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05.31.2008
सुराही
प्राण शर्मा
31 - 60

सुराही
प्राण शर्मा


३१
चाक जिगर के अपने सब सीने आया है
मदिरा को फिर मस्ताना पीने आया है
मधुशाला के बिन कैसे रह सकता है वो
लो, साक़ी फिर मस्ताना जीने आया है
३२
बात बड़ी ही हैरानी वाली लगती है
मधु के प्यासों की क़िस्मत काली लगती है
नीरस लोग यहाँ पर वो भी मयखाने में
दोस्त, सुराही इसीलिए खाली लगती है
३३
साक़ी, मय और पैमाने की बात करेंगे
मयख़ाने में मस्ती की बरसात करेंगे
रोक सके तो रोके कोई मतवालों को
पीते और पिलाते सारी रात करेंगे
३४
तब भी प्यालों में होती थी मधु की छलकन
तब भी मचला करता था मदिरा को हर मन
रामायण का युग हो या हो महाभारत का
लोग किया करते थे नित मदिरा का सेवन
३५
घुट-घुट कर पीड़ा को सहना ठीक नहीं है
यारों से दिल की ना कहना ठीक नहीं है
मदिरा के दो प्याले पीकर भी ए साथी
दुखी तुम्हारा बन कर रहना ठीक नहीं है
३६
मधुशाला में जाने की कोई भूल न कर तू
मधु का गीत सुनाने की कोई भूल न कर तू
दोस्त, अगर तुझमें मधु के प्रति मान नहीं है
पीने और पिलाने की कोई भूल न कर तू
३७
निर्णय ले बैठेगा तुझको ठुकराने का
अवसर खो बैठेगा तू मदिरा पाने का
बैठ सलीके से ए प्यारे वरना तुझको
रस्ता दिखला देगा साक़ी घर जाने का
३८
जीवन में तुम आज अलौकिक रस बरसा दो
मदमस्ती का एक अनोखा लोक रचा दो
पीने का आनंद बड़ा आएगा साक़ी
अपने शुभ हाथों से मुँह को जाम लगा दो
३९
तन-मन को बहलाने का इक साज़ यही है
अपने मधुमय जीवन का अन्दाज़ यही है
दिन को साग़र शाम को साग़र मेरे प्यारे
सच पूछो तो अपना इक हमराज़ यही है
४०
मद में पत्ता-पत्ता, कन-कन झूम उठा है
बिन ऋतु के उपवन का उपवन झूम उठा है
चेतन तो चेतन जड़ में भी उसका असर है
जब साक़ी डोला तो दर्पन झूम उठा है
४१
पल दो पल आजा तुझको भी मैं बहला दूँ
मदिरा के छींटे तुझ पर भी मैं बरसा दूँ
ए साक़ी, तू रोज पिलाता है मय मुझको
आजा, तुझको भी थोड़ी मैं आज पिला दूँ
४२
व्यर्थ सुरा और मधुशाला को बतलाता है
पीने वालों में अवगुण भी दिखलाता है
साक़ी से क्या ख़ाक निभेगा उसका रिश्ता
जाहिद जब उसकी छाया से घबराता है
४३
मन ही मन में गीत सुरा का मैं गा बैठा
पीने की आशा में खुद को महका बैठा
जब साक़ी ने मदिरा का न्यौता भिजवाया
मैं मयखाने में सबसे पहले जा बैठा
४४
बात है जो मस्ती में जीवन को जीने की
बात है जो मदिरा से महके सीने की
बात कहाँ होगी वो चाँदी के प्याले में
बात है जो मिट्टी के प्याले में पीने की
४५
मदिरा का प्यासा मेरा मन चिल्लायेगा
खुद भी तड़पेगा तुझको भी तड़पायेगा
छीन नहीं मेरे हाथों से प्याला साक़ी
मेरा कोमल सा मन द्रोही हो जायेगा
४६
मैं मस्ती में पीऊँगा प्याले पर प्याला
चाहे रोज़ पुकारे लोग मुझे मतवाला
मेरे मन जल्दी ले चल मधुशाला मुझको
वहाँ तरसती है मेरे स्वागत को हाला
४६
लोग अगर विश्वास करेंगे मधुबाला में
लोग अगर सुख-चैन टटोलेंगे हाला में
जीवन के सारे मसले हल हो जाएँगे
लोग अगर आए-जाएँगे मधुशाला में
४७
रोम रोम में सुख पहुँचाती है मदमस्ती
कैसे-कैसे रंग जमाती है मदमस्ती
उसकी महिमा क्या बतलाऊँ मेरे यारो
पत्थर दिल में फूल खिलाती है मदमस्ती
४८
मदिरा की मस्ती में हर पल अपना जीवन महकयेगा
सबको अपने गले लगाकर झूमेगा और लहरायेगा
सुबह-सुबह चल पड़ने का उसका मक़सद जाने हैं हम
मदिरा का मतवाला घर से सीधा मयख़ाने जायेगा
४९
फागुन के मौसम में कोयल गीत नहीं तो क्या गायेगी
सावन के मौसम में बदली बरखा नहीं तो क्या लायेगी
नाहक ही तुम पाल रहे हो दुश्चिंताएँ अपने मन में
मदिरा पीने से तन-मन में मस्ती नहीं तो क्या आयेगी
५०
मधुशाला में यारो कोई फ़र्क़ नहीं गोरे-काले का
मधुशाला में ज़ोर नहीं कुछ चलता है जीजे-साले का
नाद यहाँ गूँजा करता है सर्वे भवन्तु सुखिनः हर पल
एक नज़र से सबको देखे धर्म सुरा पीने वाले का
५१
देख के कितना दुख पहुँचा है मदिरालय के टूटे प्याले
टूटी खिड़की और दरवाज़े, दरवज़ों के टूटे ताले
ए साक़ी प्रतिबंध लगा दे मदिरालय में उपद्रवियों पर
केवल वे ही आयें इसमें जो हों मदिरा के मतवाले
५२
हम मधु के मतवाले इतना रम जाते हैं पैमाने में
इतना खो जात हैं मधु से अपने तन-मन बहलाने में
पीते और पिलाते मदिरा और मस्ती की रौ में बहते
आधी-आधी रात कभी हम कर देते हैं मयख़ाने में
५३
सपनों की दुनिया में सबकी पावन मदिरा धाम बसा है
मदिरा में सुख से जीने क इक सुन्दर पैगाम बसा है
उपदेशक जी, सिर्फ़ तुम्हीं तो नाम नहीं लेते ईश्वर का
हर पीने वाले के मन में राम बसा है, श्याम बसा है
५४
हम भी मग्न रहें मस्ती में तुम भी मग्न रहो पूजन में
हम भी जी लें अपनी धुन में तुम भी जी लो अपनी लगन में
उपदेशक जी, कैसा झगड़ा हम में और तुम में बतलाओ
हम भी रहें तल्लीन सुरा में तुम भी रहो तल्लीन भजन में
५५
अच्छा होता, पहले से ही साक़ी का मतवाला होता
मयख़ाने जाने का चस्का पहले से ही डाला होता
काश, सभी मस्ती के मंज़र पहले से ही देखे होते
शौक़ सुरा का पहले से ही या रब मैंने पाला होता
५६
लोगों को मुसकाते हरदम मधुशाला में जाकर देखो
मधु में घुलता हर इक का ग़म मधुशाला में जाकर देखो
उपदेशक जी, बात पे मेरी तुमको यदि विश्वास नहीं है
मस्ती और खुशी का संगम मधुशाला में जाकर देखो
५७
पीने वालों की महफ़िल में ख़ुद को उजियाले कहते हैं
नीरस दिखने वाले ख़ुद को मस्ती के पाले कहते हैं
हमने देखे और सुने हैं स्वांग रचाते कितने जन ही
मदिरा का इक प्याला पीकर ख़ुद को मतवाले कहते हैं
५८
धीरे-धीरे आ जायेगा गीत सुरा का गाना तुमको
धीरे-धीरे आ जायेगा जीवन को महकाना तुमको
अभी नये हो मधुशाला में मधु की चाहत रखने वालो
धीरे-धीरे आ जायेगा पीना और पिलाना तुमको
५९
खुशियों के बादल उड़ते हैं साक़ी बाला के आँचल में
गंध यहाँ बसती है वैसे बसती है जैसे संदल में
पण्डित जी, इक बार कभी तो मधुशाला में आकर देखो
मस्ती सी छायी रहती है मधुशाला के कोलाहल में
६०
जब मतवालों के प्याओं से प्याला टकराता है भाई
जब मदिरा का पान हृद्य में रंग अजब लाता है भाई
वक़्त गुज़र जाता है कितनी जल्दी-जल्दी मयख़ाने में
जब मस्ती का आलम पूरे जीवन पर आता है भाई


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