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| 09.03.2007 |
| "हिन्दी साहित्य सभा" का दसवीं वर्षगाँठ समारोह |
१२ अगस्त, २००७- टोरोंटो,
कैनेडा –
“हिन्दी
साहित्य सभा”
का १०वीं वर्षगाँठ पर आयोजित कवि-सम्मेलन, फ़ेयरव्यू लाईब्रेरी के सभागार
में धूमधाम से मनाया गया। इस दिवस को मनाने के लिए दक्षिणी ओंटेरियो के
चर्चित कवियों को आमन्त्रित किया गया था। विशिष्ट अतिथि के रूप में भारतीय
कौंसलावास टोरोंटो के कौंसलाधीश सतीश मेहता को आमन्त्रित किया गया। कवियों
में विशेष रूप से भारत से न्यूयॉर्क के विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने
आई हुई कवयित्री श्रीमती शकुन्तला श्रीवास्तव और ओटवा से डॉ. जगमोहन हूमर
ने भाग लिया।
कार्यक्रम सतीश मेहता जी द्वारा सरस्वती दीप प्रज्जवलन से ठीक साढ़े चार बजे
आरम्भ हुआ। इस अवसर पर हिन्दी साहित्य सभा के संस्थापक सदस्यों ने सरस्वती
वन्दना का गान किया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ, भारतेन्दु श्रीवास्तव ने
की।
श्रीमती दीप्ति अचला कुमार ने कार्यक्रम को आरम्भ करते हुए श्रोताओं का
स्वागत किया और हिन्दी साहित्य सभा के अध्यक्ष डॉ. कैलाश चन्द्र भटनागर को
मंच पर आमन्त्रित किया। इस अवसर पर उन्होंने हिन्दी साहित्य सभा के गठन में
डॉ. भारतेन्दु श्रीवस्तव की भूमिका को रेखांकित किया। डॉ. कैलाश चन्द्र
भटनागर (अध्यक्ष, हिन्दी साहित्य सभा) ने सभी श्रोताओं का स्वागत किया और
१२ अगस्त को कवि-सम्मेलन होने के कारण भारत के ६०वें स्वतन्त्रता दिवस को
रेखांकित करते हुए देशभक्ति के भाव की एक कविता का पाठ किया। उन्होंने
विशिष्ट अतिथियों और अध्यक्ष को मंच पर अपने स्थान ग्रहण करने के लिए
आमन्त्रित किया।
डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव ने हिन्दी साहित्य सभा के इतिहास की चर्चा करते
हुए, बृह्त टोरोंटो की हिन्दी की गतिविधियों की चर्चा करते हुए रोचक घटना
का वर्णन किया कि सबसे पहला हिन्दी कवि सम्मेलन १९८२ में आयोजित किया गया
था तो हिन्दी के कवि ढूँढने में कठिनाई हुई थी। आज की सभा में केवल ३५
कवियों को आमन्त्रित किया गया था और उनसे केवल साढ़े तीन मिनट में अपनी रचना
समाप्त करने का अनुरोध भी किया गया था। इस अवसर पर भारतेन्दु जी ने एक
कविता का पाठ भी किया।
कवि सम्मेलन की लम्बाई को देखते हुए संचालन का दायित्व श्रीमती आशा बर्मन
और दूसरे भाग में डॉ शैलजा सक्सेना को दिया गया था।
कार्यक्रम का मुख्य भाग आरम्भ करते हुए आशा बर्मन ने कवितामय किया। श्रीमती
सुधा मिश्रा ने देशभक्ति की रचना में शहीदों को प्रणाम किया तो डॉ. ब्रजराज
किशोर कश्यप ने स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को याद किया। भगवत शरण
श्रीवास्तव ने कविता का रुख बदलते हुए अपनी रचना ’एक दीपक’
सुनाई जो कि सदा की तरह प्रभावमयी रही। श्रीमती दीप्ति अचला कुमार कि कविता
’एक नया दिन’ ने समय पर चिंतन किया। सुमन कुमार घई ने ’कविता तुम लौट आओ’
में कविता न लिख पाने की कुंठा से ग्रसित होते हुए कविता को जीवन में लौट
आने का निमन्त्रण दिया। श्रीमती राज शर्मा की कविता का शीर्षक तिरंगा था जो
कि उन्होंने सस्वर सुनाई। श्री श्याम त्रिपाठी की कविता का विषय आज़ादी के
परवाने था। श्रीमती अँशू चक्कू ने अपने हृदय की वेदना को कश्मीर घाटी की
