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12.25.2007
 

हँस-हँस गाने गाएँ हम !
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

महान् ध्रुव
डॉ. महेन्द्र भटनागर

सुनीति और सुरुचि थीं
राजा उत्तानपाद की दो रानी,
थी प्रिय अधिक सुरुचि राजा को
इससे वह करती रहती थी मनमानी।

ध्रुव की माँ थीं सुनीति
और सुरुचि-पुत्र थे उत्तम,
दोनों शिशु खेला करते
थे राजा को प्रिय-सम !

एक दिवस शिशु उत्तम को
गोद लिए खेलाते थे राजा,
और अचानक तभी वहाँ आये ध्रुव
देख, लगे चढ़ने अंक पिता के
उत्तम बोले-
‘आ जा !’
पर, रानी सुरुचि वहीं बैठी थीं,
जिनके भय से
ले न सके वे ध्रुव को
गोद सदय से !

सत-पुत्र ध्रुव से
ईर्ष्या से बोली गर्वीली रानी-
‘हे ध्रुव !
तुमने इतनी-सी बात न जानी
हो तुम राजा के पुत्र सही
पर, हो न योग्य राज्यासन के
यदि पाना हो राजा की गोद तुम्हें,
तो जन्मो फिर से मेरे कोखासन से।’

खा चोट हृदय पर
रानी के कटु वचनों की,
बालक ध्रुव
तत्काल लगे रोने
सासें भर-भर !

राजा मौन रहे
मानों ध्रुव हो पुत्र न उनका,
इतने अधिक सुरुचि के थे वश में
इतना अधिक उन्हें था उनका डर।

आहत ध्रुव रोते-रोते
अपनी माँ के पास गये फिर,
         माँ ने बेटे को
         दुलराया, सहलाया,
         रोने का पूछा कारण,
         पर, ध्रुव ने नहीं कुछ बताया
केवल रोते रहे
झुकाए सिर !
       इस पर
           समझायी सारी बात दासियों ने,
सुन
ध्रुव-माँ भी धीरज छोड़ लगी रोने !
फिर दुख से बोली-

‘बेटा !
यह दुर्भाग्य हमारा है,
होनहार के आगे
अरे, न चलता कोई चारा है !
पर, तुम हिम्मत मत हारो,
कुछ ऐसी युक्ति विचारों
जिससे पाओ ऊँचा पद
अचल-अटल
ऐसा कि जहाँ से
हिला-हटा न तनिक भी पाये
देव दनुज मानव बल।’

फिर माँ ने ध्रुव को युक्ति बतायी
‘बेटा ! मेरे मत में
सब से ऊँचा-सत्य जगत में।
जिसने सत को पाया
उसका ही यश
सब लोकों ने गाया!
तुम भी सत्य उपासक बन
पा सकते हो वह पद
जिसके आगे तुच्छ
महत् राज्यासन!'

सुन चल पड़े तभी बालक ध्रुव
करने पूरी माँ की बात,
भाग्य बदलने अपना
मधुवन में किया उन्होंने
तप दिन-रात

पाना सत्य-
यही थी बस एक लगन,
सदा इसी में
डूबा रहता उनका मन !
सत्य ज्ञान की ज्योति जगाना,
अज्ञान-तिमिर को दूर भगाना।
बना हुआ था लक्ष्य यही,
पाना था उनको तथ्य यही।
पढ़-लिख कर,
गुरुओं से सुनकर,
औ‘ जीवन में अनुभव कर
बुद्धि परिश्रम से
जिसको पाकर छोड़ा,
ध्रुव ने बचपन से ही
जीवन की सुख सुविधाओं से
मुँह मोड़ा !

तभी जगत में
ध्रुव का नाम हुआ,
ज्ञान-ज्योति से ज्योतित
उनका धाम हुआ,
ज्ञानी बनकर दुर्लभ पद पाया
जो जग म ध्रुवपद कहलाया !

पूर्ण ज्ञान पाकर
ध्रुव लौटे अपने घर !
राजा ने पहचानी अपनी भूल बड़ी,
आशीष-स्नेह देने
सुनीति-सुरुचि खड़ीं,
स्वागत करने जनता उमड़ पड़ी !
देख प्रजा का प्रेम तोष,
उत्तानपाद ने ध्रुव को
सौप दिया साम्राज्य कोष।

पर, ध्रुव
कोरे ज्ञानी बनकर नहीं रहे
जनहित अगणित काम किये
औ कष्ट सहे।
माँ की आज्ञा से
आदर्श गृहस्थ बने।
जन-पीड़क यक्षों को
दंडित करने
भीषण युद्ध किये।
विजयी
जन-प्रिय ध्रुव ने
वर्षों तक राज्य किया,
जग से जो कुछ पाया
वह सब जगे हित
कर दान दिया!

माना
नहीं आज हैं ध्रुव-ज्ञानी,
पर है
उनके यश की शेष कहानी
जिसको
घर-घर में कहती
माँ या नानी !
उत्तर नभ में
जो सबसे चमकीला स्थिर
तारा है,
लगता जो हम सबको
बेहद प्यारा है-
वह
द्‌भुत बाल-तपस्वी
ध्रुव का घर है !
वह
जन-रंजक सम्राट
तरुण-ध्रुव का घर है !
वह अनुपम ज्ञानी और विरागी
ध्रुव का घर है !


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