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| 01.20.2008 |
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साहित्य प्रेमियों का रोष विषय : साहित्य कुंज से निष्कासित लेखिका - स्नेह ठाकुर |
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हिन्दी साहित्य परिषद कैनेडा
सरी,
ब्रिटिश कोलम्बिया,
कैनेडा
श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी (अध्यक्ष )
प्रिय
सुमन घई:
आपके
साहित्य कुंज अन्तरजाल में हैमिल्टन मंदिर में आयोजित कवि सम्मेलन में
घटी हृदय विदारक घटना को पढ़कर मन बहुत क्षुब्ध और दुखी हुआ।
श्याम
त्रिपाठी जी मैं तीस वर्षों से अधिक समय से जानता हूँ। कई कवि
सम्मेलनों तथा गोष्ठियों में उनके साथ काव्य पाठ किया है। इधर जब से
उन्होंने
’चेतना’
त्रैमासिकी का प्रकाशन प्रारम्भ किया है अक्सर दूर-भाष पर बातें होती
रहती हैं। वे हिन्दी भाषा और साहित्य की वृद्धी-समृद्धि में पूरी
प्रतिबद्धता तथा स्वार्थ रहित भावना से जुटे हुये हैं। श्याम जी सरल
तथा विनम्र स्वभाव के धनी हैं। वे हैमिल्टन मन्दिर में आयोजित कवि
सम्मेलन के संचालक थे। उन पर श्री सत्य ठाकुर द्वारा सांघातिक चोट
पहुँचाने का कुकृत्य निश्चय ही अमानवीयता की पराकाष्ठता है। यह सत्य है
कि बुद्धिहीनता तथा विवेक शून्यता के कारण ही व्यक्ति शारीरिक शक्ति का
दुरुपयोग करता है। जहाँ तक आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की बात है मैं
भी वहाँ भाग लेने गया था। मेरी जानकारी के अनुसार कैनेडा से किसी भी
हिन्दी साहित्यकार को अधिवेशन की ओर से सम्मानित नहीं किया गया था।
मैं
व्यक्तिगत रूप से तथा हिन्दी साहित्य परिषद की ओर से श्री सत्य ठाकुर
द्वारा श्री श्याम त्रिपाठी को शारीरिक चोट पहुँचाने के अशोभनीय एवम्
अवाँछनीय व्यवहार की कटु आलोचना करता हूँ। पूर्व अधिवेशन में कैनेडा से
श्री श्याम त्रिपाठी दिल्ली में आमंत्रित किये गए थे। मैं स्नेह
ठाकुर और उनके पतिदेव की अभद्रता के बारे में पढ़ कर इतनी आहत हुई और
एक अजीब तरह की वितृष्णा से भर उठी कि मुझसे फोन किए बिना रहा नहीं
गया। आपने इस विषय में श्रीमती ठाकुर को तुरन्त निष्कासित करने का जो
साहसिक और न्यायपूर्ण कदम उठाया,
उसकी मैं हृदय से सराहना करती हूँ। इस अशिष्ट और अभद्र दम्पति को
विरुध्द सबको एकजुट होकर उनसे कभी भी किसी तरह का संबंध न रखने का
निर्णय ले लेना चाहिए। इन दोनों के ख़िलाफ़ और कुछ पुलिस आदि की
कार्यवाही कोई करे या न करे,
किन्तु आप सब साहित्यकारों को इनका सामाजिक बहिष्कार तो कर ही देना
चाहिए - सदा के लिए। क्योकि इस तरह का दण्ड सर्वाधिक अपमानजनक और
कचोटने वाला होता है। डॉ.
दीप्ति गुप्ता (भारत)
नमस्कार सुमन जी, पूरा अंक
पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। हाँ कहीं मन
व्यथित सा ज़रूर हुआ कुछ गतिविधियों से कि क्या लोग ऐसा भी करते हैं
सबके सामने। अजीब सा तमाशा (स्नेह),
जिनको निष्कासित किया गया है। ख़ैर सब तरह के लोग
हैं...
डॉ. भावना कुँअर (यूगांडा) आदरणीय सम्पादक महोदय, २२ सितम्बर,
२००७ टोरोंटो के हिन्दी साहित्यकारों के लिये बड़ा ही
दुर्भाग्य पूर्ण दिवस कहा जायेगा। कलम के सिपाही माँ शारदा के भक्तों
के मध्य इस प्रकार की लज्जा जनक बात एवं हाथापाई होना अशोभनीय तो है ही
साथ ही साथ हिन्दी साहित्य की गरिमा को भी क्षति पहुँचाती है। हैमिल्टन
के हिन्दू मन्दिर की कार्यकारिणी पर भी आक्षेप का चिन्ह लगाती है। जहाँ
इस प्रकार की अप्रिय घटना घटित हुई और किसी कार्यकारिणी के अधिकारी ने
इस विषय में कोई उचित कदम नहीं उठाया और इस लज्जाजनक घटना से आँखें फेर
लीं। मै इस बात की निंदा करता हूँ। जो भी दोषी हो उसके साथ उचित
कार्यवाई की जानी चाहिए।
भगवत शरण श्रीवास्तव ’शरण’
साहित्य कुँज में प्रकाशित
समाचार " स्नेह ठाकुर का साहित्य कुंज से निष्कासन " स्तब्ध एवं
उद्वेलित करनेवाला है। जब कलम छोड़ कोई साहित्यकार शारीरिक बल प्रदर्शन
द्वारा अपनी बात मनवाना चाहे तो यह प्रदर्शित करता है कि अपनी कलम पर
या तो उसे भरोसा नहीं या फ़िर कलम की शक्ति में उसकी आस्था समाप्त हो
चुकी है। कवि सम्मेलन में जबरन अपने लेख के प्रस्तुतीकरण का आग्रह और
फ़िर बाद में सार्वजनिक स्थल पर अन्य साहित्यकार से स्नेह ठाकुर के पति
द्वारा हाथा - पाई शर्मनाक है । स्नेह ठाकुर से निवेदन है कि कलम की
ताकत को और शर्मसार न करें । उनका आचरण आपत्तिजनक और पूरे साहित्यकार
जगत को कठघरे में खड़ा करने वाला है |
उनके द्वारा लिखित या मौखिक किसी भी बयान का हम अब
समर्थन नही पायेंगे । हम अन्य पत्रिकां/साहित्य सेवियों से भी
अनुरोध करते हैं कि इस तरह के व्यवहार की सार्वजनिक भर्त्सना करें । हम साहित्य
कुंज पत्रिका के निर्णय का
स्वागत और समर्थन करते हैं ।
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