अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.07.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

 तारक
डॉ. महेन्द्र भटनागर


झिलमिल-झिलमिल होते तारक !
टिम-टिम कर जलते थिरक-थिरक !

कुछ आपस में, कुछ पृथक-पृथक,
बिन मंद हुए, हँस-हँस, अपलक,

कुछ टूटे-पर, उत्सर्गजनक
नश्वर और अनश्वर दीपक।

बिन लुप्त हुए नव-ऊषा तक
रजनी के सहचर, चिर-सेवक !

देखा करते जिसको इकटक,
छिपते दिखलाकर तीव्र चमक !

जग को दे जाते चरणोदक
इठला-इठला, क्षण छलक-छलक !

झिलमिल-झिलमिल होते तारक !


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें