अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.28.2008
सुराही
प्राण शर्मा
61 - 80

सुराही
प्राण शर्मा


६१
और जगह पर जाना ख़ुद को सच पूछो तो भटकाना है
मदिरा से वंचित जीवन को सच पूछो तो तरसाना है
प्यार भरा माहौल यहाँ का और कहाँ होगा ए यारो
इनसानों का सच्चा डेर सच पूछो तो मयख़ाना है
६२
जबकि सदा ही लहराता है दृश्य मनोहर मधुशाला का
जबकि सदा ही भरमाता है रूप सलोना मधुबाला का
मुझको क्या लेना-देना है बाग-बगीचे की ख़ुशबू से
जबकि सदा ही महकाता है मन को हर क़तरा हाला का
६३
सोंधि हवाओं की मस्ती में जीने का कुछ और मज़ा है
भीगे मौसम में घावों को सीने का कुछ और मज़ा है
मदिरा का रस दुगना-तिगना बढ़ जाता है मेरे प्यारे
बारिश की बूँदाबाँदी में पीने का कुछ और मज़ा है
६४
सन्यासी सारी दुनिया को झूठ बराबर बतलाता है
लेकिन पीनेवाला जग को सच्चा कहकर लहराता है
अन्तर हाँ अन्तर दोनों में धरती और अम्बर जितना है
सन्यासी जग ठुकराता है पीने वाला अपनाता है
६५
यह न समझना साक़ी तुझसे इक प्याले पर रोष करेंगे
तेरी कंजूसी का साक़ी सारे जग में घोष करेंगे
तुझको है मालूम सभी कुछ हम कितने धीरज वाले हैं
थोद्ई हो या ज्यादा मदिरा हम उससे सन्तोष करेंगे
६६
बीवी-बच्चों को बहलाकर मयख़ाने को जाता हूँ मैं
घर वालों की ’हाँ’ को पाकर मयख़ाने को जाता हूँ मैं
ऐसी बात नहींहै, मुझको घर की कोई फ़िक्र नहीं है
घर के काम सभी निबटा कर मयख़ाने को जाता हूँ मैं
६७
उपदेशक का बोल कसीला रिंदों को खलता जाएगा
रिंदों के मदिरा पीने से उपदेशक जलता जाएगा
आज अगर है भीड़ यहाँ पर कल को भीड़ वहाँ पर होगी
मधुशाला चलती जाएगी मन्दिर भी चलता जाएगा
६८
साक़ी, तेरे मयख़ाने में उज्ज्वल ही उज्ज्वल है सब कुछ
साक़ी, तेरे मयख़ाने में निर्मल ही निर्मल है सब कुछ
तेरे मयख़ाने में छ्ल हो सोच नहीं सकता मतवाला
साक़ी तेरे मयख़ाने में निश्छल ही निश्छल है सब कुछ
६९
इक दिन साक़ी बोला मुझसे तू कैसा मस्ताना है
बरसों से ही मयख़ाने में तेरा आना-जाना है
ए साक़ी, ऐसा लगता है मय की खातिर जमा हूँ
मयख़ाना ही मेरा घर है मेरा ठौर-ठिकाना है
७०
वक़्त सुहना बीत रहा है पीने और पिलाने में
आता है आनंद बड़ा ही मय के नग़में गाने में
शिकवा और शिकायत तुझसे हमको क्यों ए साक़ी
सुबह सुरा है शाम सुरा है तेरे इस मयख़ाने में
७१
महजब के हर व्यापारी के घर लगवा दूँ ताला मैं
नफ़रत फैलाने वाले का मुख करवा दूँ काला मैं
किस्मत से यदि मैं बन जाऊँ अपनी नगरी का मुखिया
हर चौराहे पर खुलवा दूँ प्रेम भरी मधुशाला मैं
७२
हीन भावना जड़ से तेरे मन की दूर भगायेगा
सतरंगी मदमस्ती तेरे मन- मन में लहरायेगा
मन्दिर से ठुकराया है तू चिंता की कोई बात नहीं
साक़ी इतना दयाशील है तुझको खुद अपनायेगा
७३
मदिरा की मस्ती में खोया मुझ जैसा जीने वाला
चाक जिगर के मदमस्ती में मुझ जैसा सीने वाला
दोस्त, भले ही न्यौता दे दे पीने का जग को लेकिन
कठिनाई से तुझे मिलेग मुझ जैसा पीने वाला
७४
मयख़ाने में आते-जाते सब पर धाक बिठाता हूँ
मदिरा सब पीने वालों से लोहा निज मनवाता हूँ
मुझको मान बहुत है प्यारे अपने मदिरा पीने पर
पल ही पल में अनगिन प्याले अंधा-धुंध उड़ाता हूँ
७५
मधुशाला में लाकर मुझको प्यासा ही क्या रक्खोगे
अपने पास बिठाकर मुझको प्यासा ही क्या रक्खोगे
कितनी और प्रतीक्षा मुझको करनी होगी ए साक़ी
मेरी प्यास बढ़ाकर मुझको प्यासा ही क्या रक्खोगे
७६
रात दिवस सोचा करता था कैसा होगा मयख़ाना
कैसा होगा साक़ी, कैसा होगा मय और पैमाना
दुनिया के अनमोल रतन हैं साक़ी, मय और मयख़ाना
मैंने ये सब जाना प्यारे बनकर इन का मस्ताना
७७
साथ सदा तू देना उसका पीने में जो पक्का है
मस्ती की बातें करता है मधु के प्रति जो सच्चा है
साथ कभी मत देना उसका कहना है यह साक़ी का
मान नहीं जिसको मदिरा पर पीने में जो कच्चा है
७८
तुझे कहीं न बहलाये वह चुपड़ी-चुपड़ी बातों से
या तुझको घायल ना कर दे उपदेशों के घातों से
पीकर मदिरा उसके आगे दोस्त न निकलाकर प्रतिदिन
छीन कहीं न ले उपदेशक बोतल तेरे हाथों से
७९
दुनिया का अद्‌भुत हर जन है मन में कुछ और मुख में कुछ
लोगों का बस एक चलन है मन में कुछ और मुख में कुछ
ए साक़ी, एतबार करें अब इस युग में किस प्राणी पर
सबका दो रंगी जीवन है मन में कुछ और मुख में कुछ
८०
यहीं मिलेगा तुझको अल्लाह यहीं मिलेग गुरु का दर
यहीं मिलेगा तुझको ईसा यहीं मिलेगा पैगम्बर
आँखें खोल ज़रा तू अपनी कहाँ भटकता है प्यारे
मयख़ाने से बढ़कर कोई और नहीं है रब का घर


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें