| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 12.25.2007 |
|
हँस-हँस गाने गाएँ हम ! |
|
जागो डॉ. महेन्द्र भटनागर |
|
चहक रहीं है चिड़ियाँ चीं-चीं
तुमने अब क्यों आँखें मीचीं ? हुआ सबेरा जागो भैया जागा तोता, जागी गैया ! यदि जल्दी उठ जाओगे, तो खूब मिठाई पाओगे ! अम्मा ने चाय बनायी है, मीठा हलुआ भी लायी है ! खाना है तो बिस्तर छोड़ो, फौरन मुँह को धोने दौड़ो ! |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|