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08.02.2008
सुराही
प्राण शर्मा
81 - 100

सुराही
प्राण शर्मा


८१

साक़ी को पीने की ख़्वाहिश फिर अपनी बतला बैठा

मदिरा की सोंधी ख़ुशबू से फिर मन को बहला बैठा

मस्ती के आगे कुछ अपनी पेश गयी ना ए यारो

घर जाने के बदले मैं फिर मयख़ाने में जा बैठा

८२

कष्ट नहीं है मयख़ाने में जिनको आने-जाने के

जिनको अवसर नित मिलते हैं मय के रंग जमाने के

लोग बड़े ही किस्मत वाले होते हैं दुनिया में वे

जिनके घर आगे-पिछवाड़े पड़ते हैं मयख़ाने के

८३

लोग समझ पाये हैं अब ये कितनी सच्ची है हाला

नफ़रत से सबको करती है दूर हमेशा मधुबाला

धर्म के ठेकेदारों से अब तंग आये हैं लोग सभी

खाली मन्दिर-मस्जिद हैं भरी हुयी है मधुशाला

८४

संगत कर लो पहले मय के गीत सुनाने वाले से

रोशन कर लो पहले मन को मस्ती के उजियाले से

साक़ी और मयख़ाना क्या है ज्ञान सभी मिल जाएगा

 सीखो पहले मदिरा पीना दोस्त किसी मतवाले से

८५

आकर देखो कितनी खुशियाँ मिलती हैं मृदु हाला में

और देखो कितना अपनापन मिलता है मधुबाला में

उपदेशक तो मधु के अवगुण लाख गिनायेगा लेकिन

आकर देखो मदिरा के गुण दोस्त स्वयं मधुशाला में

८६

पण्डित जी बोले – मतवालो, मदिर पर क्यों मरते हो

इस सुन्दर जीवन के धन का अपव्यय तुम क्यों करते हो

मतवाले बोले – इस धन को हम बरबाद करें न करें

पहले यह बतलाओ, हमसे नफ़रत तुम क्यों करते हो

८७

हम भी इनसान खुदा के हम भी जीवन जीते हैं

हम भी तुम जैसे हँसते हैं, चाक जिगर के सीते हैं

पण्डित जी, तुम में और हममें सिर्फ़ इसीका रोना है

तुम पीते हो दूध-मलाई और हम मदिरा पीते हैं

८८

भक्त बने फिरते हैं अब तो लोग सभी मधुबालाअ के

दीवाने बनकर फिरते हैं लोग सभी अब हाला के

जिसको देखो बात है करता पीने और पिलाने की

लोगों के मेले लगते हैं आँगन में मधुशाला के

८९

मेरे अन्तर की तृष्णा को तेरा काम बुझाना है

इस प्यासे जीवन पर तेरा काम सुरा बरसाना है

सदियों से सम्बंध निकट का तेरा – मेरा है साक़ी

मेरा काम सुरा पीना है तेरा काम पिलाना है

९०

पीने की अभिलाषा में वे बादल से मँडराते हैं

मान – प्रतिष्ठा मधुशाला की आकर रोज़ बढ़ाते हैं

देख कहीं प्यासा ही कोई लौट ना जाए ए साक़ी

कोसों दूर से पीने वाले मधुशाला में आते हैं

९१

हम सबको भीतर आने को बोलोगे तो जानेंगे

मदिरालय के सब दरवाज़े खोलोगे तो जानेंगे

पीने की अभिलाषा लेकर हम आये हैं साक़ी

हम सबको तुम एक बराबर तोलोगे तो जानेंगे

९२

कैसे फूल खिला करता है और कैसे मुरझाता है

जुगनू सारी रात चमक कर क्यों दिन में खो जाता है

साक़ी, मेरे मन में अक़सर प्रश्न उठा करता है यह

आता है इनसान कहाँ से और कहाँ को जाता है

९३

मदिरा मुझमें जीती है या मैं मदिरा में जीता हूँ

मदिरा मुझ बिन रीती है या मैं मदिरा बिन रीता हूँ

मदिरा जाने या मैं जानूँ तुम क्यों चिंतित हो जाहिद

मदिरा मुझको पीती है या मैं मदिरा को पीता हूँ

९४

तुझको तेरा मन्दिर प्यारा मुझको मेरी मधुशाला

तुझको तेरा अमृत प्यारा मुझको मेरी मृदु हाला

उपदेशक, तेरा-मेरा वाद-विवाद नहीं अच्छा

तुझको तेरा रब हो प्यारा मुझको मेरी मधुबाला

९५

मदिरा तन-मन को कुछ ज्यादा सरसाती है सन्ध्या में

मधुबाला प्याले कुछ ज्यादा छलकाती है सन्ध्या में

यूँ तो दौर चला करता है मधु का दिन में भी लेकिन

पीने की इच्छा कुछ ज्यादा बढ़ जाती है सन्ध्या में

९६

सावन-भादों सी मस्तानी

अमृत सी जीवन-कल्याणी

मन में क्या-क्या मस्ती घोले

छैल-छबीली मदिरा रानी

९७

मधुवन की यह कुंज गली है

शाश्वत खिलती मन की कली है

मधुशाला को कुछ भी कहो तुम

अपने लिए यह पुण्यस्थली है

९८

अपनी सब कुछ है मधुबाला

खूब लुटाती है जो हाला

और नहीं कोई लक्ष्य हमारा

लक्ष्य हमारा है मधुशाला

९९

इतनी जल्दी क्या है प्यारे

अभी नहीं निकले हैं तारे

दोस्त, नहीं घर प्यासे जाते

ले-ले मदिरा के चटकारे

१००

हर चिंता से दूर रहोगे

सुख सागर में नित्य बहोगे

थोड़ी-थोड़ी पीते रहना

दोस्त सदैव निरोग रहोगे


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