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01.17.2009
सुराही
प्राण शर्मा
160 - 179

सुराही
प्राण शर्मा


१६०
अनभुझी सी प्यास में
मस्तियों की आस में
दौर मदिरा का चला
हास और परिहास में
१६१
एक दिन साधु जी मुझको मिल गए बाज़ार में
मैंने पूछा पीजियेगा तरे कुछ शराब के
साधु जी बोले नहीं, तू तो बड़ा नादान है
झोली में मेरी नशा का सब पड़ा सामान है
१६२
एक दिन बीवी ने ने पूछा क्या हुआ आपको
छोड़ डाला है भला क्या इस सुरा के शाप को
मैंने बीवी से कहा मेरी सुरा सर्वस्व है
छोड़ सकता है कोई अपनी ही माई-बाप को
१६३
होश न हो ये हुई कब रात कब आयी सहर
सूर्य भी किस ओर से निकला तथा डूबा किधर
मदिरा पीने का मज़ा तब है कदम के साथ ही
ये ज़मीं और आसमा सब झूमते आयें नज़र
१६४
जिंदगी है आत्मा है ज्ञान है
मदभरा संगीत है और गान है
सारी दुनिया के लिए ये सोमरस
साक़िया, तेरा अनूठा दान है
१६५
ज़िंदगी की साज-सरगम हो न हो
पायलों की छम छमा छम हो न हो
आज जी भर कर पिला दे साक़िया
कौन जाने कल मेरा दम हो न हो
१६६
क्या नज़ारें हैं छलकते प्याला के
क्या गिनाऊँ गुन तुम्हारी हाला के
जागते- सोते मुझे ऐ साक़िया
सपने भी आते हैं तो मधुशाला के
१६७
कौन कहता है की पीना पाप है
कौन कहता है कि ये अभिशाप है
गुन सुरा के शुष्क जन जाने कहाँ
ईश पाने को यही इक जाप है
१६८
मस्तियाँ भरपूर लाती है सुरा
वेदना पल में मिटाती है सुरा
मैं भुला सकता नहीं इसका असर
रंग कुछ ऐसा चढ़ाती है सुरा
१६९
नाव गुस्से की कभी खेते नहीं
हर किसी की बद दुआ लेते नहीं
क्रोध सारा मस्तियों में घोल दो
पी के मदिरा गालियाँ देते नहीं
१७०
चलते-चलते गीत गाते हैं कदम
नूपुरों से झनझनाते हैं कदम
झूमता है मन मगर उससे अधिक
मस्तियों में झूम जाते हैं कदम
१७१
बेझिझक होकर यहाँ पर आईये
पीजिये मदिरा हृदय बहलाइए
नेमतों से है भरा मधु का भवन
चैन जितना चाहिए ले जाइए
१७२
फिर न रह जाए अधूरी कामना
फिर न करना कोई भी शिकवा-गिला
वक़्त है अब भी सुरा पी ले ज़रा
फिर न कहना बेसुरा जीवन रहा
१७३
जब भी जीवन हो दुःख से सामना
हाथ साक़ी का सदा तू थामना
खिल उठेगी दोस्त तेरी ज़िंदगी
पूरी हो जायेगी तेरी कामना
१७४
मैं नहीं कहता पियो तुम बेहिसाब
अपने हिस्से की पियो लेकिन जनाब
ये अनादर है सलीके मयकदा
बीच में ही छोड़ना आधी शराब
१७५
ऐसा मस्ताना बना दे गी शराब
दिन में ही तारे दिखा देगी शराब
बंद बोतल में न नाचे ख़ुद भले
पर तुम्हे पल में नचा देगी शराब
१७६
पड़ गए हो तंग क्यों इससे जनाब
ये नहीं रखते हैं प्यालों का हिसाब
ख़त्म कर देते हैं पल में बोतलें
पीने वाले पीते हैं खुल कर शराब
१७७
कौन तू मधु में छुपी मस्ती लिए
मुख पे घूँघट लाल झीना सा लिए
आ निकल सूरत दिखा वरना अभी
तुझ को पीकर झूम जायेंगे प्रिये
१७८
आज मधु में नाचती देखी परी
ज्यों सुगन्धित बाग़ की इक हो कली
लाल अवगुंठन सुनहरा मखमली
रूप दिखलाती कि इठलाती हुई
१७९
साक़िया तुझ को सदा भाता रहूँ
तेरे हाथों से सुरा पाता रहूँ
इच्छा पीने की सदा ज़िंदा रहे
और मय खाने में मैं आता रहूँ


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