अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.07.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

नश्वर तारक
डॉ. महेन्द्र भटनागर


इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !

जीवन की क्षणभंगुरता को
इनने भी जाना पहचाना,
बारी-बारी से मिटना, पर
अगले क्षण ही जीवन पाना,
आत्मा अमर रही, पर रूप न शाश्वत; यह मंत्र महान छिपा !
इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !

जलते जाएंगे हँसमुख जब-
तक शेष चमक, साँसें-धड़कन,
कर्तव्य-विमुख जाना है कब,
चाहे घेरें जग-आकर्षण ?
इस संयम के पीछे बोलो, कितना ऊँचा बलिदान छिपा !
इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !

हथकड़ियों में बंदी मानव-
सम विचलित हो पाये ये कब ?
अधिकार नहीं-इनका पग भर
भी बढ़ना है हाय, असम्भव !
चंचलता रह जाती केवल दृढ़ तूफ़ानी अरमान छिपा !
इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें