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09.13.2008
 

ब्राम्पटन में होली के रंग - कवि गोष्ठी


विगत वर्षों की भान्ति भी इस वर्ष भी, होली के अवसर पर टोरोंटो में बसे हिन्दी के समर्थक व हिन्दी के लोकप्रिय कवि पाराशर गौड़ जीने अपने घर ब्राम्पटन ओन्टेरियो में एक भव्य कवि गोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें टोरोंटो के लगभग सभी जाने माने कवियों ने भाग लिया। जिनमें श्री भगवत शरण श्रीवास्तव शरण’, डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव, श्री शरन घई, श्रीमती लता पाण्डे, श्रीमती भुवनेश्वरी पाण्डे, श्री संदीप त्यागी, श्री निर्मल सिद्धू, श्री मुकन्द ध्यानी व पाराशर गौड़ मुख्य थे।

 कार्यक्रम की शुरुआत भगवत शरण जी ने अपने चिरपरिचित अन्दाज़ तरन्नुम में अपनी नई कविता से की जिसमें भाव व शब्दों का समन्वय देखते बनता था। लता जी जो अपनी छोटी छोटी पर दमदार कविता के लिये जानी जाती हैं ने अपनी तीन कविताएँ जिनका सीधा सम्बन्ध जीवन, प्रकृति और मानव से जुड़ा था सुनाकर एक बार पुन: यह सिद्ध कर दिया कि वो अपनी बात को सूक्ष्म व परिधि में रख कर बड़े असर से कहने की दक्षता रखती हैं। भुवनेश्वरी जी की कविता आम आदमी से जुड़ी होती है जिनका असर सुनते समय से ही आदमी पर पड़ना शुरु हो जाता है ऐसा ही इस बार भी देखने को मिला।

 संदीप यद्यपि युवा कवि अवश्य है लेकिन उनकी कविताओं में उनकी सोच व पकड़ उनकी भाव प्रौढ़ता का अहसासा दिलाती है। वे शब्दों के धनी तो हैं ही लेकिन उनके कंठ में जो सरस्वती का वास है वो देखते ही बनता है।

 डॉ. भारतेन्दु जी की कविताएँ अपने आप में सन्देशवाहक होती हैं। अध्याiत्मकता स्वरूप उनकी कविताओं में साफ झलकता है। प्रकृति के साथ-साथ मनोविज्ञान, भक्तिभाव उनकी विशेषता है। निर्मल सिद्धू जो हर साल होली के अवसर पर बुरा ना मानो यारो की आड़ में टोरोंटो के कवियों को जो लपेटते हैं या लपेटने की जो महारत उन्हें हासिल है, उसकी दाद देनी पड़ेगी। उनकी कविता कविता का चोरएक ऐसा ही व्यंग्य या कैनेडा के कवियों पर।

 हास्य, व्यंग्य की महारत रखने वाले श्री पाराशर गौड़ ने अपनी कविता होली और मैं जिसका सीधा-सीधा अर्थ होली से तो था लेकिन उसके साथ क्या होली इस होली में, या हुआ, यह सुनकर सारा वातावरण कहकहों में डूब गया। उनकी दूसरी कविता शुरुआत हास्य से हटकर एक सशक्त प्रस्तुती थी जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा का आभास दिलाती है।

 मुकुन्द ध्यानी जी जिनकी कविताएँ सुनकर बरबस निराला, प्रसाद, पंत याद आ जाते हैं। ध्यानी जी यद्यपि बहुत कम गोष्ठियों में भाग लेते हैं , जब भी लेते हैं तो कविता का माहौल उभर का आ जाता है, “साँझ की बेला”, “बढ़ते तम के साये”, आयो मधुमास जैसी सशक्त कविताएँ सुनकर कवि व श्रोता दोनों मन्त्रमुग्ध हो गये।

    कविवर शरन घई जी जो कि संचालन का भार भी संभाल रहे थे, उन्होंने दोनों का दायित्व बड़ी खूबी  के साथ निभाया। उनकी बुलन्द आवाज और कविता कहने के अन्दाज का सब लुत्फ़ उठा रहे थे। और अन्त में हम श्रीमती सोहनी गौड़ जी को कैसे भूल सकते हैं जिनके स्वादिष्ट भोजन व ताजी-ताजी पूरियों ने उस माहौल को और भी स्मरणीय बना दिया।


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