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02.24.2007
 

'संवाद' एवं 'ये घर तुम्हारा है' का लोकार्पण
राजेश्वरी मंडोरा
 


'व्यंग्य यात्रा' के तत्वावधान में लालित्य ललित की पुस्तक 'संवाद' एवं तेजेन्द्र शर्मा के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह 'ये घर तुम्हारा है' का लोकार्पण बलदेव वंशी एवं प्रताप सहगल ने किया तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता दिविक रमेश ने की। कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि गोष्ठी इतिहास में पहली बार किसी कवि ने फोन के माध्यम से अपनी कविता सुनाते हुए उपस्थिति दर्ज की। तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से अपनी कविता 'ये घर तुम्हारा' का पाठ फोन के माध्यम से दिल्ली में बैठे श्रोताओं के समक्ष किया और श्रोताओं ने उनकी पुस्तक पर बधाई देते हुए अपनी प्रतिक्रियाएँ भी व्यक्त कीं। 'संवाद' में लालित्य ललित द्वारा विष्णु प्रभाकर, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन शास्त्री, रामदरश मिश्र, रामनारायण उपाध्याय आदि इक्कीस साहित्यकारों से विभिन्न अवसरों पर की गई बातचीत संकलित है। इस अवसर पर दोनों पुस्तकों पर दिविक रमेश, बलदेव वंशी, प्रताप सहगल, महेश दर्पण, देवशंकर नवीन, मनोहर पुरी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन प्रेम जनमेजय ने किया।

अध्यक्ष दिविक रमेश ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा - "इस पुस्तक में साक्षात्कार मिला, सम्वाद मिला तथा जिज्ञासा भी मिली। पुस्तक पढ़कर जैनेन्द्र की याद ताजा हो गई। संपादक ने व्यक्तित्व, विचार और सोच के अनुरूप सवाल पूछे हैं। पुस्तक में हरीश नवल के साक्षात्कार में जहाँ एक ओर हरीश नवल की उपलब्धियों  के बखान का पता चलता है वहीं दूसरी ओर प्रेम जनमेजय के साक्षात्कार में उनके रचना कर्म पर केन्द्रित व्यंग्य विधा का चरित्र खुलकर स्पष्ट होता है, जबकि दोनों ही एक विधा के रचनाकार हैं। इस प्रकार का अंतर अपनी तरह की उपलब्धि है। त्रिलोचन शास्त्री और रामविलास शर्मा की बातचीत में भी यही बात देखने को मिलती है।"  उन्होंने इस साहित्यिक प्रयास के लिए लालित्य ललित की प्रशंसा की। दिविक ने इस अवसर पर तेजेन्द्र शर्मा के संकलन से उनकी कविता 'हिन्दी की दुकानें' का पाठ किया और तेजेन्द्र की व्यंग्य प्रतिभा की प्रशंसा की।

मुख्य अतिथि प्रताप सहगल ने कहा - "ललित ने जो कार्य किया है वह बड़े जीवट का काम है। अगर पुस्तक का चरित्र कुछ व्यस्थित होता तो बात और भी उम्दा हो जाती। लेकिन बधाई इस बात की है कि इस संग्रह में विभिन्न पीढ़ियों के इतने लोगों को शामिल करना बड़ी बात है। संवाद का मतलब हस्तक्षेप है, ललित ने बहुत ही बारीकी से काम किया है।"

प्रसिद्ध कथाकार महेश दर्पण ने कहा -"इस पुस्तक की खास विशेषता यह है कि यह मासूम, संवेदनशील, जिज्ञासा से पूर्ण पूछे गए सवालों का संग्रह है जो कि रचना कर्म से जुड़े हैं। यह एक छ्लविहीन पुस्तक है, इंटरव्यू लेखकों में पद्मश्री शर्मा कमलेश और कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की याद पुस्तक पढ़ते हुए बरबस आ गई। इस दिशा में रणवीर रोग्ना नाम भी उल्लेखनीय है। दिल्ली जैसे शहर में ललित का प्रयास सराहनीय है। ललित के मुँह से मैंने एक शब्द दिल्ली के खिलाफ़ कभी नहीं सुना।"

विशिष्ट अतिथि बलदेव वंशी ने कहा - "साहित्य बड़ा विराट क्षेत्र है लेकिन मासूमियत जैसी बड़ी चीज इस पुस्तक में दिखाई देती है। लेखक के भीतर के सच को लालित्य ललित ने निकालने का प्रयास किया है। देखा जाए तो सही मायने में यह साहित्यिक परिसर का आंकलन है। साहित्यकार के भीतर के परिदृश्य को संवाद रेखांकित करती है। देवशंकर नवीन ने कहा - "ललित अपने जीवन की कार्यशैली में लाग लपेट बिल्कुल नहीं करते, यही स्वरूप पुस्तक में भी दिखाई देता है।" शशि सहगल ने कहा कि संवाद पुस्तक में ललित की मासूमियत के बहाने लोगों ने अपनी मक्कारी व्यक्त की है जिसे ललित ने हू-ब-हू व्यक्त कर दिया है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रेम जनमेजय ने ललित के श्रम की प्रशंसा की और बेबाकी से पूछे गए सवालों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि लेखक केवल आपसे साक्षात्कार नहीं करता है अपितु आपसे बातचीत करता है। ललित अपनी अग्रज पीढ़ी से सवाल करते हुए बहुत बेबाक और सहज होते हैं। प्रेम जनमेजय ने कार्यक्रम का समापन करते हुए तेजेन्द्र की कविता 'कि अपने शहर में अपना नहीं ठिकाना है' का पाठ किया। कार्यक्रम में मनोहर पुरी, उषा पुरी, आशा कुंद्रा, मदन गिरी और राजेश्वरी मंडोरा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

१-- तेजेन्द्र शर्मा के काव्य-संकलन, 'ये घर तुम्हारा है' का लोकार्पण करते दायें से - मनोहर पुरी, प्रेम जनमेजय,महेश दर्पण, प्रताप सहगल, दिविक रमेश, बलदेव वंशी, लालित्य ललित, देवशंकर नवीन

२- लालित्य ललित की पुस्तक 'सम्वाद' का लोकार्पण करते, बाएँ से - मनोहर पुरी, प्रेम जनमेजय, महेश दर्पण, प्रताप सहगल, दिविक रमेश, बलदेव वंशी, लालित्य ललित, देवशंकर नवीन

३- अपनी बात कहते बलदेव वंशी