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01.24.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

शीताभ
डॉ. महेन्द्र भटनागर


ये हिम बरसाने वाले हैं, ये अग्नि नहीं बरसाएँगे !

जब पीड़ित व्याकुल मानवता, दुख-ज्वालाओं से झुलसायी,
बंदी जीवन में जड़ता है ; जिसने अपनी ज्योति गँवायी,

जब शोषण की आँधी ने आ मानव को अंधा कर डाला,
क्रूर नियति की भृकुटि तनी है, आज पड़ा खेतों में पाला,

त्राहि-त्राहि का आज मरण का जब सुन पडता है स्वर भीषण,
चारों ओर मचा कोलाहल, है बुझता दीप, जटिल जीवन,

जब जग में आग धधकती है, लपटों से दुनिया जलती है,
अत्याचारों से पीड़ित जब भू-माता आज मचलती है,

ये दुःख मिटाने वाले हैं; जग को शीतल कर जाएँगे !
ये हिम बरसाने वाले हैं, ये अग्नि नहीं बरसाएँगे !


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