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02.06.2009
सुराही
प्राण शर्मा
180 - 199

सुराही
प्राण शर्मा


 १८०
मैं रहूँ चल कर जहाँ मधु धाम हो
पास उनके जिनको मधु से काम हो
ज़िंदगी में एक इच्छा है यही
हर समय मुँह पर लगा बस जाम हो
१८
मधु बुरी उपदेश में गाते हैं सब
मैं कहूँ छुप-छुप के पी आते हैं सब
पी के देखी मधु कभी पहले न हो
खामियाँ कैसे बता पाते हैं सब
१८२
देवता था वो कोई मेरे जनाब
या वो कोई आदमी था लाजवाब
इक अनोखी चीज़ थी उसने रची
नाम जिसको लोग देते हैं शराब
१८३
जब चखोगे दोस्त तुम थोड़ी शराब
झूम जाओगे घटाओं से से जनाब
तुम पुकार उट्ठोगे मय की मस्ती में
साकिया, लाता--पिलाता जा शराब
१८४
पीजिये मुख बाधकों से मोड़ कर
और उपदेशक से नाता तोड़ कर
ज़िंदगी वरदान सी बन जाएगी
पीजिये साक़ी से नाता जोड़ कर
१८५
खोल कर आँखें चलो मेरे जनाब
आज कल लोगों ने पहने है नकाब
होश में रहना बड़ा है लाजमी
दोस्तों, थोड़ी पियो या बेहिसाब
१८६
बेतुका हर गीत गाना छोड़ दो
शोर लोगों में मचाना छोड़ दो
गालियाँ देने से अच्छा है यही
सोम रस पीना- पिलाना छोड़ दो
१८७
मन में हल्की- हल्की मस्ती छा गयी
और मदिरा पीने को तरसा गयी
तू सुराही पर सुराही दे लुटा
आज कुछ ऐसी ही जी में आ गयी
१८८
मधु बिना कैसी अरस है ज़िंदगी
मधु बिना इसमें नहीं कुछ दिलकशी
छोड़ दूँ मधु, मैं नहीं बिल्कुल नहीं
बात उपदेशक से मैंने यह कही
१८९
जाने क्या जादू भरा है हाला में
कैसा आकर्षण सा है मधुबाला
अपने मानस की व्यथाएँ भूल कर
मैं जो बैठा रहता हूँ मधुशाला में
१९०
ओस भीगी सुबह सी धोई हुई
सौम्य बच्चे की तरह सोयी हुई
लग रही है कितनी सुंदर आज मधु
मद्यपों की याद में खोयी हुई
१९१
साकिया, मुझ को पिला दे तू सुरा
मधु कलश मेरी नज़र से मत चुरा
बिन पिए दर से नहीं मैं
तू ढिठाई को मेरी कह ले बुरा
१९२
तू पिलादे आज इस मस्ताने को
ला, थमा दे जाम इस दीवाने को
जिस घड़ी तूने पिलानी छोड़ दी
आग लग जायेगी इस मयखाने को
१९३
ठण्ड लगने का न कोई डर रहे
तन- बदन में शक्ति सी अक्सर रहे
सोने से पहले मैं पीता हूँ शराब
ताकि ठंडी में गरम बिस्तर रहे
१९४
साकिया, मुझसे बता क्या रोष है
जो पिलाता तू नहीं क्या दोष है
एक-दो बूँदों की खातिर साकिया
देख मिटता जा रहा संतोष है
१९५
आज मदिरा को मचलता जोश है
जोश में बिल्कुल नहीं अब होश है
इस सुरा के भक्त से ऐ साकिया
क्यों छुपा रखा सुरा का कोष है
१९६
नज़रों से अपनी गिराते हैं नहीं
एक पल में भूल जाते हैं नहीं
रो पीने वाले से ऐ साकिया
जाम मदिरा का छुपाते हैं नहीं
१९७
झूठ बोलेगा नहीं उसका सरूर
सत्य बोलेगा सदा उसका गरूर
सत्यवादी और कोई हो न हो
सत्यवादी हर मधुप होगारूर
१९८
देखते ही देखते रह जाओगे
भूल पर अपनी बहुत पछताओगे
चीर कर मेरे ह्रदय को देख लो
खून से ज्यादा सुरा को पाओगे
१९९
फूलों का हर घर दिखाई देता है
रूप का हर मंज़र दिखाई देता है
मस्ती के आलम में मुझ को साकिया
हर बशर सुंदर दिखाई देता है


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