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09.13.2008
 

लोकगीतों की अविस्मरणीय संध्या
श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी


हिन्दी साहित्य परिषद तथा इण्डो कैनेडियन फोक साँग ने संयुक्त रूप से हिन्दी  लोकगीत-महोत्सव कार्यक्रम वैंकुअर महानगर के शिव मंदिर में आयोजित किया।

उत्तरी अमेरिका में हिन्दी लोक गीतों के व्यापक संयोजन की शुरुआत गत वर्ष हुई थी जिसे लोगों ने मुक्त कंठ से सराहा था। उसकी सफलता से प्रोत्साहित होकरके इसको नियमित रूप से मनाने की योजना है।

लोक साहित्य वस्तुत: शिष्ट साहित्य का आधार है, उसका प्राण है। भाषाएँ मूलत: लोक बोलियों से विकसित होती हैं। हिन्दी के विस्तृत परिवार में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, पहाड़ी और हरियाणवी आदि का विशेष स्थान है।

कार्यक्रम के स्वागत भाषण में पुष्पलता शर्मा, उपाध्यक्ष हिन्दी साहित्य परिषद ने कहा - विश्व में शायद ही कोई अन्य भाषा हो जिसमें जीवन तथा प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को इतनी विशदता तथा मार्मिकता से व्याख्यायित किया गया है, जितना की हिन्दी लोक गीतों में किया गया है।

इंडो कैनेडियन फोक साँग की अध्यक्षा श्रीमती मधु वार्ष्णेय की टिप्पणी थी - ऋतुओं, संस्कारों, र्वों, व्रतों के अलावा जीवन के राग-रंगों का स्वाभाविक वर्णन हमें लोक गीतों में मिलता है।

कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी, अध्यक्ष हिन्दी परिषद ने सोत्साह किया। उनका कहना था - लोक गीतों में आत्मा की प्रतिध्वनियाँ हैं और मन की वैशाली संध्या का भावात्मक रंग विस्तार। लोक गीत हमारे हृदयों के तारों को झँकृत करते और गूँगी भावनाओं को स्वर तथा शब्द देते हैं।

कार्यक्रम के सोलह गीत और छह नृत्यों का आकर्षक समावेश था। इसमें ज्यादातर अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी के परम्परागत गीत एवम्‌ नृत्य सम्मिलित थे। सामूहिक गीतों का शानदार नेतृत्व मधु वाष्ण्è, न्ड्रतन ठाकुर, कान्ति द्विवेदी और पुष्पलता शर्मा ने किया। डॉ. समारू, डॉ. हरमेश सिदर, डैनियल राम, विमला मिश्र और अली हसन ने सोलो गीत गाकर लोगों को रसमय किया। केतकी मिश्र, शची शर्मा, एस. शंकरन और रेशमा मिश्र के लोक नृत्यों की प्रस्तुति सराहनीय थी। सामूहिक नृत्यों की अगुवाई अर्चना हरित, वर्षा चंद, मधु वार्ष्णेय, सरोज और सुनीता ने की जो चiर्चत रहे। लोगों ने लगातार तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साह वर्धन किया।

मुख्य अतिथि श्री ज़िले सिंह, डिप्टी कौंसलेट जनरल, भारतीय दूतावास, ने कार्यक्रमों के संयोजकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा, “मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हो रही है कि अब भारत में लोक गीतों की लोकप्रियता कम हो रही है जब कि यहाँ भारतवंशीय फीजी, गयाना, ट्रिनीडाड, सूरीनाम और मारिशस के लोग भारतीय प्रवासियों से मिलकर लोकगीतों, नृत्यों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

कार्यक्रम का समापन प्रार्थना और सहभोज से सम्पन्न हुआ।


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