| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 09.13.2008 |
|
महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश जी
“उत्तराखण्ड
कल्चरल एसोसिएशन”
द्वारा पाराशर गौड़ के निवास स्थान पर अभिनन्दित |
|
अप्रैल
2, 2005
-
ब्राम्पटन
(ओन्टेरियो)
,
श्री
पाराशर गौड़ जी जो कि टोरोंटो क्षेत्र के विख्यात और लोकप्रिय कवि हैं ने
अपने निवास स्थान पर एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया। इस कवि गोष्ठी पाराशर
गौड़ जी ने महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश जी को
“उत्तराखण्ड
कल्चरल एसोसिएशन”
और
टोरोंटो क्षेत्र की हिन्दी साहित्य प्रेमी जनता की ओर से एक अभिनन्दन पट्ट
भेंट किया। महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश जी को गत जनवरी में भारत के
राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे.
अब्दुल कलाम द्वारा
“पद्मभूषण
डॉ. मोटूरि सत्यानारायण सम्मान”
से
सम्मानित किया गया है। आदेश जी के कैनेडा वापिस आने पर यह पहिला कोई
साहित्यिक कार्यक्रम था। पाराशर गौड़ जोकि उत्तराखंड कल्चरल एसोसिएशन के
संस्थापक हैं,
ने
इस अवसर का सदुपयोग करते हुए महाकवि का अपने निवास स्थान पर अभिनन्दन किया।
इस अवसर पर
काव्यगोष्ठी में अधिकतर होली की रचनाएँ पढ़ी गईं।
श्री शरण घई की रचना
“भई
होली है”
ने
तो लगभग होली का हंगामा ही खड़ा कर दिया। श्री भगवत शरण जी की ताल पर पढ़ी
गई इस कविता ने भारत की गलियों में उठते होली के हुड़दंग की याद दिला दी।
अन्य होली की रचनाएँ सुनाने वाले कवि थे- महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश
जिन्हों ने अपने
“शकुन्तला”
महाकाव्य से
“फागुन
आया रे”
पढ़ी। आचार्य संदीप त्यागी
“दीप”
की
रचना
“होली
प्रेम रंग में रंग डालेंगे”
शुद्ध छन्दात्मक कविता अनुराग से ओत-प्रोत थी। भगवत शरण श्रीवास्तव जी की
रचना
“होली
में ठिठोली”
भी
बहुत सराही गयी। इसके अतिरिक्त
श्रीमती स्नेह ठाकुर,
श्री विजय विक्रान्त तथा श्री मुकुल ध्यानी और श्री श्याम त्रिपाठी जी
ने भी होली की रचनाएँ सुनाई जो कि सभी को पसन्द आयीं। आदेश जी ने
पाराशर गौड़ जी को अपना काव्य संकलन
“शरद:
शतम`”
भेंट किया।
कविताओं के दूसरे दौर
में दूसरे रंग की कविताएँ प्रस्तुत की गयीं। श्रीमती स्नेह ठाकुर ने
“सुनामी”की
प्रस्तुति की। आचार्य संदीप त्यागी
“दीप”
ने
“मन
पंछी ने कल्पना को”
का
बहुत ही भाव पूर्ण
ढंग से प्रस्तुत किया। श्रीमती लता पाण्डे की कविता सदा की तरह बहुत ही
उच्च कोटी और गहन चिन्तन से भरी
“यह
जीवन परिवर्तन”
थी। महाकवि के विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है।
उन्होंने दो और कविताएँ अपनी विभिन्न पुस्तकों में से सुनाईं। श्री विजय
विक्रान्त जी ने कवियों की दुविधा को
“मूड
पुराण”
में व्यक्त
किया और अपनी दूसरी कविता
“यह
पल भी गुज़र जायेगा”
में जीवन के यथार्थ
को
सामने रखा। भगवत शरण श्रीवास्तव
“शरण”
जी
की दूसरी रचना
“एक
दीपक”
थी
जिसका सस्वर पाठ उन्होंने अपने ओजपूर्ण
स्वर में किया। श्री पाराशर गौड़ इस अवसर पर भी अपनी कविता
“कवियों
में होड़”
द्वारा कवियों की अपनी ही रचना सुनाने की प्रतिस्पर्धा
पर
कटाक्ष करने से नहीं चूके। उनकी दूसरी कविता
“इस
बस्ती का इक-इक पत्थर”
बहुत ही मार्मिक थी। श्री मुकुल ध्यानी की रचना
“माँ
धरती का प्रांगण”
बहुत ही
सुन्दर रचना थी। यह कविता उन्होंने हाल में हुए सुनामी के प्रकोप को
“कामायनी”
के
मनु के समानन्तर रख कर की। वास्तव में ही यह कविता हर रूप से स्तरीय थी।
श्री निर्मल सिद्धू ने दो रचनायें सुनाईं पहली
“दुर्गम
पथ का राही”
थी
और दूसरी व्यंग्य कविता
“बुरा
न मनाना”
स्थानीय कवियों की रचनाधर्मिता पर कटाक्ष था जो कि उपस्थित कवियों ने हँसते
हुए स्वीकार किया। श्री सुमन कुमार घई ने भी दो कविताएँ सुनाई पहली कोमल
भाव से भरी
“ओ
हिम धीरे से गिर”
थी
और दूसरी मार्मिक भाव से भरी
“नीर-पीर”
थी।
गोष्ठी के अन्त में श्रीमती सोनी
गौड़ ने सभी उपस्थित कवियों और श्रोताओं को रात्रि-भोज के लिए आमन्त्रित
किया। सुस्वादष्टि भोजन श्रीमती सोनी गौड़ की व्यवहारिक कविता की
अभिव्यक्ति
की
तरह ही सुन्दर था। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|