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01.24.2008
तारों के गीत
कवि : डॉ. महेन्द्र भटनागर

जगते तारे
डॉ. महेन्द्र भटनागर


अर्द्ध निशा में जगते तारे !
जब सो जाते दुनिया वासी; जन-जन, तरु, पशु, पंछी सारे !
                         अर्द्ध निशा में जगते तारे !

ये प्रहरी बन जगते रहते,
आपस में मौन कथा कहते,
ना पल भर भी अलसाये रे, चमके बनकर तीव्र सितारे !
                        अर्द्ध निशा में जगत तारे !

झींगुर के झन-झन के स्वर भी,
दुखिया के क्रन्दन के स्वर भी,
लय हो जाते मुक्त-पवन में चंचल तारों के आ द्वारे !
                     अर्द्ध निशा में जगते तारे !

निद्रा लेकर अपनी सेना,
कहती, ’प्रियवर झपकी लेना‘
हर लूँ फिर मैं वैभव, पर, ये कब शब्द-प्रलोभन से हारे !
                        अर्द्ध निशा में जगते तारे !

जलते निशि भर बिन मंद हुए,
कब नेत्र-पटल भी बंद हुए,
जीवन के सपनों से वंचित ये सुख-दुख से पृथक बिचारे !
                         अर्द्ध निशा में जगते तारे !


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