अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
12.25.2007
 

हँस-हँस गाने गाएँ हम !
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

हमारा देश
डॉ. महेन्द्र भटनागर

आज हमारा देश नया है !
ये खेत हज़ारों मीलों तक
फैले हैं कितने हर-हरे,
गेहूँ-मक्का-दाल-चने-जौ
चावल से सारे भरे - भरे !
धरती-माँ का वेश नया है !
आज हमारा देश नया है !

इसमें चिड़ियाँ नीली-पीली
सित-लाल-गुलाबी गाती हैं,
ऊषा अपने गालों पर प्रति-
दिन नूतन रंग सजाती है !
बुरा अँधेरा बीत गया है !
आज हमारा देश नया है !

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें