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| 12.25.2007 |
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नहीं रहा आम आदमी का कवि त्रिलोचन |
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हिन्दी की प्रगतिशील चिंतन परंपरा के प्रमुख स्तंभ और आम आदमी के अपने
कवि त्रिलोचन शास्त्री के निधन पर उत्तर-प्रदेश के ऐतिहासिक नगर,
नजीबाबाद में
10
दिसंबर को एक शोक सभा का आयोजन किया गया,
जिसमें स्थानीय साहित्यकारों के अतिरिक्त मोबाइल फोन के माध्यम से देश
के विभिन्न राज्यों के प्रसिद्ध साहित्यकारों ने शोक संवेदना व्यक्त कर
त्रिलोचन शास्त्री को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रसिद्ध हिन्दी विद्वान
डॉ. प्रेमचन्द जैन की अध्यक्षता में उन्हीं के आवास पर संपन्न इस सभा
का संचालन मणिपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवराज ने किया।
सोमवार की सायं पाँच बजे से आयोजित शोक सभा में अरूणाचल से डॉ. विनोद
मिश्र ने मोबाइल पर दिये अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि त्रिलोचन
की कविताओं में लाहौर में रिक्शा चलाने वाले लोगों की तस्वीर भी दिखायी
देती है और किसानों की पीड़ा भी। वे जनवादी कवि थे। त्रिलोचन जैसा कवि न
कभी हुआ है और न होगा। जयपुर से प्रख्यात जनवादी साहित्यकार विजेन्द्र
ने त्रिलोचन शास्त्री को लोकधर्मी परंपरा का बहुत बड़ा कवि,
तपस्वी व मनीषी बताते हुए कहा कि उन्होंने हिन्दी साहित्य में अनुकरणीय
कीर्तिमान रचा। उन्होंने कहा कि आने वाली साहित्यिक पीढ़ियाँ उनसे
प्रेरणा लेती रहेंगी। उनकी कविता में लोकजीवन की पीड़ा और स्पंदन साफ
सुनायी देता है। दिल्ली से प्रख्यात वयोवृद्ध साहित्यकार विष्णु
प्रभाकर ने कहा कि त्रिलोचन भी चले गये अब,
मन
नहीं लगता। मैं भी जाना चाहता हूँ!,
बस
पता नहीं कब जाना होगा। यह कहते हुए वह अत्यंत भावुक हो गये। कोल्हापुर
से डॉ. अर्जुन चह्वाण ने उन्हें सरलता एंव सादगी से भरा हुआ महान आदमी
बताते हुए कहा कि त्रिलोचन की सादगी और सरलता दिखावे की नहीं थी।
उन्होंने अपनी कविता में भी कोई छद्म नहीं पाला। वह सामान्य जन से जुड़े
थे। आज सचमुच यह लगता है कि सामान्य जन के लिए लिखने वालों का
सूर्यास्त होने जा रहा है। बनारस में निवास कर रहे वाचस्पति जी हिन्दी
के बहुत से मूर्धन्य साहित्यकारों के संपर्क में रहे हैं। नागार्जुन और
त्रिलोचन शास्त्री से उनकी घनिष्ठता रही है। उन्होंने बनारस से ही
मोबाइल पर कहा कि त्रिलोचन जी संध्याकाल में बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय में आ जाते थे। प्रेमचन्द जैन जी और गुरुवर शिवप्रसादजी
के साथ आचार्य हजारी प्रसाद जी के यहाँ भी जाते थे। महाप्राण निराला ने
1940
में अपनी एक रचना में अपना रचनात्मक अकेलापन देखा था- "मैं अकेला/
देखता हूँ आ रही/ मेरे दिवस की सांध्य वेला।" वाचस्पति जी ने भावुक
होकर कहा कि पिछले कुछ समय से धरती और दिगंत के कवि त्रिलोचन ने भी
अपनी सांध्य वेला का अनुभव अपने जीवन में करना प्रारम्भ कर दिया था,
लेकिन
उनका स्वर
’धरती’
जो
उनका पहला संग्रह था उसी से मिलता हुआ था-आज मैं अकेला हूँ/ अकेला रहा
नहीं जाता/ सुख-दु:ख एक भी/ सहा नहीं जाता। त्रिलोचन पिछले वर्षों में
सचमुच अकेले हो गये थे। पेट का अलसर फट जाने के कारण वह अपने छोटे
पुत्र के साथ ज्वालापुर भी रहे। वह जब तक जीवित रहे चलते रहे।
’शब्द’
नाम
के सॉनेट संग्रह को वह अपना उत्तम संग्रह मानते थे। नजीबाबाद के
साहित्यकार राजेंद्र त्यागी ने कहा कि त्रिलोचन शास्त्री के चले जाने
से हिन्दी जगत को धक्का लगा है। उन्होंने जिस विधा,
सॉनेट
को अपनाया है,
वह
दुर्लभ है। ऐसा साहित्य अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। पटना से प्रगतिशील
साहित्य चिन्तक डॉ. नन्दकिशोर नवल ने विगलित हृदय से त्रिलोचन जी का
स्मरण किया। उन्होंने कहा कि उनसे मेरा संबन्ध
1967
से था। हमारे पारिवारिक संबन्ध थे। जब वे पटना आते थे,
मेरे
घर ही ठहरते थे। त्रिलोचन अपनी परंपरा के अंतिम कवि थे। वे आधुनिक
कविता के सबसे बड़े कवि भी थे। शमशेर,
केदार,
नागार्जुन,
मुक्तिबोध और त्रिलोचन प्रगतिवादी कवि थे। जिनमें चार पहले ही जा चुके
थे। अब त्रिलोचन भी चले गये।
यह समाचार हत्प्रभ कर देने वाला है। निराला को अपना आदर्श मानकर
वह चलते रहे। उन्होंने वैसा ही संघर्ष किया। उन्होंने निराला से भी आगे
जाकर अपना रास्ता निकाला और आधुनिक कविता को नया आयाम दिया।
श्रद्धांजलि वक्तव्य के अंत तक आते-आते नवल जी मोबाइल पर ही फूट-फूट कर
रोने लगे। त्रिलोचन जी को जीवन संध्या में हिन्दी वालों की जिस उपेक्षा
को झेलना पड़,
नवल
जी ने उसका भी संकेत किया। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे नजीबाबाद
के लेखकों के धन्यवादी है कि उन्होंने उन्हें त्रिलोचन जी को
श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर दिया। गुवाहाटी से प्रखर पत्रकार,
पूर्वोदय के अधिशासी संपादक रवि शंकर
’रवि’
ने
कुछ वर्ष पहले त्रिलोचन के लिए एक कविता लिखी थी,
जिसे
वे उन्हें स्वयं सुनाना चाहते थे। अचानक त्रिलोचन जी के चले जाने से वह
अवसर भी चला गया। रवि शंकर के मन में हमेशा के लिए एक कसक रह गयी,
जो
उनके श्रद्वांजलि वक्तव्य में साफ झलकी। गुवाहाटी से उन्होंने त्रिलोचन
के लिए लिखी दसी कविताओं का पाठ किया। भरे मन से उन्होंने कहा कि
त्रिलोचन के न रहने से एक अजीब तरह की बेचैनी हो गयी है। मैं उनके
संपर्क में अधिक नहीं रहा,
परन्तु उनकी कविताओं से मेरा लगभग व्यक्तिगत संबन्ध रहा है। हैदराबाद
से प्रख्यात कवयित्री और विश्व भर में हिन्दी साहित्य,
भाषा
और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में जुटी डॉ. कविता वाचक्नवी ने कहा
कि ऐसा अनुभव हो रहा है,
मानो
मुझे व्यक्तिगत क्षति हुई है। उनका भाषा में जो सतत् प्रयोगधर्मिता का
अंदाज रहा वह मुझे लुभाता रहा। भाषा पर उनका संपूर्ण नियंत्रण था। वे
भाषा के आचार्य कवि थे। नन्द किशोर नवल की भाँति ही डॉ. कविता वाचक्नवी
भी त्रिलोचन जी को मिली घातक उपेक्षा से भीतर तक आहत थीं। उन्होंने कहा
कि इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि जब भारतीय साहित्य का यह शिखर
पुरूष पूरी तरह अशक्त स्थिति में पहुँच गया तो हिन्दी के छुटभैये
ठेकेदारों ने इनके संबन्ध में तरह-तरह के स्पष्टीकरणनुमा वक्तव्य जारी
किए। सचमुच हिन्दी वालों ने ही उन्हें मार डाला। उनका जाना साहित्यिक
से अधिक सांस्कृतिक क्षति है। नजीबाबाद निवासी साहित्यकार बलवीर सिंह
वीर ने इस दु:खद अवसर पर त्रिलोचन जी के प्रति अपनी भावनाएँ प्रकट करते
हुए कहा कि आज प्रगतिवादी चेतना का अंतिम स्तंभ ढह गया है। उनके चले
जाने से हिन्दी को जो क्षति हुई है,
उसकी
भरपाई नहीं हो सकती। राउरकेला से ओड़िया और हिन्दी के प्रसिद्ध विद्वान
अर्जुन शतपथी ने अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि उनके उठ जाने से
निश्चय ही हिन्दी जगत की बहुत बड़ी हानि हुई है। त्रिलोचन जी जैसे
पितामह कल्प प्रगतिवादी कवि का स्थान सदा के लिए रिक्त रह जायेगा।
उन्होंने कवि त्रिलोचन के साथ बिताए समय को भी स्मरण किया।
त्रिलोचन जी के निधन के समाचार के समय हिन्दी के युवा समीक्षकों में
महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा त्रिचुरापल्ली में
थे। उन्होंने वहीं से मोबाइल पर कहा कि त्रिलोचन जी के जाने से ऐसा लगा,
जैसे
अपने परिवार का कोई शिखर खिसका हो। त्रिलोचन जी के न रहने से जनपक्षीय
काव्य के क्षेत्र में एक शून्य उत्पन्न हो गया है। वे बहुभाषाविद् थे
और शब्दों से कौतुक करने वाले थे। वे भारतीय साहित्य के मूल सरोकारों
की पहचान रखने वाले ऐसे कवि थे,
जिन्हें हम कालिदास के साथ जोड़कर देख सकते है। भारत की अन्य भाषाओं को
भी उन्होंने आत्मसात किया हुआ था। उन्होंने नजीबाबाद के माता
कुसुमकुमारी हिन्दीतरभाषी हिन्दी साधक सम्मान समारोह में सन्
1990
में मुख्य अतिथि के रूप में भारत- भर के लेखकों को संबोधित करते हुए
हिन्दी भाषा के मानकीकरण का सवाल उठाया था। वह बात आज भी हमारे सामने
ज्यों की त्यों है। वे हिन्दी का सार्वदेशिक रूप में मानकीकरण चाहते
थे। प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने इस बात पर बल दिया कि यदि हम हिन्दी के
सार्वदेशिक मानक रूप का विकास करेंगे तो यह हमारी उनके प्रति
सच्ची श्रद्धांजलि होगी। गुवाहाटी से सैंटीनल हिन्दी दैनिक के सम्पादक
दिनकर कुमार ने कहा कि महान चिंतक और जुझारू जीवन जीने वाले त्रिलोचन
शास्त्री के निधन से हिन्दी कविता में कभी न भरा जा सकने वाला एक और
शून्य दर्ज हो गया है। वे बाजारवाद के विरोधी थे। भाषाप्रयोग के नाम पर
वे कभी इतने जटिल नहीं हुए कि लोक की सत्ता और प्रभाव को भुला दें।
आधुनिक हिन्दी समालोचना में रामविलास शर्मा,
नामवर
सिंह और प्रकाशचन्द्र गुप्त की परंपरा को नया अर्थ देने वाले,
केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,
आगरा
के निदेशक प्रोफेसर शंभुनाथ ने कहा कि त्रिलोचन शास्त्री जी ने अनेकता
व प्रगतिशीलता की ओर बढ़ते हुए भी अपना संबन्ध लोक संस्कृति और काम करने
वालें हाथों से हमेशा बनाये रखा। उन्होंने बहुत अच्छे सॉनेट लिखे हैं।
उनकी मृत्यु से प्रगतिशील कवियों का अंतिम स्तंभ भी टूट गया है। साहू
जैन महाविद्यालय,
नजीबाबाद के हिन्दी विभाग में कार्यरत डॉ. अरुण देव जायसवाल ने अपने
श्रद्धांजलि वक्तव्य में कहा कि त्रिलोचन जी आज हमारे बीच से उठकर चले
गये,
परन्तु इसकी भूमिका बहुत पहले तैयार हो गयी थी। एक रचनाकार का अपने
रचनाकर्म से धीरे-धीरे च्युत हो जाना ही अंतत: उसे उसकी मृत्यु की ओर
ठेलता जाता है। डॉ. जायसवाल ने पाश्चात्य छन्द सॉनेट को ठेठ हिन्दी
छन्द की प्रकृति के अनुरूप ढालने में त्रिलोचन जी की ऐतिहासिक भूमिका
का स्मरण भी किया। नजीबाबाद के चित्रकार एंव कवि इंद्रदेव भारती ने कहा
कि त्रिलोचन शास्त्री आम आदमी के अपने कवि थे। वे उसकी पीड़ा को अच्छी
तरह समझते थे। भारती जी ने यह भी कहा कि त्रिलोचन जी की कविताएँ सदैव
जीवित रहेंगी।
ओड़िया-हिन्दी के वरिष्ठ अनुवादक,
शंकरलाल पुरोहित ने भुवनेश्वर से त्रिलोचन शास्त्री को भावुक होकर
स्मरण करते हुए कहा कि वे त्रिलोचन जी से पहली बार
35
साल पहले बनारस में मिले थे। वे कविता पाठ के लिए आए थे,
मै
उनकी प्रसिद्धि से परिचित था और उनसे मिलने को व्याकुल था,
लेकिन
जब त्रिलोचन जी आए तो लगा ही नहीं कि कोई कवि आया है। वे एकदम किसी
ग्रामीण गीब किसान की तरह लग रहे थे। यह उनकी सादगी थी जो मुझे आज तक
याद है। ठीक यही सादगी और सहजता उनकी कविताओं में भी है। चेन्नई से
मोबाइल पर जाने माने हिन्दी और तेलुगु लेखक डॉ. बालशौरि रेड्डी ने
त्रिलोचन जी को याद किया। वे उनसे अनेक बार मिले थे। रेड्डी जी ने कहा
कि प्रगतिशील धारा के शक्तिमान कवि त्रिलोचन के अभाव में हिन्दी
साहित्य के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। संकट यह है कि उन्होंने
काव्य और काव्यभाषा के लिए जीवनभर जिस संघर्ष चेतना की अगुवाई की,
वह
कार्य अब कौन करेगा। हिन्दी में अंत में उनके साथ जो व्यवहार किया गया
वह मेरे जैसे लोगों की चिंता को और भी बढ़ाने वाला है।
हिन्दी और मणिपुरी की समीक्षक और अनुवादक डा. विजयलक्ष्मी ने इम्फाल से
अपने श्रद्धांजलि वक्तव्य में त्रिलोचन जी को उनकी कविताओं के जरिए
समझने और समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उन्हें यह सौभाग्य
प्राप्त नहीं हो सका कि वे त्रिलोचन जी से मिल पातीं,
लेकिन
यह भी तो सही है कि कवि किसी न किसी अंश में अपनी हर कविता में होता
है। मैने प्रगतिशील चेतना के उन्नायक त्रिलोचन जी को उनकी कविताओं में
ही देखा है। डॊ विजयलक्ष्मी ने त्रिलोचन जी की अनेक कविताओं के अंशो का
पाठ किया और बताया कि वे कहाँ
किस रूप में उपस्थित है। कोचीन,
केरल
से प्रख्यात अनुवादक और समालोचक डॉ. अरविंदाक्षन ने त्रिलोचन जी के कवि
व्यक्तित्व के साथ ही उनके शोधकर्ता ओर शब्दकोश संपादक रूप को भी याद
किया। उनके लिए कवि त्रिलोचन की कविताएँ जीवन के निकट ले जाती हैं तो
उनका शोधकर्ता रूप भाषा के भीतरी स्वभाव को समझने के अपूर्व साधन
प्रदान करता है। डॉ. अरविंदाक्षन ने कहा कि त्रिलोचन जी की अनुपस्थिति
हम सभी को हमेशा खलेगी,
क्योंकि उनके जैसा व्यक्ति नहीं मिलेगा।
अपने
अध्यक्षीय वक्तव्य में हिन्दी साहित्य और जैन दर्शन के मर्मज्ञ डॉ.
प्रेमचन्द जैन ने त्रिलोचन शास्त्री के जीवन और व्यक्तित्व पर विस्तार
से प्रकाश डाला। उन्होंने बनारस के उस कालखण्ड का जीवंत चित्रण किया जब
त्रिलोचन जी बनारस में प्रसिद्ध
कथाकार शिवप्रसाद सिंह के साथ सांध्यकालीन भ्रमण पर निकलते थे
और साहित्य चर्चा करते थे। त्रिलोचन जी उन दिनों सॉनेट साध रहे थे तथा
प्रतिदिन उनकी संख्या और विषय-वस्तु की बातें करते थे। डॉ. जैन ने
हिन्दी के इस महान कवि की एक और विशेषता का उल्लेख भी किया,
वह थी
अपनी कविता के साथ ही अन्य कवियों की कविताओं का स्मरण और प्रभावशाली
पाठ। त्रिलोचन जी निराला की,
राम
की शक्ति पूजा की अद्भुत आवृत्ति किया करते थे।
इस
तरह श्रद्धांजलि अर्पित की राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों के
साहित्यकारों ने अपने प्रिय युगजीवी लेखक को जिनकी
भौतिक उपस्थिति वहाँ नहीं थी (कुछ लोगों को छोड़ कर) लेकिन क्या
सचमुच भारत के इस महान कवि की शोक-सभा में साहित्य सेवी अनुपस्थित थे?
मोबाइल के सहारे लगातार लगभग चार घण्टे चलने वाली ऐसी सभा
भारतभर में और कहाँ-कहाँ हुई! |
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