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खाड़ी क्षेत्र दूसरा हिन्दी सम्मेलन दुबई में
आयोजित
बाएँ से दाएँ - श्री अशोक कुमार सी.ई.ओ. इण्डियन हाई स्कूल, दुबई, श्री नारायण सवलानी चेयरमान, भारतीय राजदूत सी.एम. भण्डारी, उनके पीछे विभूतिनारायण राय, श्रीमती कान्ता भाटिया, पीछे अजित राय साथ में राकेश पाण्डे और कृष्णबिहारी खाड़ी क्षेत्र, दुबई में आयोजित दूसरा हिन्दी सम्मेलन भी पहले सम्मेलन की तरह ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन की विशेषता यह थी कि भारत के अलावा मॉस्को और लंदन से भी साहित्यकारों ने शामिल होकर कार्यक्रम को न केवल विस्तृत फलक दिया बल्कि हिंदी की वर्तमान स्थिति के उन रूपों पर भी प्रकाश डाला जो यूरोप एवम् विश्व के अनेक हिस्सों में आकार ले रही है। भारत से आए 'हंस' पत्रिका के सम्पादक और मुख्य अतिथि श्री राजेन्द्र यादव के अनुसार , ''जो लोग बँधुआ मज़दूरों की तरह दो-ढाई सौ साल पहले अँग्रेजों द्वारा ले जाए गए और उन जगहों पर ही बस गए, उनमें, और वे लोग जो बेहतर भविष्य के सपने अपनी योग्यता के साथ लेकर बाहर निकले, फर्क है। दूसरे देशों में बस गए भारतीय और दूसरे देशों से वापस वतन लौटने वाले भारतीयों के प्रवासी कैडर को पहचानने के बाद ही असली प्रवासी समझ में आएगा।'' उन्होंने आगे कहा कि ''साहित्य में उनकी बात प्रमुखता से उभरनी चाहिए जिन्हें सदियों से दबाया-कुचला गया है। औरत और दलित की कोई पहचान आज भी नहीं है। औरत के पास आज भी अपना घर नहीं है। औरत की अपनी कोई पहचान नहीं है। वह जिस घर में जाती है, उस घर की पहचानों से पहचानी जाती है। यह दुविधा की स्थिति है और मर्दों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से इसे न केवल बनाया है बल्कि इसपर अपना दबदबा भी कायम रखे हुए हैं। अगर घर में यह स्थिति है तो समाज की स्थिति भी इससे कुछ खास अलग नहीं है। समाज में भी स्त्री को दोयम दर्ज़ा ही मिला हुआ है। उसकी मेहनत और मेहनताने तथा आदमी की मेहनत और मेहनताने में अन्तर है। यह स्थिति भी असंतोषजनक है। दलित और अछूत की स्थिति भी त्रासद है।'' उपन्यासकार श्री विभूति नारायण राय की राय भाषा के सरलीकरण के मामले में बहुत साफ थी, ''हिन्दी भाषा को मुम्बइय्या बना देना या उसी को पूरे देश की हिन्दी समझना भारी भूल है भाषा का अपना संस्कार होता है और वह अपनी संजीवनी खुद पाती है इसमें दो राय नहीं कि फिल्मों ने हिदी को घर-घर पहुँचाया है, फिर भी हम साहित्यकारों को यह ध्यान रखना होगा कि भाषा के परिष्कार को उसके अपने स्वरूप के साथ आगे बढ़ाएँ न कि टपोरियों की भाषा को हिन्दी बना दें।'' प्रवासी संसार पत्रिका के सम्पादक श्री राकेश पाण्डे ने इसी विषय पर बोलते हुए कहा, '' भाषा को आज बाज़ार मिल गया है और वही भाषा इस माहौल में बचेगी जिसमें लचीलापन होगा।''
