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ISSN 2292-9754

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10.30.2014


अभिनेत्री तनुजा ने किया मधुमती फ़िल्म पर किताब का लोकार्पण
देवमणि पाण्डेय


संगीतकार शांतनु मोइत्रा, लेखिका रिंकी भट्टाचार्य और अभिनेत्री तनुजा

मशहूर लेखिका रिंकी भट्टाचार्य की पुस्तक मधुमती (अनटोल्ड स्टोरीज़ फ़्रॉम बिहाइंड दि सीन) का लोकार्पण 27 अक्टूबर की शाम को मुम्बई के रॉयल याट क्लब में अभिनेत्री तनुजा ने किया। तनुजाजी ने इस अवसर पर बिमल राय के निर्देशकीय कौशल और दिलीप कुमार की अभिनय प्रतिभा के साथ ही अभिनेता प्राण की ज़बरदस्त अदाकारी को भी याद किया।

मधुमती फ़िल्म का पोस्टर और मधुमती किताब

प्रतिष्ठित फ़िल्मकार बिमल राय की श्वेत-श्याम फ़िल्म मधुमती पर आधारित इस पुस्तक में उनकी सुपुत्री एवं लेखिका रिंकी भट्टाचार्य ने कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया है। रिंकीजी ने बताया कि उनके पिता बिमल राय हमेशा बाइंडेड स्क्रिप्ट पर काम करते थे। शूटिंग के दौरान सेट पर उन्होंने कभी पटकथा में एक शब्द की भी तब्दीली को मंज़ूर नहीं किया। उनके पास एक पारिवारिक टीम थी। इस टीम में असित सेन, ऋषिकेश मुखर्जी और सलिलदा जैसे लोग शामिल थे जो अक्सर उनके घर आया करते थे।

इप्टा की वाइस प्रेसीडेंट एवं वरिष्ठ रंगकर्मी निवेदिता बौंथियाल ने इस पुस्तक के कुछ अंश दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में पेश किए। पुस्तक चर्चा में शांतनु मोइत्रा, मैथिली राव, सत्या सरन, अमीन सयानी और अंजुम रजब अली ने भागीदारी की। संगीतकार शांतनु मोइत्रा ने ख़ुद को बिमलराय का एकलव्य बताते हुए कहा कि उनका संगीत एक दोस्त की तरह हमसे बोलता बतियाता है। दृश्य के साथ-साथ झरने की तरह प्रवाहित होता है। चर्चित पत्रकार सत्या सरन ने कहा कि गीतों के फ़िल्मांकन में उन्होंने मुख्य कलाकार और कोरस को अलग-अलग रखा। अगर कोरस आता है तो वहाँ दृश्य में सिर्फ़ कोरस कलाकार ही दिखाई देते हैं लीड कलाकार नहीं। अंजुम रजब अली ने बिमल राय के कथा सूत्र, चरित्र चित्रण, दृश्य और संवाद के तालमेल पर प्रकाश डाला। अमीन सयानी ने कहा कि बिमल राय का सिनेमा मुहब्बत की तरह है जिसे लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सकता।

अभिनेत्री तनुजा के साथ शायर देवमणि पांडेय

सिने एक्सपर्ट मैथिली राव ने कहा कि बिमल राय के ज़माने में यूँ तो फेमिनस्ट शब्द प्रचलित नहीं था मगर वे सही मायने में फेमिनस्ट थे। वे एक ज़मींदार घराने से ताल्लुक़ रखते थे। उन्होंने सामंती समाज में स्त्रियों के सुख-दुख और त्रासदी को क़रीब से देखा था। इसी लिए वे मधुमती, सुजाता, बंदिनी आदि फ़िल्मों में नारी जीवन की व्यथा को असरदार तरीक़े से साकार करने में कामयाब हुए। चर्चा में वक्ताओं ने बड़े आदर के साथ गीतकार शैलेंद्र को याद किया। शैलेंद्र के ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हँसी, हमें डर हैं हम खो ना जाए कही’ तथा ‘अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे’ आदि गीतों के सिनेमाई योगदान को मुक्त कंठ से सराहा गया। अंत में मधुमती फ़िल्म के कुछ हिस्से एवं क्लाइमेक्स प्रदर्शित किया गया।


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