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05.07.2008

 
सुराही  
प्राण शर्मा  

पुरोवाक्‌ - सुराही

कवि प्राण शर्मा हिंदी गीत एवं गज़ल के भारतेतेर हस्ताक्षरों में अग्रणी कहे जाएँगे क्योंकि वर्षों से वे भारत से बाहर हैं और लंदन में बस गये हैं। १९६४-६५ में जब वे अभी भारत में थे और हिंदी प्राध्यापक थे, उनके गीतों और गज़लों की धूम थी। हम लोग साथ साथ विश्वविद्यालय में पढ़ते थे और हर नये लेखन के प्रति हम लोगों में एक ज़बर्दस्त आकर्षण था। फलतः विश्वविद्यालय के अध्ययन के दौरान हम लोगों के बीच अवधि बहसें जारी रहती थीं। उन दिनों प्राण शर्मा हिंदी फिल्मी गीतों के जरिए कुछ कर गुजरने की महत्वाकांक्षा पाले हुए थे। मित्रमंडली में अधिकांश लोग नये साहित्य के रसिक थे और शास्त्रीय लेखन के आलोचक थे। परन्तु प्राण शर्मा की छन्दोबद्ध रचनाएँ हमारे बीच वैसे ही प्रतिष्ठित थीं जैसा नया साहित्य था। इसका मुख्य कारण यह था कि प्राण शर्मा शास्त्रीय प्रणाली में आधुनिक जीवन की वस्तुरूपात्परिता बनाए रखने में सफल थे। कुछ दिनों बाद प्राण शर्मा फिल्मों की ओर मुड़ गये और बाद में लंदन। और अब लंदन से उनकी सुराही पढ़ने को मिली है।

प्राण शर्मा बहुत पहले से शब्दों के विलक्षण प्रयोगकर्ता रहे हैं। उन्होंने अपने लम्बे काव्य का नाम सुराही रखा है। सुराही अर्थात मिट्टी का एक पात्र परन्तु सुरा अलग अलग पढ़ा जाय तो अर्थ होगा मदिरा मात्र परन्तु आप सु को राही के साथ मिला कर पढ़ेंगे और एक सर्वगुण सम्पन्न राही अर्थात राहगीर अर्थात एक ऐसा सतत रास्ते चलने वाले का बिंब बनता है जो मानवीय मूल्यों का समर्थक हो। आप सुराही को उल्टा पढ़ें, ऊपर नीचे शब्दों के संयोजन में पढ़ें तो आपको नई नई प्रतीतियाँ होंगी। प्राण शर्मा का लक्ष्य कविता की व्यञ्जना को और अधिक प्राणवान और सघन बनाना है जो आजकल दुष्कर सा कार्य है। एक दायित्वपूर्ण कवि कर्म की तरह प्राण शर्मा अपने प्रयोजन को सीधे सीधे किन्तु कवि के मिज़ाज की तरह पहुँचाना चाहते हैं। इसीलिए सुराही में उन्होंने अपने प्रिय, पुराने प्रचलित शिल्प को ही स्वीकार किया है। रुबाईयाँ और कतआ लिखने में उन्हें अपने आरम्भिक दिनों में जो महारत हासिल थे उसे उन्होंने और ज्याद सरल, सहज बनाया है। कविता लिखना, खासकर इस दौर में कवि यशप्रार्थी कवियों की होड़ देखकर कहा ही जा सकता है कि एक आसान सा कार्य है जिसे आसानी से कह सकते हैं कि यह अपना, निजी प्रामाणिक अनुभव है और अभिव्यक्ति की निजता से जन्मा है। परन्तु प्राण शर्मा ने सहज, एकदम अकृत्रिम नैसर्गिक रूप से सरल शब्दों, विन्यास का प्रयोग किया है। एक आम समझ में आने वाली भाषा में असाधारण लिखना सचमुच असंभव सा काम है। प्राण शर्मा की यह लंबी कविता इस एक अद्‌भुत गुण से सम्पन्न है। जहाँ तक कविता के अन्य गुण धर्मों का प्रश्न है, वह तो काव्य रसिकों, सदक्यों एवं समालोचकों की दुनिया की चीज़ है। इतना अवश्य है कि इस लम्बी कविता को पहले पढ़ने पर मैंने भी प्राण शर्मा को सुझाव दिया था कि वे इसमें पर्याप्त संशोधन करेंगे। इस खतरे से भी बचेंगे कि लोग उन्हें सुरा पर लिखे विश्व प्रसिद्ध काव्य से न जोड़ लें और प्रयोगकर्ता की जगह अनुकर्ता न मान लें। प्राण शर्मा से एक शाम कैवेन्टरी के उनके घर में ही इस कविता को लेकर लम्बी बहस हुई थी। मुझे याद है प्राण शर्मा की अपने डिफ़ेंस की तकरीर बहुत ही तर्कपूर्ण थी। मुझे स्वीकार करना पड़ा कि प्राण शर्मा ने अपने मौलिक भावबोध की अनुप्रेरणा से ही ऐसा काम किया है।

सुराही, सुर प्रदेश के आही जनों के भव्य आयोजनों के लिए के आदि सूक्त की तरह है। कविता के नये प्रयोगों के रूप में यह काव्य पिछले अनेक प्रयोगों से भिन्न है। मेरा विश्वास है काव्य-रसिकों को यह धीरे-धीरे अपने प्रबल आकर्षण में बाँधेगा और इसके विभिन्न अर्थ काव्य रसिकों के बीच समाहृत होंगे।

गंगाप्रसाद विमल
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