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ISSN 2292-9754

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10.03.2014


महेंद्र दवेसर ‘दीपक’ के कहानी संग्रह ‘पुष्प-दहन’ का लोकार्पण
संदीप दवेसर

बाएँ से दाएँ: कविता वाचक्नवी, दिव्या माथुर, महेंद्र दवेसर एवं कैलाश बुधवार

दिनांक 10 सितंबर को श्रीमती संगीता बहादुर के कर-कमलों द्वारा लंदन के नेहरू सेंटर में महेंद्र दवेसर ‘दीपक’ के चौथे कहानी-संग्रह ‘पुष्प-दहन’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। कार्यक्रम के संचालक थे बीबीसी के हिंदी यूनिट के पूर्व प्रधान, लेखक और कथा-यू.के. के अध्यक्ष सर्वप्रसिद्ध साहित्यकार, श्री कैलाश बुधवार। कार्यक्रम में शामिल थीं दो विश्वविख्यात साहित्यकार, सुश्री दिव्या माथुर (कहानीकार, कवियत्री, वातायन की संस्थापक-अध्यक्ष और नेहरू सेंटर की पूर्व वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी) और डॉक्टर कविता वाचक्नवी (कहानीकार, कवियत्री, शोधक, समीक्षक और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की परीक्षक)।

नेहरु केंद्र की निदेशक,
श्रीमती संगीता बहादुर

कार्यक्रम के आरंभ में नेहरू सेंटर की निदेशक श्रीमती संगीता बहादुर ने दर्शकों की प्रचुर उपस्थिति पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और उनका हार्दिक स्वागत किया। तत्पश्चात उन्होंने महेंद्र दवेसर का परिचय कराया और उनके साहित्यिक जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि अपलब्धि के लिए आयु की दीवार नहीं हुआ करती। उन्होंने बताया कि उन्होंने लेखक की कई कहानियाँ पढ़ी हैं जो कि अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं क्योंकि उनके विषय जन-साधारण के जीवन से जुड़े हुए होते हैं। उन्होंने सभा के संचालक श्री कैलाश बुधवार, सुश्री दिव्या माथुर, डॉक्टर कविता वाचक्नवी और श्री महेंद्र दवेसर को सादर मंच पर निमंत्रित किया।

कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता डॉक्टर कविता वाचक्नवी ने कहा कि कई बार बड़े-बड़े लेखक भी अनावश्यक वर्णन के कारण अपनी रचनाओं को कमज़ोर कर देते हैं और पाठक अपने कौतुहूल में आगे "जंप" कर जाता है। महेंद्र द्वेसर की रचनाओं में यह कमज़ोरी नहीं मिलती और कहानियों का बहाव बना रहता है। पुस्तक में शामिल देश-विभाजन संबंधी कहानियों ‘दो पाटन बिच आए के’ और ‘बंदिशें‘ कि चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ये कहानियाँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि लेखक ने इन्हें वर्तमान में ढाल दिया है। कविता जी को पुस्तक की कोई भी कहानी कमज़ोर नहीं लगी। शीर्ष कथा ‘पुष्प दहन’ उन्होंने ‘रौंगटे खड़े’ कर देने वाली बताया। कविता जी ने कहा कि कहानी ‘एक नोट सौ का’ ने उन्हें भी हिलाकर रख दिया।

सुश्री दिव्या माथुर ने बताया कि उस शाम वे पुस्तक कि किसी कहानी का पाठ करना चाहती थीं किन्तु समय के अभाव के कारण वे ऐसा न कर सकीं। उन्होंने कहा कि उन्हें महेंद्र जी की लगभग सभी कहानियाँ दिलचस्प और मनोरंजक लगती हैं किन्तु वह उनकी दो कहानियों 'एक नोट सौ का' और 'गुलेल' से विशेष प्रभावित रही हैं। गुलेल की सरल भाषा, शिल्प और मानवीयता ने उन्हें एक लम्बे अर्से तक जकड़े रखा। अपनी सम्मति के अतिरिक्त, उन्होंने पुस्तक के अंत में छपीं देश-विदेश से मिली संपादकों, साहित्यकारों और पाठकों की प्रतिक्रियाएं पढ़कर सुनाईं।

श्री महेंद्र दवेसर ने पाठकों को अपनी कहानियों के प्रेरक सूत्रों की जानकारी दी, अपनी याद से अपनी कहानियों के कुछ अंशों को सुनाया और फिर से याद दिलाया कि पुस्तक-विक्रय से उपलब्ध राशि "सटन" के रॉयल मार्स्डन हॉस्पिटल को दी जाने वाली है।

कार्यक्रम के अंत में श्री कैलाश बुधवार ने नेहरु-केंद्र, कार्यक्रम की भागीदार डॉक्टर कविता वाचक्नवी, श्रीमती दिव्या माथुर और सर्वोपरी उपस्थित दर्शकों का पुन: धन्यवाद किया। जलपान के दौरान बहुत से श्रोताओं ने, जिनमें शामिल थे अन्य प्रसिद्ध साहित्यकार – डॉक्टर श्याम मनोहर पाण्डे, श्रीमती उषाराजे सक्सेना, श्रीमती तोषी अमृता तथा श्रीमती शन्नो अग्रवाल, महेंद्र जी से किताबों पर हस्ताक्षर करवाए।


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