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05.31.2008
 

अभ्युदय विमोचन संध्या और कवि सम्मेलन


 

डॉ. कैलाश चन्द्र भटनागर महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश का स्वागत करते हुए, मध्य में है श्री श्याम त्रिपाठी श्री कृष्ण खेतरपाल (उप-कौंसल, भारतीय कौंसलावास  टोरोंटो) दीप प्रज्जवलित करते हुए

बाँयें से दाँयें-डॉ.भारतेन्दु श्रीवास्तव, महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश, श्री भगवत शरण श्रीवास्तव – विमोचन

 

मई, 2004 मिसीसागा - मिसीसागा व टोरोंटो क्षेत्र की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती सरोज भटनागर के काव्य संकलन अभ्युदय का विमोचन एक भव्य समारोह में हुआ। इस समारोह में आमन्त्रित अतिथियों में दक्षिणी ओन्टेरियो के कई उच्च कोटि के कवि, साहित्यकार, सम्वाददाता उपस्थित थे।

 मुख्य अतिथि श्री कृष्ण खेतरपाल (उप कौंसल जरनल, टोरोंटो) थे। समागम की अध्यक्षता महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश ने की और सह-अध्यक्ष के रूप में डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव थे। इस समारोह का कुशल संचालन श्री श्याम त्रिपाठी (सम्पादक व प्रकाशक हिन्दी चेतना) और कवि श्री भगवत शरण श्रीवास्तव (कैम्ब्रिज, ओन्टेरियो) ने किया।

विमोचन के कार्यक्रम को आरम्भ करते हुए, उपस्थित अतिथियों का स्वागत श्री राजीव भटनागर, श्रीमती सारिका भटनागर और डॉ. कैलाश चन्द्र भटनागर ने किया। मुख्य अतिथि श्री कृष्ण खेतरपाल जी ने दीप प्रज्वलित किया और श्रीमती भुवनेश्वरी पांडे के मधुर स्वर में सरस्वती वन्दना हुई। माँ शारदा को माल्यार्पण श्रीमती राज भटनागर ने की और तत्पश्चात पुष्पांजलि श्री सुमन कुमार घई (सम्पादक साहित्य कुंज)  और श्री जसवंत सिंह धांजल (ए टी एन, टी.वी) ने समर्पित की और मुख्य कार्यक्रम आरम्भ हुआ।

महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश जी ने कवितामय अध्यक्षीय वक्तव्य में अवसर की महत्ता व कवयित्री श्रीमती सरोज भटनागर के प्रति अपनी भावनायें प्रकट कीं। उन्होंने अपने काव्य संकलन शरद शतम्‌’ से काव्य-पाठ भी किया। इसके पश्चात उन्होंने काव्य-संकलन अभ्युदय का विमोचन किया।

डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव ने अभ्युदय की समीक्षा करते हुए काव्य की सरलता में व्यक्त किये गए गहन विचारों की प्रशंसा की और बद्री विशालएँ की चर्चा की। डॉ. शैलजा सक्सेना ने विधिवत पुस्तक की समीक्षा की और लेखिका के लेखन की प्रतिभा की चर्चा की। उन्होंने संकलन की कई कविताओं के सन्दर्भ में अपनी समीक्षा को प्रस्तुत किया।

अगले चरण में श्रीमती सरोज भटनागर ने उपस्थित विद्वानों का स्वागत और न्यवाद किया और उन्होंने विशेषकर अपने पति ड. कैलाश चन्द्र भटनागर का धनयवाद किया जिनके प्रोत्साहन से वह काव्य रचनाओं को इस पुस्तक का रूप दे पायीं। उन्होंने संकलन से कुछ कविताएँ व क्षणिकाएँ सुनाईं। कविताओं में से उन्होंने चट्टान का फूल का चयन किया जोकि एक बहुचर्चित कविता रह चुकी है।

उप-कौंसल (भारतीय कौंसलावास, टोरोंटो) श्री कृष्ण खेतरपाल ने कौंसलावास द्वारा हिन्दी प्रोत्साहन के लिए किए जाने वाले यत्नों की चर्चा की। उन्होंने यह विचार भी प्रकट किया कि अगर सभी हिन्दी की संस्थाएँ एक छत्र के नीचे एकत्रित हो सकें तो कौंसलावास ऐसी संस्था की बहुत सहायता कर सकता है।

इसके बाद संध्या का दूसरा भाग आरम्भ हुआ जो कि कवि सम्मेलन था।  इसका कुशल संचालन श्री श्याम त्रिपाठी (सम्पादक एवं प्रकाशक हिन्दी चेतना) और श्री भगवत शरण श्रीवास्तव कर रहे थे। डॉ. देवेन्द्र मिश्र (अध्यक्ष, हिन्दी साहित्य सभा) ने अपनी शुभकानाएँ प्रस्तुत करने के पश्चात काव्यपाठ किया।  श्रीमती अरुणा भटनागर (भूतपूर्व अध्यक्ष, हिन्दी साहित्य सभा) ने भी अपनी शुभकामनायें दीं। श्रीमती स्नेह ठाकुर ( सम्पादक व प्रकाशक, वसुधा) ने अभ्युदय के विषय पर कविता पाठ में शुभकामना दी और नैवेद्य का दीप गीत सुनाया। सरन घई (सम्पादक व प्रकाशक, नमस्ते कैनेडा समाचार पत्र) ने भी अपनी शुभकामनाएँ दी और कविता पाठ किया।  इसके पश्चात सुमन कुमार घई (सम्पादक अन्तरजाल पत्रिका - साहित्य कुंज, सह-सम्पादक, हिन्दी चेतना) ने शुभकामना देते हुए अभ्युदय को टाईप करते हुए काव्य के रस में डूब जाने को फिर से स्मरण किया और अपनी कविता मुखरित मूक आभास का पठन किया। श्री भगवत शरण श्रीवास्तव और श्री श्याम त्रिपाठी (सम्पादक व प्रकाशक हिन्दी चेतना) ने भी शुभकामनायें दीं और काव्य पाठ किया। अन्य काव्य पाठ करने वालों  में थे सर्वश्री सुरेन्द्र पाठक, जगदीश चन्द्र शारदा शास्त्री, डॉ. ब्रजराज किशोर कश्यप, आचार्य संदीप कुमार त्यागी, विजय विक्रान्त, राज महेश्वरी और कवयित्रियाँ थीं सर्वश्रीमती डॉ. शैलजा सक्सेना, भुवनेश्वरी पाण्डे, इन्द्रा वर्मा, प्रमिला भार्गव और राज कश्यप। इन सब में से डॉ. शैलजा सक्सेना की कविता माँ बेटी हूँ बहुचर्चित हुई और सराहाई गयी।

श्री सुमन कुमार घई और श्रीमती सरोज भटनागर

संध्या के अन्तिम भाग में डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव ने अपनी रचनाएँ प्रणय रूप और सुरभित कण सुनाई। महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश ने अपने महाकाव्य अनुराग से काव्य पाठ किया। अन्त में महाकवि ने लेखकों को प्रोत्साहन देते हुए रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशन का महत्व समझाते हुए कहा कि ऐसा करने से रचनाओं का पंजीकरण हो जाता है और यह ऐतिहासिक कार्य भी है क्योंकि पुस्तक के रूप में प्रकाशित रचनाएँ सदैव जीवित रहती हैं।

अन्त में विनम्रता की मूर्ति डॉ. कैलाश चन्द्र भटनागर जो कि इस पुस्तक के प्रकाशन का मुख्य स्तम्भ थे, ने सभी उपस्थित अतिथियों  का धन्यवाद किया। विशिष्ठ अतिथियों को श्रीमती सारिका भटनागर द्वारा फूल व अन्य भेंटें दी गयीं। श्री सुमन कुमार घई को अभ्युदय को पुस्तक का रूप देने में दिये सहयोग के उपलक्ष्य में एक स्मरण फलक भेंट किया गया। तत्पश्चात भोजन के लिए आमन्त्रण दिया गया। सहभोज के साथ ही यह महत्वपूर्ण संध्या समाप्त हुई।


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