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| 05.31.2008 |
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“अग्नि” और “डायल मी माधव” का भव्य विमोचन व लोकार्पण |
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ब्राम्पटन,
कैनेडा की प्रसिद्ध लेखिका व समाज सेविका श्रीमती भुवनेश्वरी पाण्डे की
दो पुस्तकों
“अग्नि”(
लेख-कहानी संग्रह) और
“डायल
मी माधव”
(काव्य-संकलन)
का भव्य विमोचन कौंसल जरनल श्री सतीश चन्द मेहता के कर कमलों से
सेन्चुरी गार्डन,
ब्राम्पटन के हॉल में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर लगभग
150
से भी अधिक लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम का आरम्भ श्री जगदीश चन्द्र शास्त्री जी ने दीप प्रज्जवलित
करके किया। सरस्वती वन्दना श्रीमती रचना मेहरा ने गाई। इस वन्दना का
संगीत संयोजन श्री राज राजेन्द्र ने किया था और लिखा था स्वयं श्रीमती
भुवनेश्वरी पाण्डे ने। राग दरबारी पर आधारित इस वन्दना गायन ने
श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया और अन्त में श्री राज राजेन्द्र ने
संगीत की सूक्ष्मताओं को समझाते हुए विभिन्न रागों में जाते हुए वन्दना
का अन्त किया। तब तक टोरोंटों के भारतीय कौंसल जरनल श्री सतीश मेहता
पधार चुके थे और उन्होंने सरस्वती को माल्यार्पण की।
विमोचन के बाद श्री सतीश मेहता ने अपने वक्तव्य में हिन्दी का महत्व पर
बल दिया और हिन्दी
प्रेमियों को विश्वास दिलाया कि टोरोंटो कौंसलावास के दरवाज़े हिन्दी के
लिए सदा खुले हैं और वह स्वयं हर सम्भव ढंग से हिन्दी के प्रचार-प्रसार
के लिए तत्पर हैं। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास हमें बताता है कि
भारत ने अपनी विचारधारा के बल पर ही अन्य संस्कृतियों को जीता है और
लेखक ही विचारधारा को आगे बढ़ाता है।
श्री
जगदीश चन्द्र शास्त्री जी (संस्थापक- हिन्दू लर्निंग इन्सटिच्यूट) ने
इस बात पर बल दिया कि हिन्दी भाषियों को एक अपना संस्थान बनाना चाहिए
ताकि भविष्य में ऐसे कार्यक्रम किराये के हॉलों में न होकर
“हिन्दू
लर्निंग इन्सटिच्यूट”
के
ऑडोटोरियम में हों। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लोग
“हिन्दू
लर्निंग इन्सटिच्यूट”
के
नाम से इस भ्रम में न रहें कि यह केवल हिन्दुओं की संस्था है। उन्होंने
बताया कि इस समय भी विभिन्न वर्गों
व
वर्णों
के
लोग वहाँ पर हिन्दी के साथ साथ भारतीय संस्कृति की शिक्षा प्राप्त कर
रहे हैं।
कार्यक्रम की संचालिका डॉ.
शैलजा
सक्सेना ने श्रीमती भुवनेश्वरी पाण्डे जी को आमन्त्रित किया कि वह अपनी
पुस्तकों में कुछ पढ़ कर श्रोताओं को सुनाएँ। भुवनेश्वरी जी ने अपनी
कहानी
‘अग्नि’
का
अंश चुना।
डॉ.
