अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.29.2014


कृष्णबिहारी जी की कहानियों पर चर्चा
भरत तिवारी
सम्पादक – शब्दाकंन

 सभा को सम्बोधित करते हुए कृष्ण बिहारी

शब्दांकन संज्ञान की तरफ से पावस 2014 कार्यक्रम 30 जुलाई को साहित्य अकादमी सभागार नई दिल्ली में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बिहारी के कहानी संग्रह उसका चेहरा का लोकार्पण होने के पश्चात उनकी कहानियों पर कई वरिष्ठ वक्ताओं ने प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार रवीन्द्र कालिया ने कहा कि आज बदलते हुए समाज की जो स्थितियाँ हैं उनसे कृष्णबिहारी जी जूझ रहे हैं, इनकी कहानियों को पढ़कर लग रहा है कि समाज के साथ कदम मिलाकर कोई चलने की कोशिश तो कर रहा है। कृष्णबिहारी जी ज्यों ज्यों बूढ़े हो रहे हैं इनकी कहानियों के पात्र जवान होते जा रहे हैं। इनकी कहानियों में ज्यादातर यह होता है कि नायक अनछुए ही रह जाते हैं नायिका से।

समारोह के मुख्य अतिथि राजेन्द्र राव ने कहा कि जीवन में प्रताड़ना, लांछन, बेरोज़गारी व अकेलापन आदि हो तभी लेखक बनना संभव है। कृष्णबिहारी अपने जीवन में यह सबकुछ सहते हुए आज इस इतने अच्छे कथाकार बन सके हैं। इनके दिल में अपने देश के प्रति पीड़ा है इसलिए ये आबूधाबी से बार बार भारत आते हैं। अपने देश से संबंधों को जोड़े रखने के लिए ही इन्होंने निकट पत्रिका निकालनी शुरू की है। इस कथाकार में अनंत संभावनाएँ हैं। मुख्य वक्ता वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने कहा कि एक प्रवासी लेखक तो टूरिस्ट की तरह अपना लेखन परोसता है, जबकि कृष्णबिहारी जी की कहानियाँ हमारे गाँव, घर व संस्कृति की कहानियाँ हैं, जो सवाल पैदा करती हैं, बेचैनी पैदा करती हैं। वरिष्ठ कथाकार अमरीक सिंह दीप ने कहा कि कृष्णबिहारी की कहानियों में एक अलग बात यह है कि इनमें बच्चों की दुनिया की अंतर्सतह की कहानियाँ हैं, जो श्रेष्ठ जीवन का संदेश देती हैं। कथाकार प्रज्ञा पाण्डे ने कहा कि कृष्णबिहारी जी की कहानियों के पात्र हाशिए पर खड़े लोग हैं, जिनमें मजदूरों के साथ साथ निम्न तबके के बच्चे हैं तो दूसरे देशों से लाई गई स्त्रियाँ भी हैं, जो देह व्यापार में धकेली जाती हैं। इनकी कहानियाँ मानवीय संवेदना को बहुत ही करीब से छूती हैं। ये कहानियाँ घोर आशक्ति में डुबाने के बाद हमें विरक्ति की ओर ले जाती हैं। कथाकार रूपसिंह चंदेल ने कहा कि कृष्णबिहारी जी की कहानियों में जीवंतता है तो ताज़गी भी है, भाषा में सहजता है तो बोधगम्यता भी है, नदी जैसा प्रवाह भी है। छोटे वाक्य विन्यास इनकी कहानियों की विशेषता है।

सम्बोधित करती ममता कालिया, बाएँ रूपसिंह चन्देल और दाएँ राजेन्द्र राव

पत्रकार, कथाकार व बिंदिया पत्रिका की संपादक गीताश्री ने कृष्णबिहारी जी की कहानियों पर बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि कृष्ण बिहारी अपनी डुगडुगी नहीं बजाते हैं। अगर वो भारत में होते और साहित्य की राजनीति करते तो क्या तब भी उनकी चर्चा होती। ये एक ऐसे कथाकार हैं जो साहित्यिक क्षेत्र में कम्प्लीट पैकेज हैं, इनकी कहानियों पर चर्चा बेहद ज़रूरी है। स्वयं कृष्णबिहारी जी ने सभी वक्ताओं व उपस्थित लोगों को इस अच्छे कार्यक्रम के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि मेरी कहानियों के पात्र जीवित हैं। अपनी कहानियों में प्रेम के बारे में उन्होंने कहा कि जिस वक्त आप प्रेम कर रहे होते हैं सिर्फ प्रेम ही करना चाहिए। मैं कभी कंफर्ट ज़ोन में नहीं रहा, जीवन से पीड़ा खत्म हो जाए तो भला क्या लिखे लेखक। मैं ऐसे किसी विमर्श के साथ कभी नहीं रहा जो सिर्फ एक पक्ष को लेकर चलता है। मैं वहाँ प्रवासी मजदूर हूँ, प्रवासी कथाकार नहीं, कथाकार तो मैं भारत का हूँ। कार्यक्रम का संचालन रूपा सिंह ने किया। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि हिंदी कथा साहित्य में वर्जनाओं को लेकर दोहरी मानसिकता है। जब कविता व फिल्म आदि में अश्लीलता स्वीकार है तो कथा साहित्य में इसे नकारे जाने की आवाज़ आखिर क्यों उठती है? शब्दांकन के संपादक भरत तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि ऐसे साहित्यकार जो चर्चाओं से दूर रहते हैं उन्हें इस प्रकार के आयोजन से चर्चा में लाने की हम शुरूआत कर रहे हैं। कृष्णबिहारी जी का यह कहानी संग्रह उसका चेहरा इनका दसवां कहानी संग्रह है।

बाएँ से गीताश्री, कृष्णबिहारी और रूपसिंह चन्देल

इस अवसर पर विशेष रूप से वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार, कहानीकार इला कुमार, विवेक मिश्र, सुभाष नीरव, पंखुरी सिन्हा, जयंती रंगनाथन, महेश भारद्वाज, अर्चना वर्मा, आकांक्षा पारे, रचना यादव, अमृता ठाकुर, सगीर किरमानी, कमलेश पाण्डेय पुष्प, स्वतंत्र मिश्र, अजय नावरिया आदि अनेको हस्तियाँ उपस्थित रहीं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें