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09.28.2008
सुराही
प्राण शर्मा
101 - 139

सुराही
प्राण शर्मा


१०१
कोई पिये प्याले पर प्याला
कोई पिये केवल इक प्याला
जिसकी जितनी प्यास है होती
उतनी पिये यारो वह हाला
१०२
मस्ती में क्या ख़ाक जिएँगे
चाक जिगर के ख़ाक सिएँगे
उपदेशों से ग्रस्त हुए हैं
उपदेशक क्या ख़ाक पिएँगे
१०३
जीवन नाम है मधु पाने का
मस्ती के नग़मे गाने का
जाहिद का जीवन है कोई
जीवन तो है मस्ताने का
१०४
सुखदायक हर पल है प्यारे
सरिता सी कल-कल है प्यारे
अपने मस्त भरे जीवन में
मंगल ही मंगल है प्यारे
१०५
मस्ती का आलम रहने दे
मस्त हवाओं को बहने दे
यह मयखाना है प्यारे तू
दूर सियासत को रहने दे
१०६
साक़ी तेरा दोष नहीं है
मुझमें जो सन्तोष नहीं है
पीता हूँ हर रोज़ सुरा पर
भरता मन का कोष नहीं है
१०७
मदिरा इक लोरी जैसी है
मन पर जादू सा करती है
जब तक मैं मदिरा ना पी लूँ
मुझको नींद नहीं आती है
१०८
महफ़िल में दुक्खों के मारे
जीवन की हर डग पर सारे
केवय मय की बोतल पीकर
झूम उठे सारे के सारे
१०९
मस्ती के घेरों के घेरे
फैलाते हैं शाम-सवेरे
तन – मन को सुरभित करते हैं
मधु के भीगे मुक्तक मेरे
११०
खुद पीये और सबको पिलाये
यारों के संग रंग जमाये
ऐसा कैसे हो सकता है
’प्राण’ अकेला मधु पी जाये
१११
इक स्वर में बोले मस्ताने
हम हैं साक़ी के दीवाने
लाख बुरा कह ले उपदेशक
हमको प्यारे हैं मयखाने
११२
मधुशाला के दर जब खोले
एक बराबर पीने सबको तोले
कौन करे ’ना’ मदिरा को अब
मधुबाला पीने को बोले
११३
मधुमय जीवन जीते-जीते
घाव हृदय के सीते-सीते
प्यास बढ़ा बैठे हैं मन की
थोड़ी – थोड़ी पीते-पीते
११४
गीत सुरा का गाता होगा
मधु से मन बहलाता होगा
’प्राण’ किसीके घर में बैठा
पीता और पिलाता होगा
११५
जीवन-नैया खेते-खेते
वक़्त तुम्हीं को देते-देते
अब तक ज़िंदा हूँ मैं साक़ी
नाम तुम्हारा लेते-लेते
११६
सावन ने जब ली अंगड़ाई
मस्त घटा जब मन में छाई
मत पूछो रिंदों ने क्या
मयखाने में धूम मचाई
११७
मस्ती की बारिश लाती है
सोंधी ख़ुशबू बिखराती है
जेठ महीने में ए प्यारे
मदिरा ठंडक पहुँचाती है
११८
पगले, सौन क्या साक़ी बोले
भेद गहन मदिरा के घोले
वह पाय जाये जीते जी सुख
जो मन को मधुरस से घोले
११९
चाक जिगर का सी लेता है
मदमस्ती में जी लेता है
मदिरा से परहेज़ नहीं है
जब जी चाहे पी लेता है
१२०
सबसे प्यारा जाम सुरा का
सबसे न्यारा नाम सुरा का
दुनिया भरक सब धामों से
सबसे प्यारा धाम सुरा का
१२१
मधु से अपना मन बहला ले
मदमस्ती का जश्न मना ले
मेरी फ़िक्र न कर तू प्यारे
पहले अपनी प्यास बुझाले
१२२
सबसे प्यार अथाह करे वह
सबकी ही परवाह करे वह
सबका शुभचिन्तक है साक़ी
सबके सुख की चाह करे वह
१२३
साथ सुराबाले के से ले
पाप-कलुष सारे धो ले
मस्त फुहारों में मदिरा की
प्यारे तन-मन खूब भिगो ले
१२४
तू चुपचाप चले घर जाना
कोई क्लेश न घर में लाना
मदहोशी में मेरे प्यारे
बच्चे की मानिंद सो जाना
१२५
रात-दिवस मदिरा पीता है
मस्त हवाओं में जीता है
यह कमबख़्त हृदय ए प्यारे
फिर भी रीता का रीता है
१२६
ए मतवालो शाद रहो तुम
जीवन में आबाद रहो तुम
थोड़ी-थोड़ी पीते रहो तुम
हर ग़म से आज़ाद रहो तुम
१२७
मधुपान कराता है सबको
मदमस्त बनाता है सबको
एहसान सदा उसके मानो
साक़ी बहलाताहै सबको
१२८
कभी मस्ती कभी ख़ुमार प्रिये
कभी निर्झर कभी फुहार प्रिये
कबी रिमझिम-रिमझिम मेघों की
मदिरा के रंग हज़ार प्रिये
१२९
सबकी मस्ती की चाल रहे
मस्ताना सबका हाल रहे
साक़ी की दया से हर कोई
मदिरा से मालामाल रहे
१३०
जिसने मधुमय संसार किया
जिसने जीवन-उद्धार किया
हम उसके शुक्रगुज़ार बड़े
जिसने मधु-अविष्कार किया
१३१
हम मदमस्ती के पाले हैं
मधुशाला के उजियाले हैं
हम से सम्मान सुरा का है
हमसे ही शोभित प्याले हैं
१३२
आता – जाता हूँ मधुशाला
पीता जाता हूँ जी भर कर हाला
सब कहने से क्या घबराना
मतवाला हूँ मैं मतवाला
१३३
प्याले पर प्याला पी डाले
घट – घट की हाला पी डाले
पीने वाला मदमस्ती में
सारी मधुशाला पी डाले
१३४
हँसता, गाता, मुस्काता है
अपने मन को महकाता है
जो आता है मधुशाला में
आनंदित होकर जाता है
१३५
प्याले पर प्याला चलने दे
मस्ती को मन में पलने दे
जब बैठे ही हैं पीने को
तो रात सुरा में ढलने दे
१३६
मेरा और अपना प्याला भर
मदिरा से महफ़िल करदे तर
मस्ती की घड़ियों में प्यारे
मन की बेचैनई से ना डर
१३७
माना, सुख के दीन बीते हैं
मान सुविधा में हम रीते हैं
लेकिन मदिरा के बलबूते
हम बेफ़िक्री में जीते हैं
१३८
आये हैं हम पीने वाले
मदिरा के प्यासे मतवाले
साक़ी हम यह क्या सुनते हैं
खाली बोतल खाली प्याले
१३९
मन में सद्‌भाव जगाती है
औ’ दर्द – दया उपजाती है
मदिरा हर प्राणी को अक्सर
संवेदनशील बनाती है।


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