बोलते हुए अजित राय, बैठे हुए - अनिल जनविजय, तेजेन्द्र शर्मा, राजेन्द्र यादव, विभूतिराय, अम्बिका सिंह, राकेश पाण्डे पत्रकार और विभिन्न पत्रिकाओं में कॉलमनिस्ट श्री अजित राय ने कहा, ''दुनिया भर में हिन्दी को एक अलग किस्म का विस्तार मिल रहा है। यह विस्तार हिन्दी के लिए सुखद है हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हिन्दी की रोजी-रोटी खाने वाले ही इसके दुश्मन न बनें।''मास्को से आए कवि जनविजय ने कहा, '' भारतीय साहित्यकार भारत से बाहर जिन देशों मे रहते हैं, उन्हें वहाँ की भाषा सीखनी चाहिए लेकिन प्रायः ऐसा होता नहीं है और विदेशी साहित्य की जो मात्रा हिन्दी में उपलब्ध होनी चाहिए वह नहीं है विदेशी साहित्य की प्रचुरता हिन्दी को समृद्ध ही करेगी और तब इसी अनुपात में हिन्दी साहित्य भी विदेशों में पहुँचेगा।''लंदन से आईं श्रीमती ज़किया जुबैरी ने भारतीय राजदूत श्री सी एम भण्डारी को पहले तो इस बात के लिए धन्यवाद दिया, ''महामहिमजी, दोनों दिन पूरे समय कार्यक्रम में उपस्थित रहकर आपने ब्यूरोक्रेसी की कोई छाप नहीं दिखाई। एक सहज सामान्य साहित्य प्रेमी के रूप में इस कार्यक्रम को आयोजित करके आपने अद्भुत् लोकप्रियता पाई है।'' उन्होंने आगे कहा, ''हिन्दी और उर्दू के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। भारत के विभाजन के बाद से उर्दू ज़बान फ़ारसी और अरबी के नज़दीक होती जा रही है और हिन्दी भी आहिस्ता आहिस्ता संस्कृत बनती जा रही है। वो पुरानी गंगा-जमुनी ज़बान जो कुछ दिनों तक गंगा जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बनी हुई थी, अचानक ग़ायब होती जा रही है। दूरियाँ मिटाई जा सकती हैं, समस्याएँ सुलझाई जा सकती हैं, ज़रूरत है तो सिर्फ़ सच्चे मन से समस्या से निपटने की। अधिक से अधिक पुस्तकों का अनुवाद होना चाहिये। हमें गुटबंदियों से ऊपर उठना होगा और सच्चे मन से यह काम करना होगा।''लंदन से ही आए कथाकार एवं पुरवाई पत्रिका के संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा ने साहित्य को लेकर यह चिंता व्यक्त की कि भारत से बाहर रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को दोयम दर्जे का समझने की भूल करना या तो आलोचकों का अहम है या फिर उनका अज्ञान। प्रवासी रचनाकार का साहित्य और उसकी भाषा अपने परिवेश से प्रभावित होंगे और उसे हिन्दी का अपभ्रंश मानना बेवकूफी होगा। उन्होंने आगे कहा कि प्रवासी साहित्य की परिभाषा भी साफ़ होनी चाहिए। प्रत्येक देश में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य में उस देश के सरोकार दिखाई देना एक आवश्यक शर्त है। प्रवासी हिन्दी साहित्य को बहुत दिनों तक नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता यूरोप में, खासतौर पर लंदन में इन दिनों हिन्दी में बहुत कुछ लिखा जा रहा है उसे चिह्नित किया जाना चाहिए।'' श्री तेजेन्द्र शर्मा के गज़ल-संग्रह 'यह घर तुम्हारा है' का विमोचन भारतीय राजदूत श्री सी एम भण्डारी ने किया।कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा अभिव्यक्ति एवं अनुभूति वेब पत्रिकाओं की संपादिका पूर्णिमा वर्मन द्वारा 'इंटरनेट और हिंदी' विषय पर दिखाई की गई पावर पॉइंट प्रस्तुति। प्रतिबिंब थियेटर ग्रुप के स्थानीय कलाकारों ने प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब की नाटकीय प्रस्तुति कर श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार का दिल जीत लिया। इस प्रस्तुति के निर्देशक थे महबूब हसन रिज़वी, कलाकार थे- मुहम्मद अली, प्रकाश सोनी और इंडियन स्कूल के छात्र। भारतीय दूतावास के संरक्षण में इस हिन्दी सम्मेलन का आयोजन द इण्डियन हाई स्कूल के सीईओ श्री अशोक कुमार ने किया क़ार्यक्रम का संचालन श्रीमती कांता भाटिया और अबूधाबी स्थित कथाकार कृष्णबिहारी ने किया । |