शैलजा
सक्सेना ने पहले समीक्षक श्री शरण घई को आमन्त्रित करते हुए अपने
वक्तव्य में लोगों को
प्रोत्साहित किया कि हिन्दी पुस्तकें माँग कर पढ़ने की अपेक्षा खरीद कर
पढ़ें ताकि कैनेडा में हिन्दी प्रकाशन की प्रक्रिया तूल पकड़ सके।
श्री
शरण घई ने विस्तारपूर्वक दोनों पुस्तकों की समीक्षा की और दोनों
पुस्तकों में कई अंश पढ़े। अगले समीक्षक श्री राकेश तिवारी थे। राकेश जी
ने भी भुवनेश्वरी जी को बधाई दते हुए इस बात की सराहना की कि ुस्तकें
नि:शुल्क बाँटने की अपेक्षा बेची जा रही हैं। उन्होंने कहा कि इससे
भविष्य के लेखकों को अपनी पुस्तकें प्रकाशित करवाने का प्रोत्साहन
मिलेगा। उन्होंने अपनी समीक्षा में कहा कि भुवनेश्वरी जी कहानियों में
रह-रहकर प्रवासी समस्याएँ समक्ष आती हैं। नारी की पीड़ा भी उनके लेखन
का एक प्रमुख अंग है। तीसरे समीक्षक सुमन कुमार घई थे। उन्होंने कहा कि
लेखक समाज के वर्तमान की वाणी होता है और समाज की समस्याओं को समझता,
समझाता व सुलझाता है। इसलिए स्थानीय लेखन को प्रोत्साहन अत्यन्त आवश्यक
है। पुस्तकों का बेचना व खरीदना इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण
कदम
है। समय की कमी को देखते हुए उन्होंने अपनी समीक्षा को सीमित ही रखा।
उन्होंने भी कहा कि भुवनेश्वरी जी के गद्य व पद्य में प्रवासी समस्याएँ,
नारी
उत्पीड़न सामने आता है और नारी की मानसिकता नारी ही समझ सकती है। इसलिए
भुवनेश्वरी जी कई रचनाएँ बहुत सशक्त
हैं
और साहस के साथ कई कोमल समस्याओं को छिपाने की अपेक्षा स्पष्ट समाज के
सामने रख दिया है। काव्य की समीक्षा करने के स्थान पर उन्होंने
भुवनेश्वरी जी एक कविता
“सत्य
असत्य”
पढ़ना
अधिक उपयुक्त
समझा।
कार्यक्रम की अन्तिम समीक्षक स्वयं डॉ.
शैलजा
सक्सेना थीं। उन्होंने कहा कि रह-रहकर लगता है कि विभिन्न चरित्रों में
स्वयं भुवनेश्वरी जी उभर कर सामने आ जाती हैं। वह अपने आप को अपनी
नायिकाओं से अलग नहीं कर पाईं। उन्होंने कहा कि भुवनेश्वरी जी के लेखन
में कई बार गद्य और पद्य की रेखा मिट सी जाती है और लगता है कि
भुवनेश्वरी जी मूल रूप से गद्य की लेखिका हैं। उन्होंने कहा कि
भुवनेश्वरी जी के अपने अनुभव व स्मृतियाँ ही उनके लेखन का आधार है। जो
कि उन्हों ने बखूबी से प्रस्तुत किया है। भुवनेश्वरी जी के काव्य में
भक्तिभाव का भी अलग ही रूप है। इसमें प्रभु
पर
पूरी निर्भरता दीखती है। वही समस्याओं का अन्तिम समाधान है।
संध्या के दूसरे भाग में एक छोटी सी कवि गोष्ठी का आयोजन था। केवल पाँच
कवियों को काव्य पाठ के लिए आमन्त्रित किया गया। पहले कवियत्री श्रीमती
लता पाण्डे ने अपनी कविता में अपने प्रिय में कविता के गुण देखे कि वही
अनुप्रास है और अलंकार भी वही है। दूसरे कवि श्री कृष्णा त्रिपाठी ने
कविता के विभिन्न पक्षों को ही कविता का आधार बनाया। तीसरे कवि श्री
पाराशर गौड़ ने उस प्रवासी की कुंठा व्यक्त
की जो
चाह की चाह में स्वदेश तो छोड़ आया है परन्तु उसे वह नहीं मिल पाया
जिसकी उसे चाह थी। बस ज़िन्दगी से यही गिला है कि स्वदेश छोड़ के क्या
मिला है। चौथी कवियत्री श्रीमती नीरू कांगा ने भारत लौट कर ब्यासा नदी
(कुल्लू-मनाली) में अपने चेहरा - मूल अस्तित्व का साक्षात्कार करने की
भावना को प्रकट किया। अन्तिम कवि श्री निर्मल सिद्धू ने अपनी कविता में
स्वाधीनता के पचास साल के बाद भी आर्थिक तंगी के कारण कृषक की
आत्महत्या की पीड़ा को समझा और बहुत ही भावनापूर्वक अभिव्यक्ति
में
व्यक्त
किया।
संध्या के अन्तिम भाग में पाण्डे दम्पती श्री अटल व श्रीमती भुवनेश्वरी
पाण्डे ने सभी उपस्थित लोगों का धन्यवाद किया,
समीक्षकों व सहायकों को फूल भेंट किये। इस अवसर पर इस क्षेत्र के
विभिन्न रेडियो प्रोग्राम वाले और समाचारपत्र वाले प्रस्तुत थे।
“हिन्दी
टाइम्स”
ने इस
कार्यक्रम को सफल बनाने में विशेष भूमिका निभाई। इस स्मरणीय संध्या का
अन्त प्रीति भोज से हुआ। |
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