानगर के लेखक धीरेन्द्र अस्थाना, कमलेश बक्शी, कैलाश सेंगर, सिब्बन बैज़ी, मधु अरोड़ा, हस्ती मल हस्ती, उमाकांत बाजपेयी, प्रेमजनमेजय तथा विश्व मैत्री मंच की सभी सदस्याओं सहित, सम्पादक, पत्रकार, मिडिया के लोग उपस्थित थे।


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