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12.25.2007
 

हँस-हँस गाने गाएँ हम !
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

चाँद
डॉ. महेन्द्र भटनागर

चाँद आसमान में निकल रहा,
श्याम रूप रात का बदल रहा !

मुँह पुनीत प्यार से भरा हुआ,
मन सरल दुलार से भरा हुआ,

आ रहा किसी सुदेश से अभी,
मंद - मंद मुसकरा रहा तभी !

साथ रोशनी नयी लिए हुए,
वेश मौन साधु-सा किए हुए ;

नींद का सदेश भेजता हुआ ,
स्वप्न भूमि पर बिखेरता हुआ,

दूर के पहाड़ से सरक-सरक,
झूल पेड़-पेड़ में, झलक-झलक,

और है न ध्यान, खेल में मगन,
सिर्फ़ एक दौड़ की लगी लगन !

आसमान चढ़ रहा बिना रुके,
ढाल औ‘ चढ़ाव पर बिना झुके !

चाँद का बड़ा दुरूह काज है,
व्योम का तभी न चाँद ताज है !

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