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09.13.2008
 

महाकाव्य महारानी दामयन्ती का लोकार्पण एवं महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश का अभिनन्दन


विमोचन - बाएँ से महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश, श्री श्याम त्रिपाठी और श्रीमती सुरेखा त्रिपाठी

 

24 सितम्बर, 2006 को कैनेडा के ओण्टेरियो प्रान्त के मारखम नगर में अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका हिन्दी चेतनाके तत्वावधान में महाकाव्य महारानी दामयन्तीका लोकार्पण एवं महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश का अभिनन्दन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। यह समारोह आमन्त्रित अतिथियों उपस्थिति में चौहान बैंक्युएट हॉल में मनाया गया।

श्रीमती नीरा घई और डॉ. सुधा ओम ढींगरा

 

अपराह्न के 2:00 बजे लोग यहाँ पर एकत्रित हुए और अल्पाहार से उनका स्वागत किया गया। कार्यक्रम को इस तरह से आयोजित किया गया था कि अतिथियों को परस्पर बातचीत के पर्याप्त समय और स्थान मिल सके। सभागार में प्रवेश करते ही आमन्त्रित अतिथियों द्वारा हस्ताक्षरित शुभ-संदेश पत्र भेंट करने के लिए हिन्दी चेतनाके चित्रकार श्री अरविंद नराले द्वारा तैलचित्र के लघु आकार की प्रति को रखा गया था। अतिथियों ने उत्साहित होकर अपने शुभ संदेश उस पर लिखे। अन्दर सभागार को दो भागों में बाँटा गया था। एक ओर हिन्दी चेतनाकी जन्म से लेकर अब तक की यात्रा की प्रदर्शनी का आयोजन था। जगह जगह पर पत्रिका के पुराने अंकों की प्रतियाँ अतिथियों को भेंट स्वरूप रखी गईं थी। लोग अल्पाहार करते हुए, चाय-कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए उसका आनन्द ले रहे थे।

कार्यक्रम से पहले बातचीत करते  हुए बाएँ से श्री श्याम त्रिपाठी (संपादक -हिन्दी चेतना), बज़्मे-अदब के अध्यक्ष श्री यश शारद, श्री सुमन कुमार घई ( सम्पादक- साहित्य कुंज.नेट), श्रीमती नीरा घई और डॉ. निर्मला आदेश।

 

लगभग 2:15 पर महाकवि आदेश जी और श्रीमती निर्मला आदेश जी के आते ही जन-समुदाय में एक प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। आदेश जी सदा ही इस क्षेत्र के हर साहित्यिक कार्यक्रम में

उपस्थित रहते हैं परन्तु पिछले कुछ महीनों से वह अपने ट्रिनीडाड के आश्रम व संयुक्त राज्य अमेरीका में थे अत: यहाँ पर उनकी कमी सभी को खलती रही थी। उनके लौटने के बाद यह पहला सार्वजनिक भेंट का यह पहला शुभावसर था। हर उपस्थित साहित्य प्रेमी उनसे मिलता और बधाई देता और आदेश जी भी स्नेहपूर्वक प्रत्येक से स्नेहपूर्वक मिलते। दूसरी ओर कैनेडा के विविध भाषीय  टी.वी. नेटवर्क के हिन्दी कार्यक्रम बधाई होकी सुश्री गीतिका आदेश जी से साक्षात्कार करने के लिए उत्सुक थीं।

सी एफ एम टी नेटवर्क के ’बधाई हो!’ की संचालिका सुश्री गीतिका

कुछ समय के लिए आदेश को अपने प्रिय श्रोताओं से अलग करके साक्षात्कार करने में वह सफल रहीं और तत्पश्चात सुश्री गीतिका ने हिन्दी चेतनाके संस्थापक व सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी व यू.एस.ए. से पधारी डॉ. सुधा ओम ढींगरा से भी हिन्दी भाषा व उत्तरी अमेरीका में हिन्दी की स्थिति के विषय में कुछ प्रश्न किए।

आदेश साक्षात्कार करते हुए सुश्री गीतिका (संचालिका - बधाई हो!)

 

 

3:00 बजे श्री शालीन त्रिपाठी ने माईक संभाला और कार्यक्रम को आरम्भ करते हुए अतिथियों का स्वागत किया। महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश जी व उनकी सहधर्मिणी डॉ. निर्मला आदेश जी को मंच पर बैठने के लिए आमन्त्रित किया। कार्यक्रम को विधिवत आरम्भ करते हुए महाकवि ने दीप प्रज्जवलित किया और श्रीमती नीलम भसीन ने कवि गजेन्द्र सोलंकी द्वारा रचित सरस्वती वंदना का मधुर गायन किया।

स्वागत- श्री शालीन त्रिपाठी और पीछे पिता श्री श्याम त्रिपाठी

श्री श्याम त्रिपाठी ने हिन्दी चेतना के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए आदेश जी के स्वागत में अवधी में रामचरितमानस की शैली में लिखी हुई अपनी रचना प्रस्तुत की और हिन्दी साहित्य सभाकी भूतपूर्व अध्यक्षा श्रीमती अरुणा भटनागर को हिन्दी चेतना के विषय में कुछ शब्द कहने के लिए आमन्त्रित किया। श्रीमती अरुणा भटनागर के वक्तव्य का विषय था - चेतना, आपकी अपनी पत्रिका। उन्होंने हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं की आवश्यकता को रेखांकित किया और सभी को आमन्त्रित किया कि वह ऐसी पत्रिकाओं के सदस्य बनें व साहित्य की उन्नति में सहयोग दें। तत्पश्चात श्री श्याम त्रिपाठी ने मंच के संचालन के लिए डॉ. शैलजा सक्सेना को आमन्त्रित किया।

श्रीमती अरुणा भटनागर और पीछे बैठे हैं प्रो. हरिशंकर आदेश और डॉ. निर्मला आदेश

डॉ. शैलजा सक्सेना न केवल हिन्दी साहित्य की विदुषी हैं अपितु उनका हिन्दी साहित्य की हर विधा के लेखन पर भी पूरा अधिकार है। ऐसे कार्यक्रम के संचालन के लिए वह ही उपयुक्त पात्र थीं। सर्वप्रथम उन्हों ने मंच को संभालते ही आदेश जी के स्वागत में अपनी एक रचना द्वारा आदेश साहित्य से श्रोताओं को परिचित करवाया।

डॉ. शैलजा सक्सेना

 

यहाँ उपजना अति कठिन है छोटी सी भी कविता

वहाँ बहा दी महाकवि ने, भाव सबल यह है सविता

शब्द शब्द मणि चुनकर लाए, अनुपम मधुमय भाव सजाए

छन्द अनेकों किए प्रयोग अलंकार समुचित संयोग

शब्दकोष ही बन बैठे हैं, अतुलित अद`भुत विस्तृत

सीखें ज्ञानवान भी हिन्दी, कर छन्दों को उद्धृत

भावों को गीतों में ढाला, मनहर रूप दीखाते

इतना लिखने पर भी, पुनरावृत्ति अधिक न लाते

 है आश्चर्य कहाँ से इतना समय कल्पना पाई

एक एक कर कई सौ पुस्तक, मेधा रचने पाई?

नमन आपके भाव शब्द को करते सभी कविजन हैं

रहें स्वस्थ प्रसन्न दीर्घ आयु, प्रार्थना यही हमारे मन है

- डॉ. शैलजा सक्सेना

शॉल भेंट करते हुए - बाएँ से श्री शालीन त्रिपाठी, श्रीमती प्रीति त्रिपाठी और आदेश जी

 

उनकी इस प्रस्तुति के बाद सभी श्रोता अपने स्थान पर सौम्यतापूर्वक विराजित होकर इस कार्यक्रम की गरिमा से परिचित हो, अगले चरण की प्रतीक्षा करने लगे। डॉ. शैलजा सक्सेना ने आदेश जी के अभिनन्दन के लिए त्रिपाठी परिवार को आमन्त्रित किया। श्री शालीन त्रिपाठी व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती प्रीति त्रिपाठी ने महाकवि का अभिनन्दन करते हुए उनको शॉल ओढ़ाया। श्री श्याम त्रिपाठी व श्रीमती सुरेखा त्रिपाठी ने आदेश जी व श्रीमती निर्मला आदेश जी को पुष्प भेंट किए। श्री अरविंद नराले, जिनकी कला हिन्दी चेतना के मुख्य पृष्ठ को आरम्भ से सुशोभित करती रही है, ने आदेश जी का अभिनन्दन के लिए एक बड़े आकार का तैल-चित्र भेंट किया। कलाकार की कला से प्रभावित होकर दर्शक वाह-वाह कर उठे और सभागार तालियों से गूँज गया।

आदेश जी को तैल-चित्र भेंट करते हुए बाएँ से - श्री अरविंद नराले, महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश और डॉ.निर्मला आदेश

 

कार्यक्रम के अगले चरण ने महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश ने अपने तीसरे महाकाव्य का लोकापर्ण करते हुए अपने बड़े भाई और कवि डॉ. विद्याशंकर अनलेश को याद किया और श्रोताओं को बताया कि उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने काव्य सृजन आरम्भ किया था। आदेश जी ने उस घटना का भी उल्लेख किया जिसने बालक हरिशंकर में कवि को जन्म दिया था। आदेश जी ने अपने चिरपरिचत ढंग से कविता में ही अपने मित्रों का धन्यवाद किया। उन्होंने न केवल महाकाव्य महारानी दमयन्ती में से कुछ अंश पढ़े बल्कि अपने अन्य काव्य-संकलनों से भी रचनाएँ सुनाईं। किचनर के क्षेत्र से पधारे बज़्मे-अदब के शायरों की उपस्थिती को रेखांकित करते हुए उन्होंने अपने उर्दू-दीवानों में से कुछ रचनाएँ भी सुनाईं।

महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश और डॉ. निर्मला आदेश

इस कार्यक्रम में पूर्वनिश्चित किया गया था कि लेखक की रचना का अभिनंदन ही वास्तव में उसका व्यक्तिगत अभिनन्दन है। इसलिए वक्ताओं को केवल आदेश साहित्य की चर्चा करने के लिए आमन्त्रण दिया गया था। प्रथम वक्ता श्री श्याम त्रिपाठी (सम्पादक, संस्थापक -हिन्दी चेतना) थे। उन्होंने महाकाव्यों की आवश्यकता पर बल दिया और श्रोताओं को अपनी विचारधारा से अवगत करवाते हुए कहा कि रचनाकार के साहित्य का उत्सव उसके जीवनकाल में मनाया जाना अधिक सार्थक होता है। परन्तु यह दुर्भाग्य है कि परिपाटी के अनुसार साहित्यकार की मृत्यु के बाद ही उसके साहित्य का सही मूल्यांकन किया जाता है। डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव ने उन दिनों और घटनाक्रम का स्मरण किया जिसमें उनका आदेश जी से प्रथम परिचय हुआ था। भारतेन्दु जी के बाद श्री जगदीश चन्द्र शारदा शास्त्री (संस्थापक -हिन्दू लर्निंग इंस्टीच्यूट) जी को आमन्त्रित किया गया। वयोवृद्ध शास्त्री जी ने आदेश जी सम्मान में लिखी एक कविता सुनाई। अमेरीका से पधारी डॉ.सुधा ओम ढींगरा (सह-सम्पादक - हिन्दी चेतना) अगली वक्ता थीं। सुधा जी का गत कुछ महीनों से ही कैनेडा के साहित्यिक वृत्त से परिचय हुआ है। उन्होंने स्वीकार किया कि वह आदेश साहित्य से पूरी तरह तो अवगत नहीं हैं परन्तु जितना उन्होंने पढ़ा है उसने उनके जीवन को बहुत प्रभावित किया है। सुधा जी ने आदेश जी की रचना मदिरालयकी चर्चा की। मदिरालय में आदेश जी ने मधुशाला से उत्पन्न हुई सामाजिक भ्रान्तिओं का खण्डन किया है। हालावाद को रोमांटिक धरातल से उतार कर वास्तिविक धरातल पर लाती हुई ये रचना एक नई सोच को जन्म देती है। सुधा जी ने अमेरीका की लेखिका डॉ. अंजना संधीर द्वारा अमेरीका की कवयित्रिओं की कविताओं के संकलन प्रवासिनी के बोल भेंट की।

श्री जगदीश चन्द्र शारदा शास्त्री

श्री सुमन कुमार घई डॉ. सुधा ओम ढींगरा

डॉ. सुधा ओम ढींगरा के वक्तव्य के पश्चात एक बार पुन: डॉ. शैलजा सक्सेना ने आदेश जी को महारानी दमयन्तीके पाठ के लिए आमन्त्रित किया। इस बार आदेश जी ने लगभग चालीस मिनट तक महारानी दमयन्ती के विभिन्न रसों को अभिव्यक्त करती हुई रचनाएँ सुनाईं।

आदेश साहित्य की चर्चा के दूसरे दौर के पहले वक्ता थे श्री सुमन कुमार घई (सम्पादक - साहित्य कुंज.नेट और हिन्दी चेतनाके सह-सम्पादक)। सुमन घई ने कविता और भारतीय संस्कृति के चोली-दामन के सम्बन्ध और महाकाव्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा, “भारतीय संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर अवसर पर गीत गाए जाते हैं - जोकि मौलिक रूप से कविता ही हैं। महाकाव्य ऐसी ही कविता की एक शृंखला होती है तो फिर उसका दीर्घ आकार देखकर हम लोग उसे पढ़ने कतराते क्यों हैं। क्यों प्राय: कह दिया जाता है कि महाकाव्य का युग तो निकल गया आदेश साहित्य की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि महाकवि के पहले दो महाकाव्यों (अनुराग और शकुन्तला) में महाकवि ने जहाँ मानवीय कोमल भावनाओं को अपने काव्य में प्रस्तुत किया है वहाँ सामाजिक या राजनैतिक कुरीतियाँ भी उसकी पैनी कलम से बच नहीं पाई हैं। इस तरह से महाकवि ने पुरातन कथाओं पर आधारित महाकाव्यों को आधुनिक युग से जोड़ दिया है।

श्री विजय विक्रान्त

 श्री विजय विक्रान्त ने महाकवि की गुरुदेव की नीति कथाएँके शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित पुस्तकों की चर्चा की। उन्होंने श्रोताओं को बताया कि आदेश जी ने भारतीय कथाओं की पृष्ठभूमि को बदल कर पाठकों के स्वदेश की पृष्ठभूमि में स्थापित किया है ताकि हिन्दी के विदेशी विद्यार्थी उन्हें सुगमता से समझ सकें और अपने जीवन में उन्हें उतार सकें। विजय विक्रान्त जी ने आदेश जी की प्रकाशित पुस्तकों की आंशिक सूची की चर्चा करते हुए उर्दू-दीवानों की चर्चा की। उन्होंने आदेश जी के शकुन्तला महाकाव्य से भी एक रचना सुनाई। अन्त में विक्रान्त जी ने कार्यक्रम की संचालिका डॉ. शैलजा सक्सेना को आदेश साहित्य पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमन्त्रित किया।

डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहा, “आदेश जी के तीनों महाकाव्यों (अनुराग, शकुन्तला और महारानी दमयन्ती) में प्रेम का एक रूप स्पष्ट उभरता है - वह है, दाम्पत्य प्रेम! और यह प्रेम पूर्ण है। इसमें प्रेम है, प्रश्न है, पति-पत्नी की आपसी ठनक है और वैमनस्य भी है। यानि की यह प्रेम काल्पनिक न होकर वास्तविक अधिक है। इस प्रेम का यह रूप छायावादी प्रेम के रहस्यमय वायवी रूप से भिन्न है, यह प्रेम स्थूल है, ठोस है और स्पष्ट है।डॉ. शैलजा सक्सेना ने अनुभव किया कि इन महाकाव्यों के गीत महाकाव्य की शास्त्रीय महानता के बीच छिपी हुई भाव की अन्त:सलिलाएँ हैं, जिनसे काव्य का कलेवर स्निग्ध हुआ है और उसे मधु-श्वास मिली है।इन में आदेश जी ने न केवल परम्परा पर प्रश्न उठाए हैं अपितु नल और दमयन्ती ने स्त्री के अस्तित्व को लेकर कुछ सार्थक प्रश्न भी उठाए हैं। आदेश जी के महाकाव्य न केवल शास्त्रीय नियमों का पालन करते हैं बल्कि उनमें आदेश के विभिन्न रूप जैसे कि कवि-रूप, ज्योतिषी-रूप और दार्शनिक-रूप भी दिखाई देता है।

 

 
 हिन्दी चेतना के आदेश विशेषांक का लोकार्पण- बाएँ से चेतना परिवार के, श्री विजय विक्रान्त, श्री सुमन कुमार घई, श्री श्याम त्रिपाठी, महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश, डॉ. निर्मला आदेश, श्रीमती सुरेखा त्रिपाठी, डॉ. सुधा ओम ढींगरा और डॉ. शैलजा सक्सेना।

 कार्यक्रम के अगले चरण में हिन्दी चेतनाके आदेश विशेषांक श्री श्याम त्रिपाठी जी ने आदेश जी को भेंट किया। इस अवसर पर हिन्दी चेतनाकी ओर से इस क्षेत्र के नि:स्वार्थ हिन्दी-कर्मियों को सम्मानित करते हुए स्मृति-चिन्ह भेंट किए गए। पत्रिका को एक प्रमुख समर्थक व प्रायोजक आई सी आई सी आई बैंक के प्रेजिडेण्ट श्री हरि पाण्डे ने श्री श्याम त्रिपाठी को बैंक की ओर से हिन्दी सेवा के लिए सम्मानित किया। सभा का समापन महाकवि आदेश द्वारा डॉ. शैलजा सक्सेना के धन्यवाद ज्ञापन के पश्चात हुआ और सभी उपस्थित जनों ने प्रीति-भोज का आनन्द लिया।


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