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01.07.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

जलते रहो
डॉ. महेन्द्र भटनागर


 जलते रहो, जलते रहो !

चाहे पवन धीरे चले,
चाहे पवन जल्दी चले,
आँधी चले, झंझा मिले,
तूफ़ान के धक्के मिल,

तिल भर जगह से बिन हिले
जलते रहो, जलते रहो !

या शीत हो, कुहरा पड़े,
गरमी पड़े, लूएँ चलें,
बरसात की बौछार हो,
ओले, बरफ ढक लें तुम्हें,

आकाश से पर बिन मिटे
जलते रहो, जलते रहो !

चाहे प्रलय के राग में
जीवन-मरण का गान हो,
दुनिया हिले, धरती फटे
सागर प्रबलतम साँस ले,

पिघले बिना सब देखकर
जलते रहो, जलते रहो !


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