अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.24.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

प्रिय तारक
डॉ. महेन्द्र भटनागर


यदि मुक्त गगन में ये अगणित
तारे आज न जलते होते !

कैसे दुखिया की निशि कटती !
जो तारे ही तो गिन-गिन कर,
मौन बिता, अगणित कल्प प्रहर,
करती हलका जीवन का दुख।
            कुछ क्षण को अश्रु उदासी के
            इन तारे गिनने में खोते !
            यदि मुक्त गगन में ये अगणित
            तारे आज न जलते होते !

फिर प्रियतम से संकोच भरे
कैसे प्रिय सरिता के तट पर,
गोदी के झूले में हिल कर,
कहती, ’कितने सुन्दर तारक !
            आओ, तारे बन जाएँ हम।‘
            आपस में कह-कह कर सोते !
            यदि मुक्त गगन में ये अगणित
            तारे आज न जलते होते !


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें