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01.24.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

मेघकाल में
डॉ. महेन्द्र भटनागर


बादलों में छिप गये सब दृष्टि सीमा तक सितारे !

आज उमड़ी हैं घटाएँ,
चल रहीं निर्भय हवाएँ,
दे रहीं जीवन दुआएँ,

उड़ रहे रज-कण गगन में,
घोर गर्जन आज घन में,
दामिनी की चमक क्षण में,

जब प्रकृति का रूप ऐसा हो गये ये दूर-न्यारे !
बादलों में छिप गये सब दृष्टि सीमा तक सितारे !

जब बरसते मेघ काले,
और ओले नाश वाले
भर गये लघु-गहन नाले,

विश्व का अंतर दहलता,
मुक्त होने को मचलता,
शीत में, पर, मौन गलता,

हट गये ये उस जगह से, हो गये बिलकुल किनारे !
बादलों में छिप गये सब दृष्टि सीमा तक सितारे !


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