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ISSN 2292-9754

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12.09.2014


"सारांश समय का" लोकार्पण समारोह एवं काव्य गोष्ठी
महिमा श्री

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली के ‘अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र’ में 'शब्द व्यंजना' और 'सन्निधि संगोष्ठी' के संयुक्त तत्वाधान में 'सारांश समय का' कविता-संकलन का लोकार्पण समारोह एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसून लतांत ने की, जबकि लक्ष्मी शंकर वाजपेयी मुख्य अतिथि एवं रमणिका गुप्ता, डॉ. धनंजय सिंह, अतुल प्रभाकर विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित थे. कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अरुण कुमार भगत थे तथा संचालन महिमा श्री ने किया।

इस आयोजन में बड़ी संख्या में कवि, लेखक तथा साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए. कार्यक्रम दोपहर ढाई बजे से शाम सात बजे तक चला।

'सारांश समय का' कविता संकलन का संपादन बृजेश नीरज और अरुण अनंत ने किया है। इस संकलन में अस्सी रचनाकारों की बेहतरीन कविताएँ सम्मिलित हैं जिसकी सराहना अतिथियों ने की। लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कविताओं के चयन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि यह संकलन हिन्दी साहित्य के लिए शुभ संकेत देता है। इसमें कई मुक्कमल कविताएँ हैं। उन्होंने संकलन में सम्मिलित कई कविताओं का सस्वर पाठ कर रचनाकारों को प्रोत्साहित किया।

उन्होंने कहा कि १२५ करोड़ के देश में अगर ८० लाख लोग भी यदि कवि हो जाएँ तो समाज बेहतर हो जाएगा। कविता अभी संकट में है, कई विधाएँ लुप्त हो रही हैं उन पर भी काम होना चाहिए। वाचिक परम्परा समाप्त हो रही है, पहले एक शेर, एक कविता भी हलचल मचा देती थी। बिना साधन के जहाँ बिजली भी नहीं थी उस गाँव में भी कविता पढ़ी जाती थी। आज शब्दों की चाट परोसी जाती है। हिन्दी में मंच पर हल्के स्तर की कविताएँ कही जाती हैं। एक अलग ही तरह का गणित है। गम्भीर रचनाकारों ने मंच से दूरी बना ली है। साहित्य का विघटन हुआ है। साम्प्रदायिकता पैदा की गई है। इससे कविता को बड़ा नुकसान हुआ है। उर्दू में ये बंटवारा नहीं है, मंच से दूरी नहीं है। निदा फ़ाज़ली ग़ज़ल पढ़ने मस्कट भी जाते हैं।

मुख्य वक्ता अरुण कुमार भगत का कहना था कि कविता अणु से अनंत की यात्रा है। कविता की विशेषता और लिखने से पहले की रचनाकारों की संवेदनाओं के घनीभूत होने की आवश्यकता के बारे में उन्होंने विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कविता पाठक के हृदय तक सीधे पहुँचती है और हर पाठक अपनी तरह से उसकी अभिव्यंजना करता है। पाठक कविता के लिए तथ्य समाज से लेता है और स्वयं के साथ समाज को भी रचना के साथ जोड़ता है। कविता में जो असर और क्षमता है वह किसी अन्य विधा में नहीं है। कविता में जन समाज को आंदोलित करने की क्षमता है। स्वतंत्रता काल हो या आपातकाल कवियों ने अपनी लेखनी से समाज को झकझोरा भी और दिशा भी दी। समाज में व्याप्त संताप, पीड़ा, दुःख को कवियों ने बखूबी रेखांकित किया। उन्होंने कहा रचना सयास नहीं लिखी जाती है, ये उतरती है, माज़िल होती है, प्रकट होती है। अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से जन-जीवन के कृष्णपक्ष को ही बड़ी संख्या में रेखांकित करने की परम्परा चल पड़ी है। देश और समाज में भोगा गया यथार्थ इन रचनाओं में है पर अगर रचना को कालजयी करना है तो जीवन के शुक्लपक्ष को भी रेखांकित करना होगा।

रमणिका गुप्ता ने अपनी बात कहते हुए कहा आज जन सरोकार का चलन है उसी विषय को माध्यम बनाकर लिखा जाना चाहिए। लोगों तक आपकी बात पहुँचेगी, लोगों के विचारों में परिवर्तन आएगा। उन्होंने कहा मैं आदिवासीयों, पीड़ित दलितों और स्त्रियों के बीच उनके समस्याओं के निवारण के लिए लम्बे समय से काम कर रही हूँ आप भी इन सरोकारों को लेकर लिखें।

आयोजन दो सत्रों में चला। लोकार्पण सत्र में डॉ. धनजंय सिंह, अतुल कुमार, लतांत प्रसून व संग्रह के सम्पादक द्वय बृजेश नीरज और अरुण अनंत ने भी अपनी बात रखी।

लोकार्पण के बाद काव्य गोष्ठी में कवि और कवियत्रियों ने उत्साह के साथ अपनी प्रस्तुति दी। आयोजन की उपलब्धि रही कि हर विधा में रचना पढ़ी गयी। गीत, नवगीत, ग़ज़ल, घनाक्षरी, कुंडलिया, अतुकांत, पद्य की सभी प्रचलित विधाओं की रचनाएँ सुनी और सुनायी गईं। कार्यक्रम के अंत में किरण आर्या ने धन्यवाद ज्ञापन किया।


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