वेदना के रूप में व्यक्त किया। श्री महेश नन्दा जो कि बज़्मे अदब (किचनर) के
सक्रिय शायर ने अपनी ग़ज़ल मज़लूम सुनाई। डॉ. शिवनन्दन सिंह यादव जी की कविता
’अर्घ्य के गीत’ सदा की तरह दर्शन से ओत-प्रोत रही। श्रीमती सरोजिनी जौहर
ने कविता में प्रश्न उठाया कि ’ऐसा क्यों होता है’ कि जो समाज द्वारा
सर्वमान्य हो वही वास्तविकता नहीं होती। श्रीमती प्रमिला भार्गव की कविता
“भारत
की प्रतिमा बनाने वाले तुम हो”
प्रवासी भारतीयों के अशिष्ट व्यवहार पर करारा व्यंग्य था। श्री राज
महेश्वरी ने प्रणय गीत सुनाया। श्री विजय विक्रान्त की कवित मानवीय मूल्यों
से सम्बन्धित थी तो श्रीमती भुवनेश्वरी पाण्डे ने सावन के दृश्यों को याद
करते हुए भारत में अपने बचपन को याद किया। राकेश तिवारी की कविता
“मुझसे
तो राष्ट्र प्रशंसा न गाई जाएगी”
बहुत पसंद की गई क्योंकि लीक से हटते हुए उन्होंने भारत की वास्तविक प्रगति
को गरीबी के मापदंड से मापा। शरण घई की कविता
“पिया
की पाती”
हास्य कविता थी। स्नेह सिंघवी ने प्रेमरस में डूबी अपनी ’अनुभूति’ सुनाई।
व्योवृद्ध श्रीमती राजकुमारी सिन्हा ने अपना गीत ’देख गगन की ओर’ का सस्वर
सुनाया। श्री जगदीश चन्द्र शारदा शास््री जी ने अनुग्रह किया
“हमें
आपका प्यार चाहिए”।
टोरोंटो के सर्वप्रथम लेखकों में से एक शैल शर्मा की कविता में एक गृहणी की
खीज थी कि उसके योगदान के मूल्य को नहीं समझा जाता। राज शर्मा ने इससे
बिल्कुल उल्टे भाव में हास्य कविता सुनाई जिसमें गृहणी को शिक्षा दी गई कि
कैसे बिना काम किये पति को व्यस्त रखो। स्नेह ठाकुर की
कविता भी देशभक्ति से संबधित थी जो कि सामान्य ही रही। डॉ.
देवेन्द्र मिश्र ने सस्वर देशप्रेम का गीत सुनाया। डॉ. रत्नाकर नराले जो कि
हिन्दू इंस्टीच्यूट ऑफ़ लर्निंग के प्राध्यापक भी हैं, बच्चों के लिए लिखी
अपनी पुस्तक में से पाँच छह बाल-कविताएँ सुनाईं और एक अपना संस्कृत में
लिखा भजन भी सुनाया।
इसके बाद श्रीमती शकुन्तला श्रीवास्तव जी को आमन्त्रित किया गया। उन्होंने
सस्वर गीत, ग़ज़ल और कविता का पाठ किया जो कि श्रोताओं द्वारा सराहा गया।
डॉ. जगदीश हूमर ने अपनी पाँच रचनाएँ सुनाकर अपने लेखन की प्रतिभा के
विस्तार से श्रोताओं को परिचित करवाया। उनका गीत
“गीत
यह निष्प्राण है”
ने श्रोताओं के हृदय को छू लिया। अगली रचना में उन्होंने हृदय विदारक एअर
इण्डिया की विमान दुर्घटना को याद करते हुए दो बच्चों को अपनी रचना में याद
किया जो कि उस विमान के यात्री थे। इस गंभीर विषय को अंत में बदलते हुए
अपने काव्य-पाठ को हास्य रस से विराम दिया।
सब्र से प्रतीक्षा करते हुए समीर लाल जी को आमन्त्रित किया गया। इस मंच पर
पहली बार उन्होंने अपनी क्षणिका और एक ग़ज़ल सुनाई। श्रोताओं ने और सुनाने
का आग्रह किया परन्तु समय ने इसकी अनुमति नहीं दी। आशा बर्मन जी कि कविता
“जीवन
की साँझ”
में रिटायर हो जाने के बाद की सुगम दिनचर्या को सराहा गया। समय की कमी को
देखते हुए डॉ. शैलजा सक्सेना ने अपनी कविता
’शरीर भी कुछ माँगता है’ के केवल दो पद ही सुनाए। सम्मेलन के अंत
में डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव की कविता थी ’अब लौट नहीं सकते घर”।
इस लम्बे कार्यक्रम का अन्त श्रीमती अरुणा भटनागर के द्वारा दिये गए
धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।
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